Thursday, December 9, 2010

यह गुलशन हमारा है!

( एक बगीचेका दृश्य -- अब बगीचा काफी सूख गया है । वहाँ अब ना कोई पेड है, और ना ही रंगबिरंगी फूलोंकी बहार -- हाँ, शायद अपने बीते दिनोंकी याद दिलानेके लिये यहाँ-वहाँ कुछ फल-फूल पडे हैं । पर्दा ऊपर उठता है तो वहाँ कोई नहीं होता । कुछ देर बाद धीरेधीरे कुछ लोगोंकी आवाज़ें सुनाई देने लगती हैं, और फिर चार लोग रंगमंचपर आते हैं -- थके-हारे हुए । उनमेंसे एक सिख है; दूसरा मद्रासी, तीसरा बंगाली और चौथा मराठी । )
मद्रासी : और कितना दूर है जी?
मराठी : ए, मला कायको विचारता है? तेरेकू मैं थोडाच लाया?
मद्रासी : अय्ययो, इतना गुस्सा कायकू करता जी? हम ऐसेच पूछा तुमारेकू । Don't be angry, जी ।
मराठी : हँ, मेरेको स्वत: बहुत दम लगा है ।
मद्रासी : बालाजीका कसम, हम भी बहुत थक गया है जी । Very tired. दो दिन हुवा, हम चलताच रहता, चलताच रहता ।
बंगाली : बाबू मोशाय, एकदम कोरेक्ट बोला तोमी । एकदम सोच बोला । आमी भीशोण टायर्ड, मोतलब बोहोत टायर्ड ।
सिख : (हँसकर) ओह, बल्ले बल्ले, तुस्सी तो पूरी लौंडिया हो, लौंडिया ।
मद्रासी : हम बोल दिया जी, हम टायर्ड हो गया । हम अभी इधरच बैठेगा । (वहीं बैठकर अपने पैर दबाने लगता है ।)
बंगाली : थोडा देर होम भी बैठेगा । (बैठता है ।)
मराठी : तो मैं किसका घोडा मारा? मैं पण बैठेगा । (बैठकर हाथ-पैर दबाने लगता है ।)
सिख : ये लोजी । सब बैठ गये, तो अस्सीं की करांगा? (बैठ जाता है ।)
मद्रासी : अय्योयो, रहनेका जगह ढूँढो जी । बैठो नहीं ।
मराठी : तर काय? निकले थे जगह शोधनेको, और अबतक कुछ हुवायच नहीं ।
मद्रासी : हमकू बहुत भूख लगा जी ।
बंगाली : (यहाँवहाँ देखकर) भालो, यह फोल पडा है इधर ।
( सब लोग उस जगह दौडते हैं और फल उठानेके लिये झगडने लगते हैं । सिर्फ बंगाली वहाँ पडे हुए फूल उठाकर उनकी खुशबू लेता है । सिख आदमी मराठी और मद्रासीको दूर हटाकर फल उठाता है । )
सिख : तुस्सी ज़रा परे हट जाओ जी । हरएक को फल मिलेगा । तुस्सी झगडते क्यों हो?
बंगाली : तोमी कायको झगडा कोरता है? यह फूल लॊ, कितना सुंदर है ।
मद्रासी : अय्ययो, तुम क्या बात करता जी? ये फुलका ये सूँघ लेकर पेट भरता क्या?
मराठी : अरेरे, ये बोला तो क्या बोला?
मद्रासी : ये बोला तो क्या बोलता जी? हम ऍक्शन करकेच दिखाता तुमको । (फूल लेकर सूँघता है ।) ये बोला हम । फूलका सूँघ लेकर पेट भरता क्या?
सिख : (मद्रासीको दो फल देकर) तुस्सी ये फल लो जी । झगडा करने की ज़रूरत नहीं ।
मराठी : सरदारजी, ए मद्रासीकू दो फल क्यों? मेरेकू भी मिलना चाहिये ।
मद्रासी : हम परमिट नहीं करेगा जी । नो, नो । भूखका नाम पहला हमींच लिया ना? हमकू दो फल मिला तो तुमारा क्या जाता?
बंगाली : सोरदारजी, हमारा फोल हमको दो ।
( सिख सबको एक-एक फल देता है, और सब फल खाते हैं । चुपकेसे मद्रासी एक फल अपनी थैलीमे रख देता है । )
सिख : ओय यारा, तुस्सी तो भूख-भूख करके चिल्ला रहे थे । थैलीविच क्यों डाल रहा? फल खाले, नहीं तो ---
मद्रासी : हम बिलकुल नहीं खायेगा जी । हम ये फल संभालके रखेगा । और आगे खानेको कुछ नहीं मिलेंगा तो हम इस फलका बिज़िनेस करेगा ।
बंगाली : तुम लोग बोहोत मोक्खीचूस है । हर वोक्त पैसाका सोचेगा ।
मद्रासी : ए बंगाली बाबू, तुमकू बिज़िनेस सेन्स नहीं तो मै क्या करेगा?
मराठी : अरे, पहिलं रहनेका बंदोबस्त करो । बिज़नेस नंतर बघेंगे ।
सिख : ये हुई ना चंगी गल्ल । भाईयों, तुस्सी सब थक गये हो, ठीक बोला ना मैं?
सब लोग : बिलकुल ठीक ।
सिख : तो फिर अग्गे चलनदी ज़रूरत की है? यहीं डेरा लगा देंगे । वैसे यह जगह भी चंगी है । की कहते हो तुस्सी?
मराठी : चालेल । अपने बापका क्या जाता है? लेकिन एक मिनीट -- (वहाँकी कुछ मिट्टी उठाकर उसे गौरसे देखता है ।) हाँ, यह मिट्टी अच्छी है । इधर जवारीका पीक मस्त आयेगा । दो-तीन काँदेका पेड लगायेगे । फिर काँदा-भाकर खाकर मज़ेमें दिन काटेंगे ।
बंगाली : (मिट्टी देखकर) यह मराठी सोही बोलता हाय । यह मिट्टीमे चावल भालो निकलेगा ।
सिख : और यारों, गेहूँ भी । यहाँदी मिट्टी ऐसी है । यह तो वही ज़मीन लगदी है जिसदी तारीफ अपने दादा-परदादा करते थे ।
बंगाली : मोगर होमने तो इसका दोर्शन कभी नही किया ।
मद्रासी : तो अभी करलो जी । आपन इधरच रहेगा । तुम सब ये ज़मीनमे दाल, चावल, गेहूँ और कुछ भी निकालो । हम इसकू खायेगा और बाकी बचेगा तो उसका बिज़िनेस करेगा । कैसा आयडिया है?
बंगाली : तोमी एकदम पागल है । बाबू मोशाय, एकदम गोधा ।
सिख : तो गल्ल पक्की । हम यहीं रहेंगे ।
मराठी : (रंगमंचकी दाहिनी तरफ जाकर) यह भाग मेरा है । मैं इधरच रहेगा ।
बंगाली : (बाँई तरफ जाकर) ओमार बाडी यह है । हम इधर चावल निकालेगा ।
मद्रासी : (रंगमँचके अगले हिस्सेमे जाकर) हमारे लिये यह प्लेस फर्स्ट क्लास है जी । (बंगालीसे) ब्रदर, तुम चावल निकालेगा तो थोडा हमको भी देना । हम सांभारके साथ खायेगा । अय्यो रामा, हम सांभारका नाम लेता तो मुँहमें पानी आता जी ।
सिख : (रंगमँचके ऊपरी हिस्सेमें जाकर) अस्सी यह जगह ले लेते हैं । ठंडी ठंडी हवा आती है, तो साड्डा दिल खुश । क्यों, सब खुश?
सब लोग : एकदम ठीक ।
मराठी : (यहाँ-वहाँ घूमते हुए) अभी मैं थोडा आराम करेगा ।
मद्रासी : तुम उधरच घूमो जी । हमारे पार्टमें कायकू आता तुम?
