( एक बगीचेका दृश्य -- अब बगीचा काफी सूख गया है । वहाँ अब ना कोई पेड है, और ना ही रंगबिरंगी फूलोंकी बहार -- हाँ, शायद अपने बीते दिनोंकी याद दिलानेके लिये यहाँ-वहाँ कुछ फल-फूल पडे हैं । पर्दा ऊपर उठता है तो वहाँ कोई नहीं होता । कुछ देर बाद धीरेधीरे कुछ लोगोंकी आवाज़ें सुनाई देने लगती हैं, और फिर चार लोग रंगमंचपर आते हैं -- थके-हारे हुए । उनमेंसे एक सिख है; दूसरा मद्रासी, तीसरा बंगाली और चौथा मराठी । )
मद्रासी : और कितना दूर है जी?
मराठी : ए, मला कायको विचारता है? तेरेकू मैं थोडाच लाया?
मद्रासी : अय्ययो, इतना गुस्सा कायकू करता जी? हम ऐसेच पूछा तुमारेकू । Don't be angry, जी ।
मराठी : हँ, मेरेको स्वत: बहुत दम लगा है ।
मद्रासी : बालाजीका कसम, हम भी बहुत थक गया है जी । Very tired. दो दिन हुवा, हम चलताच रहता, चलताच रहता ।
बंगाली : बाबू मोशाय, एकदम कोरेक्ट बोला तोमी । एकदम सोच बोला । आमी भीशोण टायर्ड, मोतलब बोहोत टायर्ड ।
सिख : (हँसकर) ओह, बल्ले बल्ले, तुस्सी तो पूरी लौंडिया हो, लौंडिया ।
मद्रासी : हम बोल दिया जी, हम टायर्ड हो गया । हम अभी इधरच बैठेगा । (वहीं बैठकर अपने पैर दबाने लगता है ।)
बंगाली : थोडा देर होम भी बैठेगा । (बैठता है ।)
मराठी : तो मैं किसका घोडा मारा? मैं पण बैठेगा । (बैठकर हाथ-पैर दबाने लगता है ।)
सिख : ये लोजी । सब बैठ गये, तो अस्सीं की करांगा? (बैठ जाता है ।)
मद्रासी : अय्योयो, रहनेका जगह ढूँढो जी । बैठो नहीं ।
मराठी : तर काय? निकले थे जगह शोधनेको, और अबतक कुछ हुवायच नहीं ।
मद्रासी : हमकू बहुत भूख लगा जी ।
बंगाली : (यहाँवहाँ देखकर) भालो, यह फोल पडा है इधर ।
( सब लोग उस जगह दौडते हैं और फल उठानेके लिये झगडने लगते हैं । सिर्फ बंगाली वहाँ पडे हुए फूल उठाकर उनकी खुशबू लेता है । सिख आदमी मराठी और मद्रासीको दूर हटाकर फल उठाता है । )
सिख : तुस्सी ज़रा परे हट जाओ जी । हरएक को फल मिलेगा । तुस्सी झगडते क्यों हो?
बंगाली : तोमी कायको झगडा कोरता है? यह फूल लॊ, कितना सुंदर है ।
मद्रासी : अय्ययो, तुम क्या बात करता जी? ये फुलका ये सूँघ लेकर पेट भरता क्या?
मराठी : अरेरे, ये बोला तो क्या बोला?
मद्रासी : ये बोला तो क्या बोलता जी? हम ऍक्शन करकेच दिखाता तुमको । (फूल लेकर सूँघता है ।) ये बोला हम । फूलका सूँघ लेकर पेट भरता क्या?
सिख : (मद्रासीको दो फल देकर) तुस्सी ये फल लो जी । झगडा करने की ज़रूरत नहीं ।
मराठी : सरदारजी, ए मद्रासीकू दो फल क्यों? मेरेकू भी मिलना चाहिये ।
मद्रासी : हम परमिट नहीं करेगा जी । नो, नो । भूखका नाम पहला हमींच लिया ना? हमकू दो फल मिला तो तुमारा क्या जाता?
बंगाली : सोरदारजी, हमारा फोल हमको दो ।
( सिख सबको एक-एक फल देता है, और सब फल खाते हैं । चुपकेसे मद्रासी एक फल अपनी थैलीमे रख देता है । )
सिख : ओय यारा, तुस्सी तो भूख-भूख करके चिल्ला रहे थे । थैलीविच क्यों डाल रहा? फल खाले, नहीं तो ---
मद्रासी : हम बिलकुल नहीं खायेगा जी । हम ये फल संभालके रखेगा । और आगे खानेको कुछ नहीं मिलेंगा तो हम इस फलका बिज़िनेस करेगा ।
बंगाली : तुम लोग बोहोत मोक्खीचूस है । हर वोक्त पैसाका सोचेगा ।
मद्रासी : ए बंगाली बाबू, तुमकू बिज़िनेस सेन्स नहीं तो मै क्या करेगा?