बंगाली : एकदम कोरेक्ट. देखो बोंधू, आमी सब ओपना ओपना जोगह बाँट लिया । अभी तुम एक दुसरेका जोगहमें कोदम भी नहीं रोखेगा । ठीक बात?
सब लोग : एकदम ठीक बात ।
( इतनेमें बाहरसे एक छोटे बच्चेकी आवाज आती है, "और मैं कहाँ रहूँगा?" सब उस आवाजकी तरफ देखते हैं । वहाँ एक सात-आठ सालका बच्चा खडा है -- काफी दुबला-पतला और थका हुआ है, फिर भी उसका प्यारा चेहरा छुप नहीं सकता । )
बंगाली : अरे ओ छोटा बाबू, तोमी कौन?
मद्रासी : कौन है जी तुम?
मराठी : अरे तू कोण? तेरा नांव काय?
बालक : (भोलेपनसे) मेरा नाम है ---
सिख : अरे, नाम-वाम छड्ड तू । तुस्सी हो कौन? कहाँके रहनवाले हो?
बालक : मुझे नहीं पहचानते? इतनी ज़ल्दी भूल गये मुझे? हम पहले मिले हैं ।
बंगाली : (गौरसे देखकर) छोटा बाबू, तोमारा चेहरा कोहीं देखा ऐसा लोगता है ।
मद्रासी : हमको भी ऐसाच लगता है जी ।
सिख : तुस्सी ठीक बोल रहे हो । त्वाडा चेहरा देखा हुवा लगता है, पुत्तर । पर याद नहीं आता । तूही बता, तू है कौन?
बालक : (रोने लगता है।) तुम सब मुझे भूल गये? अब मैं कहाँ जाऊँगा? क्या करूँगा?
मद्रासी : तुम रोना नही जी (अपनी आँखें बंद कर लेता है ।)
सिख : क्यों बे, तूने अखाँ क्यों बंद कर लीं?
मद्रासी : क्या करेगा जी? कोई रोता तो हम देख नहीं सकता । हमकू बुरा लगता । बच्चा रोता, हम भी रोता ।
बंगाली : अरे छोटा बाबू, मत रो । तुम्हारा माँ-बाप किधर हैं?
बालक : (सिसकते हुए) मेरा कोई नहीं, मैं अनाथ हूँ ।
मद्रासी : स्वामी, तुम्हारा नाम अनाथ है? Funny name !
मराठी : तू साला वेडा है ।
बालक : मेरी माँ कहीं खो गई है ।
मद्रासी : किधर है जी तुम्हारा अम्मा?
बंगाली : (गुस्सेमें) तोमी बीचबीचमे क्यों बोलता?
मद्रासी : हम बोलेगा जी । तुम्हारा परमिशन नहीं मँगता हमकू । (बंगाली गुस्सेमे अपना हाथ उठाता है ।) सॉरी जी, अब हम नहीं बोलेगा, कुछ भी नहीं बोलेगा ।
सिख : देखेंगे पुत्तर । ओय मुँडे, तेरी माँ कैसे खो गई?
बालक : मुझे नहीं पता । अब तो मेरे रहनेकी भी जगह नहीं है ।
मद्रासी : सिम्पल है जी । इसका नाम पूछो । नाम सुनेगा तो हम बराब्बर बोलेगा, ये किधर रहता वो ।
सिख : तूने दिल खुश कित्ता । जियो राजा, यह हुई ना गल्ल?
मद्रासी : पयला हम पूछेगा जी । बालक, नीव पेरी येन्ना?
बालक : तुम क्या पूछ रहे, अन्कल?
सिख : तुस्सी परे हट्टो जी । पुत्तर, त्वाडा नाँ की हैगा?
बालक : आप मुझसे मेरा नाम पूछ रहे हो ना?
सिख : जियो पुत्तर, तुम तो मेरे पिंडके हो । मेरी बोली समझते हो ।
बंगाली : नहीं बाबू मोशाय, इतना सुंदर बोच्चा अमार बाडीका होगा । बालक, तोमार नाम की?
मराठी : (सबको दूर हटाते हुए) वो घाबरता है आप सबसे । यह मेरे गाँवका लगता है । मुला, तुझं नांव काय?
बालक : (थोडी देर सोचकर) मैं जानता हूँ, आप सब मेरा नाम जानना चाहते हो । है ना?
मद्रासी : अय्ययो, ये बच्चा तो सब भाषा समझती है ।
बालक : मैं आप सबकी भाषा तो नहीं समझता, लेकिन आपका मतलब जानता हूँ । आप सबने मेरा नाम ही पूछा था ना? मुझे तो सिर्फ एकही भाषा आती है । मेरी माँने मुझे यही एक भाषा सिखाई है ।
सिख : कोई गल्ल नहीं पुत्तर । तू नाम तो बता अपना ।
बालक : भारत । भारत नाम है मेरा ।
मराठी : भंकस, ये भी कोई नाम है?
बंगाली : बालक, तूम हमारा मोजाक करता है? इतना ओजीब नाम हम आजतक नहीं सुना ।
बालक : मैं मज़ाक नहीं कर रहा हूँ । सचमें मेरा नाम भारत है । और मेरी माँका नाम है भारती । वह कहती है, सब हमें भूल गये हैं, इसीलिये लोगोंको हमारा नाम अजीबसा लगता है । अब मैं कहाँ जाऊँ?
सिख : तू फिक्र ना कर पुत्तर । बस्स, तू बता कि तूने किसके साथ रहना है ।
बालक : तुम सब लोग बहुत अच्छे हो । मैं सबके साथ रहना चाहूँगा । लेकिन तुम थोडेही मानोगे इस बातको?
( बालककी यह बात सुनकर सब आपसमें लडने लगते हैं कि बालक सिर्फ उनके साथ रहेगा ।उन्हें झगडते देख बालक रोने लगता है । )
मद्रासी : अय्ययो, तुम फिर रोने लगा जी । तुम रोती तो मैं भी रोती ।
बंगाली : बोच्चा, तुम क्यों रोता है? मोत रो ।
बालक : तुम आपसमें लडते-झगडते हो तो मुझे बहुत डर लगता है ।
सिख : ठीक है, पुत्तर, हम नहीं लडेंगे । पर तू दस्स तो सही, तू रहेगा किसके साथ?
बालक : मैंने कह तो दिया, मैं आप सबके साथ रहना चाहता हूँ ।
सिख : बेट्टा, यह तो मुमकीन नहीं । इसका मतबल यह होगा कि हम सबको अपनीअपनी जगह छोडकर इक्क साथ रहना होगा ।
मद्रासी : हम तैयार नहीं है जी ।
सब लोग : हम भी तैय्यार नहीं हैं ।
( इतनेमें बाहरसे एक आदमी आता है । )
आदमी : और इसकी ज़रूरत भी तो नहीं है ।
सिख : ओये, तू है कौन?
आदमी : (मुस्कराकर) मुझे नहीं पहचाना? मैं तुम्हारा पडोसी हूँ । दुर्जन खान नाम है मेरा ।
बालक : (सहमकर) मैं इसे जानता हूँ , खराब आदमी है यह ।
आदमी : (गुस्सेमें) ए लडके, चूप हो जा, वरना तुझे चुप कराना मैं जानता हूँ ।
बालक : (सबसे बिनती करते हुए) आप इसकी बात मत सुनो । मुझे याद है, जब माँ अकेली थी तब यह उसे बहुत सताता था । कहनेको तो हमारा पडोसी है ।
आदमी : (हँसकर) और पडोसी भला कभी किसीको सताता है? यह बच्चा पागल है । अपनी माँसे बिछड गया है, इसलिये बहकी-बहकी बातें कर रहा है ।
सिख : ठीक है । यह पागल है; तुस्सी तो भले आदमी लगते हो । करना क्या है इस लडकेका?
आदमी : लो करलो बात । करना है क्या इसका? सबके साथ रहनेको तैय्यार नहीं है, तो भगा दो । इस नादान के लिये तुम लोग अपनी-अपनी भाषा, अपनी संस्कृति भुलाकर एक क्यों होना चाहते हो? इतना आसान थोडेही है ना यह करना? कितनी तकलीफ़ होगी सबकॊ!
बंगाली : तोकलीफ़? कैसी तोकलीफ़?
आदमी : अब देखो, अगर तुम सब एक साथ रहने लगोगे तो इस बगीचे की सफ़ाईकी ज़िम्मेदारी तुम सबपर ही तो आयेगी ना? कभी कोई काम करे ना करे? इस झंझटसे बचना है तो अपना अपना हिस्सा बाँट लो, अपना अपना काम करॊ, और अपनी-अपनी जगह मस्त रहो । एक दूसरेसे कोई ताल्लुक ही नहीं । बस, बात खतम ।
बालक : (सबको समझानेकी कोशिशमें) फिर तो सचमुच ही बात खतम । ऐसा मत करो, ज़रा सोचो ।
बंगाली : ओ मोशाय, तोम इतना छोटा बच्चा है और बात इतना बडा कोरता है ? आँ, आ की चोमत्कार?
बालक : वक्त के झपेटोंने मुझे समझदार बनाया है । हम सब साथसाथ रहेंगे, आप सब मिलकर मेरी देखभाल करोगे, तो मैं बहुत ज़ल्दी बडा हो जाऊँगा और इस बुरे आदमीको सज़ा दूँगा । मेरी मदद करो ।
( आदमी गुस्सेमें बालकके मुँहमें तमाचा जडता है । बालक रोने लगता है । सब उसकी तरफ बढने लगते हैं तो वह आदमी उन्हें रोकता है । )
आदमी : रोने दे सालेको । बिल्कुल बदमाश है । देखा ना कैसे चटरपटर करता है । छोटा मुँह बडी बात । दोस्तों, मेरी बात मानो तो जैसा मैंने कहा है वैसे ही रहो । अपना-अपना काम करो और खुश रहो ।
सिख : (तीनोंको एक तरफ लेकर) शायद यह ठीक कह रहा है । हमें इसके झंझटमें नहीं पडना नहीं चाहिये ।
आदमी : क्या सोच रहे हो?
सिख : तुम ठीक बोल रहे हो ।
बंगाली : बोंधू, तुमी ठीक बोलछो । बहोत धोन्यबाद ।
आदमी : अब मैं चलता हूँ । लेकिन मेरी बात याद रखना । (चला जाता है । )
( उस आदमीके चले जानेके बाद चारों अपने-अपने कोनोंमें चले जाते हैं । बालक बीचमें अकेला बैठकर सिसकियाँ भरता है । )
बंगाली : ओ बालक, मोत रो । I hate tears!
मराठी : अरे ए पोरा, अब गप्प बैठो, नाहीतर कानके नीचे वाजवेगा ।
बालक : (आँसूँ पोंछते हुए) ठीक है । मेरी कोई नहीं सुनता ।मैं अनाथ हूँ, और करभी क्या सकता हूँ? मैं बारीबारी आप सबके साथ रहूँगा ।
मद्रासी : बडा प्यारा बच्चा है जी ।
मराठी : तो तू कायका वास्ते मस्का लगाता है रे?
मद्रासी : लगायेगा जी, हम मस्का लगायेगा, चटनी लगायेगा । तुम क्या करेगा जी? बोलो, तुम क्या करेगा?
मराठी : तो मी तेरा सांबार बनायेगा । तुम क्या करेगा? आँ, हिम्मत असेल तर बोल, तुम क्या करेगा?
मद्रासी : (घबराकर) तो हम पीछे हटेगा जी ।
मराठी : (हँसकर) डर गया ना?
मद्रासी : हम डरा नहीं जी, लेकिन हम पागल आदमीसे कुंजम-कुंजम डरता है जी ।
मराठी : तू मला वेडा बोला?
मद्रासी : तेरेकू वेडा बोलनेकू मैं पागल नहीं है जी ।
( दोनों एक दूसरेपर चिल्लाने लगते हैं, बालक अचानक रोने लगता है । )
बंगाली : बोच्चा, अब क्या हुआ?
बालक : ये लडते हैं तो मुझे डर लगता है, और मुझे डर लगता है तो --- (हाथकी छोटी उँगली उठाकर रोता है ।)
सिख : ए मुण्डे, इत्थे नहीं, पल्ली तरफ चला जा ।
( बच्चा रोतेरोते दुसरी तरफ निकल जाता है और सब हँसने लगते हैं । जब उनके ध्यानमें आता है कि हँसते-हँसते वे सब एक दूसरेके पास आ गये हैं, तो वे अचानक रुक जाते हैं । )
सिख : ओ यारों, तुस्सी मेरी जगहविच्च क्यों आये हो?
बंगाली : सोरदारजी, तुमी मुँह सोंभालकर बोलना । आमी जोगह पोर ही है ।
मराठी : मैं साँगता है, यह मद्रासी पक्का लोचट है, हँसकर मेरे पास आनेकू देखता है ।
मद्रासी : क्या बात करता जी? तुम्हारी घरमे तुम क्या इडली-साँभार रक्खी है जो मैं तुम्हारी पास आयेगी? मैं तुमको वॉर्न करता जी, हमसे दूर रहॊ ।
मराठी : ए, फोक्कट बडबड नहीं करनेका । यह मेराईच हिस्सा है । मेरे पास तो यह निशानी पण है । ये देखो, मेरे ज़मीनसे थोडाथोडा पानी निकलता है ।
मद्रासी : ए पानी हमारे जमीनसे आता है जी ।
सिख : ओ भाईओं, मेरी गल्ल सुनो । सब अपनी जगहमें ही हैं । थोडा हँसते-हॅसते एक दुज्जेदे पास आ गये थे । सब अपनी-अपनी जगह वापस चले जाओ । (सब पीछे हट जाते हैं ।) देखा यारों, इत्तासा प्यारा बच्चा हमें पास ले आया !
बंगाली : कोरेक्ट बोला तुम । हम उस बोच्चेको देखता है तो बोहोत खुशी होता है ।
मद्रासी : एकदम प्यारा बच्चा है जी
मराठी : ये पहला मैंच बोला ।
( बाहरसे एक औरतके सिसकनेकी आवाज़ आती है तो सब उस तरफ़ देखते हैं । वहाँसे एक दुबली-पतली औरत आती है । उसके कपडे फटे-पुराने हैं । )
सिख : तुस्सी कौन हो जी?
औरत : मैं एक दुखी अबला हूँ, क्या मेरी सहायता करोगे?
मद्रासी : तुमारा नाम सहायता है क्या जी? मेरा पडोसका औरतका नाम एकता है जी ।
बंगाली : मोशाय, तुम एकदम चूप बैठो ।
मद्रासी : माफ करो जी । अब हम बोलेगा नही । हम बोलेगा तो तुम बोलेगा की बोलता है ।
मराठी : तुम पहला रडणा बंद करो और बोलो, तुम कौन है?
औरत : कोई मेरी सहायता करो ।
मराठी : परत-परत वोहीच डायलॉग मत बोलो ।
औरत : मेरा सब कुछ लुट गया है ।
मराठी : वो ठीक है, पण म्हणजे नक्की काय हुआ है?
औरत : पहले हम बहुत सुखी थे, हमारा परिवार फला-फूला था । फिर एक दिन पडोसी गाँवसे कुछ मेहमान आये । फिर क्या था, हमारी किस्मत ही बदल गई ।
मद्रासी : ट्रॅजडीमें बदला के कॉमेडीमें? व्हेरी इण्टरेस्टींग स्टोरी जी ! हमारा तामील पिक्चरके माफ़िक --- (अचानक) माफ करना जी । अब हम नहीं बोलेगा ।
मराठी : (औरतसे) और फिर क्या हुआ?
औरत : हमारे हरे-भरे घरको, पता नहीं, किसकी नज़र लगी । जैसेही वे मेहमान आये, उन्होंने धीरे-धीरे हमारे पूरे घरपर कब्ज़ा कर लिया ।
बंगाली : बहुत खोराब । फिर?
औरत : कुछ दिनों बाद वे मेहमान तो वापस चले गये, लेकिन जाते-जाते जैसे हमारे घरकी खुशियाँ भी साथ ले गये । जहाँ शांति छाई रहती थी वहाँ हर समय झगडे होने लगे । घरका हरएक आदमी एक दूसरेपर ऐसे चिढता था, जैसे वे अलग-अलग घरके हों ... जैसे वे प्यारकी भाषा भूल चुके थे । फिर एक दिन सब अपना-अपना हिस्सा लेकर अलग हो गये ।
सिख : ओये, फिर की होया? बडी दुखभरी, लेकिन दिलचस्प कहानी है । आगे दस्सो जी ।
औरत : मैं रोई, चिल्लाई, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ । मेरे बच्चेके साथ मैं बिल्कुल अकेली रह गई । जहाँ सब अलग-अलग रहने लगे थे, मैं अकेली जाती तो कहाँ जाती? हम घरसे बेघर हुए ... यहाँ-वहाँ भटकने लगे । फिर एक दिन मेरा बच्चा मुझसे खो गया ।
( चारों अचम्भेसे एक दूसरेकी तरफ देखने लगते हैं ।
बंगाली : तोमारा नाम की, बोहन?
औरत : भारती । क्यों?
मद्रासी : और तुम्हारे बच्चेका नाम, भारत । करेक्ट?
औरत : (उत्साहित होकर) तुम लोगोंने देखा है मेरे लालको? मेरे भारतको?
( तीनों मद्रासीकी तरफ अँगारभरी आँखोंसे देखते हैं । वह डर जाता है । )
मद्रासी : नहीं देखा, सिस्टर, हम कैसे देखती जी? हमारा आँख बँद था, अब हम हमारा मुँह बंद रखेगा जी ।
औरत : (निराश स्वरमें) हे भगवान, फिरसे वही निराशा ! कबसे ढूँढ रही हूँ उसे । पता नहीं कब मिलेगा मेरा लाल?
बंगाली : इधर कोई बोच्चा नही आया ।
मराठी : उधर जाकर शोधो ।
सिख : मैं झूठ नहीं बोलता. इधर कोई बच्चा नहीं है ।
औरत : तो कहीं और जाकर खोजती हूँ उसे ।
( वह निराश होकर चली जाती है । उसके जाते ही तीनों मद्रासीपर च्चिल्लाने लगते हैं । किसीके कुछ समझमें नहीं आता है । )
मद्रासी : क्या जी, सब एक साथ बोलती? कुछ समझमें नहीं आती ।
मराठी : ए बुद्धू, समझ नहीं आती तो मध्येमध्ये क्यों झक मारती?
बंगाली : तोमारे बीचमें बोलनेका आदतसे सब गडबड होता ।
मद्रासी : क्या गडबड होता जी?
सिख : अरे पगले, तू उस बच्चेके बारेमें उस औरतको बताता तो वह ले जाती थी ना उसे अपने साथ?
मद्रासी : अय्ययो, सॉरी जी । हम समझा नहीं । अब हम कभी बीचमे नहीं बोलेगा, जी ।
मराठी : बोलेगा तो तेरी जीभ उखडून हातमें देएगा मैं ।
( इतनेमें बच्चा आता है । )
बालक : आप सब अभी भी झगड रहे हो?
सिख : नहीं पुत्तर, कोईभी लड नहीं रहा । तू फिक्र ना कर ।
मद्रासी : तुम इधर नहीं था तो इधर बहुत बडी --- बहुत बडी ---
मराठी : अरे ए, क्या सारखं बडी ---- बडी करतो?
मद्रासी : क्या करेगा जी? हमको वो करेक्ट वर्ड याद नहीं आती । मैं बोलता था कि ये बच्चा इधर नहीं थी तो बहुत बडा ---
मराठी : (हँसकर) --- बहुत बडा लफडा हुई ।
मद्रासी : (खुशीसे) एकदम बराबर --- वहीच -- इधर बहुत बडी झगडा हुई ।
बालक : झगडा हुआ?
मराठी : झगडा नहीं, मुला, लफडाच हुआ । ये साफ वेडा है ।
सिख : तुस्सी फिक्र ना कर, मुंडे, कुछ नहीं हुआ । लेकिन ज़रूर कुछ होता । देख, तू बाहर जायेगा तो जल्दी वापस आया कर ।
बालक : पर क्यों?
सिख : ये लो जी । अब तू सवाल भी करन लगा । पुत्तर, तू अपनी आँखदा तारा है । कभी हमें छोडकर जाना नहीं, समझे?
बालक : और तुम भी मुझे छोडकर नहीं जाओगे ना?
बंगाली : की बात कोरता तुमी? आमी तोमाको भालो बाशी । मतलब होमको तुमसे प्यार हो गया ।
मद्रासी : हम एक आयडिया बोलता जी । हम इस लडकेका नाम बदली करेगा ।
मराठी : (गुस्सेसे) वाह ! क्या पण आयडिया बोला । मैं सुना है कि शादीके बाद बायकोका नाम बदली करता है । पण ये एकदम नया बात है । अक्कल कुठे गयी तुझी?
मद्रासी : तुम हर टाईम हमारा इन्सल्ट कायकू करता जी? हम तुमको नहीं बोलेगा, हम ये सरदारजीको बतायेगा । सरदारजी, तुम बहुत समझदार है जी । मेरा बात सुनो । (सिखके कानोंमे कुछ कहता है ।)
सिख : (खुशीसे) ओये, ओये, जियो राजा । तुस्सी ग्रेट हो ।
बंगाली : सोरदारजी, की बात?
( सिख बंगालीके कानमें कुछ कहता है, और बंगाली उसी बातको मराठीके कानमें दोहराता है । )
मराठी : हेँ, इसमें कौनसा बडी बात है? मैं यहीच बात बोलनेवाला था ।
बालक : मेरा नाम बदलेनेकी बात? ऐसा मत करो ना ।
सिख : पुत्तर, आजसे तेरा नाम भारत नहीं ।
बालक : पर क्यों? पहलेसेही लोग मुझे भूल गये हैं । तुम मेरा नाम बदल दोगे तो फिर मुझे कोईभी पहचान नहीं पायेगा । ऐसा मत करो, प्लीज़ ।
सिख : ओये बच्चे, तूने हमारे साथ रहना है, तो इतनी बहस मत कर तू । समझा?
बालक : (निराश होकर) ठीक है, अब मैं कुछ नहीं कहूँगा ।
सिख : यह हुई ना गल्ल ! अब हम ज़रा बाहर जाकर आते हैं । तू यह जगह छोडकर कहीं न जाना ।
बालक : कहीं नहीं जाऊँगा । पर एक सवाल पूछूँ?
मद्रासी : (हँसते हुए) अय्ययो, तुम तो हमारा गुरूका गुरू निकला जी, जगदगुरू ।
बालक : क्यों?
मद्रासी : अभी तुम बोलता कि सवाल नहीं बोलेगा, और अभी बोलता कि एक सवाल पूछूँ? हमभी एकदम ऐसाच करता जी ।
मराठी : यहीच तो तकलीफ़ है । तुम बीचबीचमें बोलता है और घोटाळा करता है ।
बालक : मैं वचन देता हूँ, मैं कोई घोटाला नहीं करूँगा । मदर प्रोमीस । लेकिन सिर्फ़ एक सवाल पूछना चाहता हूँ ।
सिख : जल्दी पूछ, की पूछना है तूने?
बालक : मुझे अकेला छोडकर तुम सब कहाँ जा रहे हो?
सिख : बल्ले बल्ले, यह भी कोई बात हुई? पुत्तर, अपने रहनेका बंदोबस्त हो गया । अब कुछ कमाना भी तो है । समझ गये?
बालक : समझ गया । तुम सब पैसे कमाने जा रहे हो?
बंगाली : बालक, तुम बोहोत सोमझदार है --- ओमार जैसा ।
बालक : (मुस्कराकर) समझदार तो हूँ, तुम सब लोगों जैसा ।
सिख : ठीक है, तो चलो भाईयों ।
( सब जाने लगते हैं, तो अचानक बालक उन्हें रोकता है । )
बालक : ठहरो, ठहरो । (सब वापस लौटते हैं ।) एक सवाल पूछना है ।
मद्रासी : अय्ययो, फिर सवाल जी?
बालक : एक आखरी सवाल ।
सिख : मुण्डे, तेरे सवाल तो खत्म ही नहीं हुंदे । पूछ ।
बालक : तुम अब बाहर जा रहे हो । (सब सर हिलाते हैं ।) फिर तुमसे कोई मिलने आयेगा । (सब सर हिलाते हैं ।) वह मुझे देखेगा ।
मराठी : सरळ-सरळ पूछॊ । अपना मान हिलाहिलाके दुखने लगा ।
बालक : कोई मुझे देखेगा तो मेरा नाम ज़रूर पूछेगा । पूछेगा की नहीं?
मराठी : पूछेगा, मग? तेरेको म्हणणेका क्या है?
बालक : तुम सब कह रहे हो कि तुमने मेरा नाम बदल दिया ।
सिख : हाँ, बदल दिया । तो की होया?
बालक : कोई मुझसे मेरा नाम पूछेगा तो मैं क्या जवाब दूँगा?
मराठी : (सोचकर) अरे ये पोरगा बरोबर बोलता है । इसका हमने विचार ही नहीं किया ।
बालक : तो अब करो । क्या मैं उनसे कहूँ कि इन लोगोंने मेरा नाम बदल दिया है और मैं पहले कोई और था?
मद्रासी : अय्ययो, ऐसा नहीं बोलना जी, गडबड होयेंगा ।
बालक : तो फिर बोलो, मेरा नाम --- नया नाम क्या है?
सिख : (सोचते हुए) त्वाडा नाम --- नाम --- अनाम कैसे रहेगा? तेरा नाम होगा अनाम ।
बालक : अनाम सिंग?
बंगाली : नोही, सिंग नहीं । तोमी सरदारजी है क्या?
बालक : मुझे नहीं पता ।
बंगाली : इसीलिये आमी बोलता है, तोमार नाम सिंग नहीं, खाली अनाम ।
बालक : खाली अनाम क्यों? गुरनाम क्यों नहीं? कार्तिक क्यों नहीं? शिवाजी क्यों नहीं? मोहनलाल क्यों नहीं?
सिख : (गुस्सेमें) अबे चूप, ज़्यादा बकबक ना कर । नहीं तो ---
बालक : क्या करोगे? बताओ ----
सिख : (और चिढकर) तो एकदम ऊपर भेज दूँगा ।
बालक : ऊपर माने?
सिख : स्वर्गमें ---
बालक : वह तो बहुतही ऊपर है । कैसे भेजोगे? गाडीसे या हवाई जहाज़से?
सिख : (चिल्लाकर) नहीं मालूम ।
बालक : तो फिर भेजोगे कैसे?
सिख : चलो दोस्तों, इस शैतानके मुँह लगनेका कोई मतबल नहीं । बोल बच्चे, तेरा नाम क्या है?
बालक : खाली अनाम । गुरनाम नहीं, सतनाम नहीं, हरनाम नहीं, कार्तिक नहीं, शिवाजी नहीं, मोहनलाल नहीं । सिर्फ अनाम । मैं जानता हूँ । सब जानता हूँ ।
बंगाली : कोई गोलती नहीं कोरना । सोमझा?
बालक : पोक्का समझा । कोई गोलती नहीं कोरेगा ।
बंगाली : ए बाबू, तोमी हमारा मोज़ाक कोरता?
बालक : नहीं, आमी तोमारा मोज़ाक नोहीं कोरता ।
बंगाली : फिर मोज़ाक किया ।
सिख : ओ बाबू, तू इस बच्चेके क्यों मुँह लगता है? चलो, कुछ कमानेकी सोचते हैं ।
बंगाली : चोलो मोशाय ।
( सब बाहर चले जाते हैं । )
बालक : (चिढाते हुए) चोलो मोशाय । बातें तो ऐसी करते हैं, जैसे जिगरी दोस्त हो । और झगडते ऐसे हैं जैसे पुराने दुश्मन हों और एक दूसरेकी जान ले लेंगे । यह हिस्सा इसका, वह हिस्सा उसका । मैं हूँ एक और रहना पडेगा इन सबके साथ, चार हिस्सोंमें बँटकर । कहते हैं मेरा नाम भी बदल दिया है । पहले भारत था, अब हूँ अनाम । अभी छोटा हूँ, शिकायत भी तो कर नहीं सकता किसीसे । जैसे नचाते हैं, वैसे नाचना पडेगा । जैसे कोई इन्सानका नहीं, मदारीकी डुगडुगीपर नाचनेवाला बँदरका बच्चा हूँ ।
( बाहरसे वह औरत आती है । )
औरत : बेटा, मेरे सवालका जवाब दोगे?
बालक : दूँगा । बोलो ।
औरत : कुछ देर पहले यहाँ कुछ आदमी थे ।
बालक : कुछ देर पहले थे, अब नहीं ।
औरत : कहाँ गये हैं?
बालक : पता नहीं । छोटा हूँ ना, मुझे बताकर नहीं गये ।
औरत : कब आयेंगे?
बालक : मैं कुछ नहीं जानता, माँजी । (औरतकी आँखें भर आती हैं ।) क्या हुआ, माँजी? तुम रो क्यों रही हो?
औरत : तुमने मुझे माँ कहा, तो मुझे मेरे बेटेकी याद आयी ।
बालक : तुम्हारा बच्चा खो गया है? कहाँ है वह? तुम्हारा घर कहाँ है?
औरत : पता नहीं ।मेरा घर मुझसे छिन गया, मेरा बच्चा भी मुझसे छिन गया । अब मेरा कोई नहीं ।
बालक : मेरा भी कोई नहीं । अब हम साथ-साथ रहेंगे । यहींपर ।
औरत : तुम यहाँ रहते हो?
बालक : अब यहीं रहता हूँ । तुम भी यहीं पर रहो । मैं उन लोगोंसे कह दूँगा । वे आपसमें बहुत झगडते हैं, लेकिन मुझसे बहुत प्यार करते हैं । मेरी बात वे कभी नहीं टालेंगे । रहोगी ना मेरे साथ?
औरत : बडे प्यारे बच्चे हो तुम । तुम्हारा नाम क्या है?
बालक : (अपनेसे) अब फँस गया ना? मैं इससे ना झूठ बोल सकता हूँ, और ना सच बोलनेकी हिम्मत रखता हूँ । मेरा नाम अनाम है । अजीबसा नाम है ना?
औरत : ज़रा भी नहीं । बहुत प्यारा नाम है, बिल्कुल तुम्हारे जैसा ।
बालक : सच?
औरत : सच । मैं झूठ क्यों बोलूँ?
बालक : लेकिन माँ, मैंने तुमसे झूठ बोला ।
औरत : क्या?
बालक : माँ, तुमने मुझे पहचाना नहीं?
औरत : नहीं, लेकिन जब मैंने तुम्हें पहली बार देखा, तो ज़रूर ऐसा लगा कि तुम्हें पहले भी देखा है ।
बालक : माँ, मेरा नाम अनाम नहीं । मैं भारत हूँ --- तुम्हारा बेटा । तुम हमेशा कहती थी कि मैं तुम्हारी आँखोंका तारा हूँ । कुछ याद आया?
औरत : (उसे गले लगाते हुए) भारत, मेरे लाल, कहाँ खो गये थे इतने दिन? मैंने तुम्हें कहाँ कहाँ नहीं ढूंढा?
बालक : माँ ---
औरत : मुझे फिरसे पुकारो, बेटा । तुम्हारे मुँहसे यह शब्द सुनने के लिये मेरे कान कबसे तरस गये थे ।
बालक : मतलब?
औरत : यह जगह हमारी है, बेटा । कभी फलाफूला यह बगीचा हमारी अमानत थी ।
बालक : लेकिन माँ, यहाँ तो वे चार लोग रहते हैं ।
औरत : यही तो रोना है, बेटा । मुझ अबलाकी कौन सुनता है? कौन पहचानता है मुझे? खुद अपनी जगहके लिये मारेमारे घूम रही हूँ ।
बालक : माँ, अब हम यहीं रहेंगे ना?
औरत : और कहाँ जा सकते है, मेरे लाल?
( इसी वक्त वह आदमी आता है । )
आदमी : तुम्हें छोडकर मैं भी कहाँ जा सकता हूँ?
बालक : (औरतके पीछे छिपते हुए) माँ, मुझे इस आदमीसे बहुत डर लगता है । बहुत बुरा है यह ।
आदमी : मुझसे डर लगता है? मैं तो पडोसी हूँ तुम्हारा, मुझसे क्या डरना?
आदमी : (औरतसे) और तुम यहाँ क्या कर रही हो?
औरत : यह मेरा बेटा है और मैं इस जगहकी मालकिन हूँ ।
आदमी : बकवास बंद करो । मालकिन हो नहीं, थी । अब यह बगीचा किसी औरका है । जो जहाँ रहता है वही वहाँका मालिक होता है । यही कानून है यहाँका ।
औरत : और जो पहले रहता था?
आदमी : अब कोई हक नहीं है उसका । चली जाओ यहाँसे ।
बालक : (आदमीकी तरफ बढते हुए) मेरी माँको कुछ मत कहना । मैं तुम्हें मारूँगा । यह घर हमारा है । मेरी माँ कभी झूठ नहीं बोलती । चले जाओ यहाँसे ।
आदमी : (हँसकर) कैसे जा सकता हूँ मैं? अब तो मैं यहींपर रहने आया हूँ ।
औरत : यह घर तुम्हारा नहीं ।
आदमी : अब यह घर तुम्हारा भी तो नहीं ।
बालक : मैं यहाँ रहता हूँ और यह मेरी माँ है । हम यहीं रहेंगे ।
आदमी : मैं भी यहाँसे नहीं हिलनेवाला । कभी तुम्हारा मेहमान था मैं, और मेहमानको घरसे निकालना कहाँका धर्म है?
औरत : धर्म-अधर्मकी बातें तुम क्या जानो?
बालक : अब वे लोग वापस आयेंगे तो मैं तुम्हारी शिकायत करूँगा ।
आदमी : शौकसे करो मेरी शिकायत । तुम्हारी बात उन्होंने पहले कहाँ सुनी है, जो अब सुनेंगे? देखो, वे आ रहे हैं ।
( सिख, मराठी, मद्रासी और बंगाली आते हैं । ) कर लो शिकायत ।
सिख : सत स्री अकाल, भय्या, की हाल है त्वाडा?
आदमी : चंगा हूँ, दोस्त । थोडा मुसीबतमें हूँ ।
सिख : दस्सो, क्या प्रॉब्लेम है?
बंगाली : तोकलीफ क्या है, बोंधू? हम तुम्हारा मोदद करेगा ।
मद्रासी : अय्ययो, don't worry, जी ।
मराठी : बोल मित्रा, क्या त्रास है तेरेको?
आदमी : शुक्रिया । मुझे यकीन था कि तुम सब मेरी मदद ज़रूर करोगे । बात यह है कि आजकल मेरे घरमें जगह कुछ कम पड रही है । मुझे जगहकी तलाश थी ।
मद्रासी : पर्वा इल्ले, फिक्र नॉट, जी । तुम हमारा घरमें रहो ।
बालक : तुम ऐसा क्यों कर रहे हो?
मद्रासी : ए बच्चा, तुम बहुत सवाल करता जी । सरदारजी, तुम ये आदमीको अपना घरमे रक्खो जी । यह तुम्हारा रिश्तेदार मालूम होता ।
बंगाली : ओमार सोरकार भी बोलता है, "ओतिथी देवो भव ।"
आदमी : मुझे तुमसे यही उम्मीद थी । मैं अभी जाकर अपना सामान ले आता हूँ ।
सिख : सामान भी है त्वाडेकुल?
आदमी : (हँसकर) बस थोडासा है । (चला जाता है ।)
बालक : तुम पछताओगे, मैं बता रहा हूँ ।
सिख : ओये, तू चुप्प कर । बहुत बोलता है । (औरतसे) और तुम यहाँ क्यों आई हो?
बालक : यह मेरी माँ है ।
सब : (अचम्भेसे) क्या?
बालक : (अपने आपको संभालकर) सचमुचवाली माँ नहीं, ऐसेही ।
मराठी : होयेंगी, पण इधर कायकू?
बालक : मेरे जैसे इसका भी कोई नहीं ।
बंगाली : तो हम की कोरेगा, बोंधू?
बालक : इसे यहाँ रहने दो ।
सब : (चिल्लाकर) क्या?
बालक : इसे मेरे साथ रहने दो; उस पराये आदमीको भी तो तुम यहाँ रहने दोगे । यह मुझसे बहुत प्यार करती है । मेरी माँ, मेरा मतलब, मेरी माँ जैसी है । इसे भी यहाँ रहने दो ।
औरत : हम यहीं कहीं एक कोनेमें पडे रहेंगे । मैं हर तरहसे तुम लोगोंकी सेवा करूँगी ।
बंगाली : रहने दो इसे । यह हम सोबको खाना खिलायेगी । मोच्छी-चावल ---
मद्रासी : इडली-साँबार ---
मराठी : लसनकी चटणी और जवारकी रोटी ---
सिख : मकईदी रोटी और सरसोंदा साग ---
सब : ठीक है, इसे यहाँ रहने देते हैं ।
औरत : मैं तुम्हारा उपकार कभी नहीं भूलूंगी ।
( इतनेमें वह आदमी ढेर सारा सामान लेकर आता है और सिखके हिस्सेमें रख देता है । )
आदमी : मैं भी तुम्हारा उपकार कभी नहीं भूलूंगा ।
सिख : (हँसकर) कोई बात नहीं दोस्त । तुम तो मेहमान हो हमारे ।
आदमी : एक एहसान और कर दो, दोस्त ।
सिख : दस्सो, याराँ ।
आदमी : देखो, बुरा मत मानना, मुझे इतनी कम जगहमें रहनेकी आदत नहीं ।
सिख : तो, की कराँगा?
आदमी : तो तुम यह जगह खाली कर दो --- और कहीं और चले जाओ ।
सिख : (झल्लाकर) ऐ, क्या पागलोंजैसी बात कर रहे हो?
आदमी : देखो भई, गुस्सा होनेसे कोई फायदा नहीं । भलाई इसीमें है, कि तुम मेरा कहा मानो और यहाँसे चले जाओ, वरना ---
सिख : वरना की करोगे?
आदमी : (हँसकर) वरना तुम अपनी मौतको दावत दोगे । मैं यहाँ अकेला नहीं हूँ । उस तरफ देखो, मेरे और भी साथी हैं । मेरे एक निशानेपर वे तुम्हारा नामोनिशानतक मिटानेको तैयार हैं ।अब चुपचाप निकल जाओ यहाँसे ।
( वह आदमी धक्के देकर सिखको अपनी जगहसे निकाल देता है । )
सिख : (असहायतासे) अरे, कोई तो मेरी मदद करो । (सब अपना मुँह फेर लेते हैं ।)
बालक : मैंने तुम्हें पहलेसे सचेत किया था ।
सिख : तू चुप बैठ । मैं पहलेसे परेशान हूँ ।
( रंगमंचके एक कोनेमें जाकर बैठ जाता है । )
आदमी : (बंगाली आदमीसे) बाबू मोशाय, क्या मैं आपकी जगहमेंसे थोडी जगह ले सकता हूँ?
बंगाली : तुम ये की बात कोरता है?
आदमी : आपके भलेकी बात कोरता हूँ । मैं मेरे मेहमानोंको यहाँपर ला रहा हूँ । ज़ाहिर है, हमें ज्यादा जगहकी ज़रूरत होगी । मैं जा रहा हूँ, बहुत जल्द अपने मेहमानॊंको लेकर वापस आऊँगा । और हाँ, कोई चालाकी करनेकी कोशिश भी मत करना । (जाता है ।)
बंगाली : अरे कोई मेरा मोदद कोरो ।
मराठी : अरे, कोई मेरा मदत करो । अब मेरी बारी आनेवली है । हे भगवान ---
औरत : भगवान भी उन्हींकी मदद करता है, जो अपनी मदद खुद करते हैं ।
मद्रासी : वो कैसा करेंगा जी? जल्दी बोलो ।
सिख : ओ माँ, जल्दी दस्सो जी । नहीं तो वह शैतान हम लोगोंकी पूरी ज़मीन निगल जायेगा ।
औरत : ऐसा मत होने दो । इस ज़मीनको मत खोना, इसके अंदर सोना भरा पडा है ।
सब : सोना ?
मराठी : तेरेको क्या माहीत? लवकर बोलो ।
औरत : कभी हम यहींपर रहा करते थे । हमें सब पता है । (सब सोचने लगते हैं ।) ज़्यादा मत सोचो, उतना वक्त नहीं है । पहले इस दुश्मनसे छुटकारा तो पा लो, फिर मैं आपको सब बता दूँगी ।
सिख : उसके पास कितने सारे आदमी हैं । मैं अकेला कर भी क्या सकता हूँ?
औरत : यही तो भूल कर रहे हो तुम । तुम अकेले नहीं हो ।
सिख : की मतबल?
औरत : तुम एक दूसरेको भूल चुके हो --- अपनी असली ताकतको भूल गये हो । बंधी मुट्ठी लाखकी ---
बंगाली : हम क्या कोरेगा? जल्दी सोचो, दुश्मन आ रहा है ।
सिख : अब सोचना क्या है जी? यह औरत सच कह रही है । हम सब मिलकर इन शैतानोंका सामना करेंगे ।
( सब आपसमे हाथ मिलाते हैं । इतनेमें वह आदमी, अपने साथ दो-तीन आदमियोंको ले आता है । )
आदमी : चलो दोस्तों, हम आ गये हैं, घर खाली करो ।
सिख : घर हम नहीं, तुम खाली करोगे । अब हम सब साथ-साथ हैं ।
( दोनो गुटोंमें थोडी देरके लिये मुकाबला होता है । नये आदमियोंका इनके सामने कुछ नहीं चलता, और वे भाग जाते हैं । )
मद्रासी : अय्ययो, सब भाग गया जी । मेरेसे डरके भाग गया ।
मराठी : अकेले तेरेसे नहीं, हम सबसे घाबरून भाग गये वो लोग ।
बंगाली : एकदम सोच बोला । हम सब मिलकर उनको होराया ।
सिख : और हम सब मिलकर उनका सामान भी बाहर फेकेंगे ।
( सब मिलकर सामान बाहर फेंकने लगते हैं । )
औरत : अब यह गुलशन हमारा है ।
बालक : और अब हम यहाँ राज करेंगे ।

* * * * * पर्दा गिरने लगता है * * * * *

लक्ष्मीनारायण हटंगडी
(suneelhattangadi@gmail.com)

सबसे बडा कौन?

( पर्दा खुलनेपर बहुत शोर सुनाई देता है। अचानक एक आवाज़ ज़ोरसे सुनाई देती है, "सब चुप हो जाऒ।" कुछ देर सब शांत हो जाता है, और फिर धीरे धीरे शोर बढने लगता है। फिरसे वही आवाज़ आती है, "अरे मूर्खों, चुप हो जाओ।" सब धीरेधीरे चुप हो जाते हैं। )

इतिहास : यह कौन बोला? किस मूर्ख ने मुझे ’मूर्ख’ कहा? विज्ञान, यह ढिटाई सिर्फ तुमही कर सकते हो।
विज्ञान : बुढऊ, काश की मैं यह कहता। लेकिन जो सभी जानते हैं उसे दोहरानेकी मूर्खता मैं भला क्यों करूं?
इतिहास : क्या मतलब?
विज्ञान : यही की तुम मूर्ख हो। केवल अतीत मे जीते हो।
इतिहास : तो? मैं अतीत हूं, इसीलिये महत्त्वपूर्ण हूं।
विज्ञान : (कुत्सित हंसकर) अच्छा! तो तुम इस भ्रममे हो? सठिया गये हो। अगर मैं न होता तो ना जाने दुनिया कहां होती? विश्व ने इतनी प्रगति की है तो सिर्फ मेरे आविष्कारों के कारण। मैने ही इस विशाल विश्व को करीब ला रक्खा है।
इतिहास : और वह कैसे?
विज्ञान : हवाई जहाज़, टेलिफोन, टेलिग्राम, टीव्ही, विडिऒ, और अब इंटरनेट। विज्ञान ने लोगोंको ना केवल ज्ञान दिया है, बल्कि उनका मनोरंजन भी किया है। अब कौन इन्कार कर सकता है कि विज्ञान ही सबसे महत्त्वपूर्ण है? ना कि इतिहास ...
भूगोल : विज्ञान, तुम बिल्कुल सच बोल रहे हो --
विज्ञान : धन्यवाद ... धन्यवाद ...
भूगोल : तुम सच बोल रहे हो कि इतिहास सबसे महत्त्वपूर्ण नहीं। लेकिन तुम गलत बोल रहे हो कि तुम, विज्ञान, सबसे महत्त्वपूर्ण हो।
विज्ञान : क्या मतलब? मुझसे ज़्यादा महत्त्वपूर्ण कौन हो सकता है?
भूगोल : (गर्वसे) मैं --- भूगोल।
इतिहास : यह क्या मज़ाक है?
भूगोल : इतिहास, मुझे कहींसे जलनेकी बू आ रही है। मेरी तो यह समझमे नही आता कि इतिहास और भूगोल को एक साथ क्यों रखा जाता है? इतिहास के अस्तित्वमे आनेसे कई पहलेसे मैं यहांपर हूं। मैं ही तो सबको विश्वके बारेमें जानकारी देता हूं। अलग-अलग प्रांत और वहांके हालातके बारेमे मैं ही तो सबको बताता हूं। अब इसमे ज़रा भी शक नहीं कि भूगोल ही सबसे महत्त्वपूर्ण है।
गणित : क्षमा चाहता हूं। बहुत देरसे मैं चुपचाप आप सबकी बकवास सुन रहा हूं। सच कहूं तो आपके इस मूर्ख वादविवादोंमे मुझे ज़रासी भी दिलचस्पी नहीं थी। लेकिन ज़्यादा देर चुप रहना भी कठिण था। आखिर इस संसारमे सिर्फ मैं ही सही मापदण्ड हूं सच और झूट का
विज्ञान : (गुस्सेमे) यह तुम कैसे कह सकते हो? क्या तुम नहीं जानते कि मैं विज्ञान हूं?
गणित : जानता हूं, जानता हूं। भलीभांति जानता हूं। लेकिन शायद तुम यह भूल गये हो कि विज्ञान को भी गणित की मदद लेनी पडती है। इसके बादही विज्ञान किसी निर्णयपर पहुंच सकता है। मेरे बगैर सब कुछ बेकार है। जानते हो, एक शून्यके लगाने या हटाने से साम्राज्य बन या टूट सकते हैं। इस बातका तो इतिहास साक्षी है।
इतिहास : भाई, इसी बातको तो मैं दोहरा रहा हूं। इतिहास सबका साक्षी है। इतिहास नहीं तो कुछ भी नहीं। पूरे विश्वका आरंभ ही इतिहास से होता है।
भूगोल : मित्र, तुम गलत हो। विश्वका इतिहास आरंभ होने के लिये पहले विश्वका होना ज़रूरी होता है। और मैं -- भूगोल ही -- विश्व की जानकारी देता हूं।
( फिरसे सब एक साथ चिल्लाने लगते हैं। फिरसे वही तीखी आवाज़ आती है, "चुप हो जाओ।" सब शांत हो जाते हैं। )
सब : यह कौन बोला?
( एक छोटीसी लडकी, भाषा, सामने आती है। )
भाषा : मैं बोली। कोई शक?
सब : तुम कौन हो?
भाषा : (मुस्कराकर) क्या, तुम सब मुझे भूल गये?
इतिहास : अरे, हम तुम्हे जानते ही नहीं ---
भूगोल : --- तो तुम्हें भूलने का सवाल ही नहीं उठता!
भाषा : मैंने तुम सभी को जन्म दिया।
विज्ञान : तुमने? और हमें जन्म दिया? ज़रा सुनो तो इसकी बकवास!!
( सब ठहाका लगाकर हंसने लगते हैं। )
भाषा : हंसो नहीं। यह पूर्णत: सच है कि मैने ही तुम्हें जन्म दिया है। सब लोग तुम्हें जानते हैं तो सिर्फ मेरे कारण।
गणित : यह कैसे हो सकता है? तुम तो इतनी छोटी लगती हो। ऐसे लगता है कि अभी तुम्हारे दूध के दांत भी नहीं गिरे।
विज्ञान : तुम हमें कैसे जन्म दे सकती हो?
इतिहास : इतने पुराने इतिहास को?
भूगोल : इतने लंबे-चौडे और विशाल भूगोल को?
भाषा : (हंसते हुए) यही तो मेरे बारेमें सबसे मज़ेकी और रहस्यपूर्ण बात है। मैं सैंकडो, हज़ारों साल पुरानी हूं -- और फिर भी जवान हूं -- नईनई सी -- ताज़ा और हरीभरी!
इतिहास : देखो, बहुत हुआ। अब यह घुमाफिराकर बोलना बस करो, और यह बताओ कि तुम हो कौन।
भाषा : मैं भाषा हूं -- मैंने ही तुम सबको जन्म दिया। मैंही सबका माध्यम हूं। यह पूरा विश्व तुम्हें और तुम्हारे विषयमे जानता है क्योंकि मैं, भाषा, तुम्हें जन्म देती हूं। भाषा के आविष्कारसे ही दुनियामे सारा व्यवहार सरल हो गया है।
गणित : वह कैसे?
भाषा : ध्यानसे सुनो। इतिहास, भूगोल, विज्ञान, गणित हो या कोई और विषय हो, भाषा ही तो सबको जन्म देती है। मैं समय के साथ बडी होती हूं -- जैसेजैसे मानवजाति विकसित होती है वैसेवैसे मेरा भी विकास होता रहता है। और इसीलिये मै जितनी पुरानी होती हूं, उतनी ही नई रहती हूं। कुछ आई बात समझमें?
गणित : दोस्तों, मैं सोचता हूं कि इसकी बातमे दम है, सच्चाई है। ज़रा सोचो, भाषा है, इसीलिये तो लोग हमें जानते हैं, पहचानते हैं।
भाषा : सच कहा, मित्र। अगर मैं ना होती तो तुम सबको कौन जानता और कौन पढता? तो मानते हो कि मैं सबसे महत्वपूर्ण हूं?
इतिहास : यह बात भले ही गणित मानता हो, मैं नही मानता।
भाषा : (आश्चर्यसे) नहीं मानते?
भूगोल : मैं इतिहासके साथ हूं। मैं भी नहीं मानता।
विज्ञान : मैं भी नहीं मानता।
( सब एक साथ चिल्लाने और लडने लगते हैं। तभी अंदरसे एक लडका आता है और उन सबको रोकनेकी कोशिश करता है। )
लडका : आप सब शांत रहिये। मेरी बात सुनिये।
इतिहास : अब तुम कौन हो?
भूगोल : और कहांसे आये हो?
सब : आखिर हो कौन तुम?
लडका : मैं एक विद्यार्थी हूं। मेरी मानो तो तुम सब सही हो ... और सब गलत भी हो।
भाषा : मूर्ख बालक, कोई एक ही समय सही और गलत कैसे हो सकता है? क्या तुम अपनी भाषा भूल गये हो?
लडका : (मुस्कराकर) नहीं, मैं अपनी भाषा नहीं भूला। मैं अपनी भाषाको और तुम सबको अच्छी तरह जानता हूं। सच बात तो यह है कि हम विद्यार्थियों के लिये सभी विषय महत्त्वपूर्ण होते हैं। और दूसरी सच बात यह भी है कि अब सिर्फ तुम ही नहीं हो ...
सब : क्या मतलब?
लडका : मतलब यह कि दुनिया अब बहुत आगे निकल चुकी है। मानव बहुत तरक्की कर चुका है और तरक्की कर भी रहा है। इन सब पुराने विषयोंके साथसाथ कई नये विषय भी आ गये हैं।
सब : जैसे?
लडका : जैसे कम्प्युटर, पर्यावरण, संगीत, नाट्य, चित्रकला और इतने सारे कि जिनके नाम भी मुझे इस वक्त याद नहीं आते। जैसे मैंने अभीअभी कहा, मानव बहुत तरक्की कर चुका है। और हमें चाहिये कि हम समय के साथ साथ कदम मिलाकर चलें। अगर हमनें ऐसा नहीं किया तो हमारा ज्ञान अधूरा रह जायेगा।
गणित : मैंने पहलेही कहा, तुम सच बोल रहे हो। मैं मानता हूं तुम्हारी बात।
लडका : हम विद्यार्थियोंको सभी विषय मन लगाकर पढने चाहिये। यहि सच्चा ज्ञान है। और एक मज़ेकी बात कहूं? कईं बार मन ऊब जाता है और पाठशाला छोडकर भाग जानेको दिल करता है। लेकिन अगले क्षण ही समझमें आता है कि आजके युग की यही ज़रूरत है। इसीलिये अब लडना बंद करो और अपनीअपनी जगह बैठ जाओ।
( धीरेधीरे सभी विषय अंदर चले जाते हैं और कुछ देर के लिये रंगमंचपर कोई नहीं होता। जब धीरेधीरे उजाला होने लगता है, तो एक लडका अपनी टेबलके सामने बैठा ऊंगता दिखाई देता है। उसके सामने बहुत सारी किताबें बिखरी पडी हुई हैं। इतने मे उसके पिताजी/माताजी/बडा भाई आते हैं और उसे जगाते हैं। )
व्यक्ति : जाग जाओ, जाग जाओ।
लडका : (आंखे मलते हुए जागता है) क्या मैं सो गया था?
व्यक्ति : हां, तुम सो गये थे और नींद मे कुछ बडबडा भी रहे थे। क्या तुमने कोई सपना देखा?
लडका : (हंसते हुए) हां, मैने एक बडा ही अज़ीब सपना देखा। हमारी हिंदी के अध्यापकजी ने हमें एक निबंध लिखनेके लिये कहा था। विषय है, "मेरा प्रिय विषय"।
व्यक्ति : तो तुमने क्या सपना देखा?
लडका : यही कि सारे विषय मेरे सपनेमें आकर आपसमें लडझगड रहे थे कि कौनसा विषय सबसे महत्त्वपूर्ण है।
व्यक्ति : तो तुमने क्या देखा? जो भी देखा हो, चलो, अब जागने का समय हुआ है। एक बात गांठ बांध लो, सिर्फ वही इन्सान तरक्की कर सकता है जो देखे हुए सपनॊंको जागृत रूप देनेकी चेष्टा करे।
लडका : तुम सच कह रहे हो। अब मैं जल्दीसे अपना निबंध लिख देता हूं और पाठशाला जानेकी तैयारी करने लगता हूं।
( लडका उठकर अपनी बिखरी हुई किताबें समेटने लगता है। धीरेधीरे पर्दा गिरने लगता है। )


लेखक

लक्ष्मीनारायण हटंगडी
EC51/B104, Sai Suman CHS,
Evershine City, Vasai (E)
PIN 401208
(E-mail: suneelhattangadi@gmail.com)