मराठी : अरे, पहिलं रहनेका बंदोबस्त करो । बिज़नेस नंतर बघेंगे ।
सिख : ये हुई ना चंगी गल्ल । भाईयों, तुस्सी सब थक गये हो, ठीक बोला ना मैं?
सब लोग : बिलकुल ठीक ।
सिख : तो फिर अग्गे चलनदी ज़रूरत की है? यहीं डेरा लगा देंगे । वैसे यह जगह भी चंगी है । की कहते हो तुस्सी?
मराठी : चालेल । अपने बापका क्या जाता है? लेकिन एक मिनीट -- (वहाँकी कुछ मिट्टी उठाकर उसे गौरसे देखता है ।) हाँ, यह मिट्टी अच्छी है । इधर जवारीका पीक मस्त आयेगा । दो-तीन काँदेका पेड लगायेगे । फिर काँदा-भाकर खाकर मज़ेमें दिन काटेंगे ।
बंगाली : (मिट्टी देखकर) यह मराठी सोही बोलता हाय । यह मिट्टीमे चावल भालो निकलेगा ।
सिख : और यारों, गेहूँ भी । यहाँदी मिट्टी ऐसी है । यह तो वही ज़मीन लगदी है जिसदी तारीफ अपने दादा-परदादा करते थे ।
बंगाली : मोगर होमने तो इसका दोर्शन कभी नही किया ।
मद्रासी : तो अभी करलो जी । आपन इधरच रहेगा । तुम सब ये ज़मीनमे दाल, चावल, गेहूँ और कुछ भी निकालो । हम इसकू खायेगा और बाकी बचेगा तो उसका बिज़िनेस करेगा । कैसा आयडिया है?
बंगाली : तोमी एकदम पागल है । बाबू मोशाय, एकदम गोधा ।
सिख : तो गल्ल पक्की । हम यहीं रहेंगे ।
मराठी : (रंगमंचकी दाहिनी तरफ जाकर) यह भाग मेरा है । मैं इधरच रहेगा ।
बंगाली : (बाँई तरफ जाकर) ओमार बाडी यह है । हम इधर चावल निकालेगा ।
मद्रासी : (रंगमँचके अगले हिस्सेमे जाकर) हमारे लिये यह प्लेस फर्स्ट क्लास है जी । (बंगालीसे) ब्रदर, तुम चावल निकालेगा तो थोडा हमको भी देना । हम सांभारके साथ खायेगा । अय्यो रामा, हम सांभारका नाम लेता तो मुँहमें पानी आता जी ।
सिख : (रंगमँचके ऊपरी हिस्सेमें जाकर) अस्सी यह जगह ले लेते हैं । ठंडी ठंडी हवा आती है, तो साड्डा दिल खुश । क्यों, सब खुश?
सब लोग : एकदम ठीक ।
मराठी : (यहाँ-वहाँ घूमते हुए) अभी मैं थोडा आराम करेगा ।
मद्रासी : तुम उधरच घूमो जी । हमारे पार्टमें कायकू आता तुम?
बंगाली : एकदम कोरेक्ट. देखो बोंधू, आमी सब ओपना ओपना जोगह बाँट लिया । अभी तुम एक दुसरेका जोगहमें कोदम भी नहीं रोखेगा । ठीक बात?
सब लोग : एकदम ठीक बात ।
( इतनेमें बाहरसे एक छोटे बच्चेकी आवाज आती है, "और मैं कहाँ रहूँगा?" सब उस आवाजकी तरफ देखते हैं । वहाँ एक सात-आठ सालका बच्चा खडा है -- काफी दुबला-पतला और थका हुआ है, फिर भी उसका प्यारा चेहरा छुप नहीं सकता । )
बंगाली : अरे ओ छोटा बाबू, तोमी कौन?
मद्रासी : कौन है जी तुम?
मराठी : अरे तू कोण? तेरा नांव काय?
बालक : (भोलेपनसे) मेरा नाम है ---
सिख : अरे, नाम-वाम छड्ड तू । तुस्सी हो कौन? कहाँके रहनवाले हो?
बालक : मुझे नहीं पहचानते? इतनी ज़ल्दी भूल गये मुझे? हम पहले मिले हैं ।
बंगाली : (गौरसे देखकर) छोटा बाबू, तोमारा चेहरा कोहीं देखा ऐसा लोगता है ।
मद्रासी : हमको भी ऐसाच लगता है जी ।
सिख : तुस्सी ठीक बोल रहे हो । त्वाडा चेहरा देखा हुवा लगता है, पुत्तर । पर याद नहीं आता । तूही बता, तू है कौन?
बालक : (रोने लगता है।) तुम सब मुझे भूल गये? अब मैं कहाँ जाऊँगा? क्या करूँगा?
मद्रासी : तुम रोना नही जी (अपनी आँखें बंद कर लेता है ।)
सिख : क्यों बे, तूने अखाँ क्यों बंद कर लीं?
मद्रासी : क्या करेगा जी? कोई रोता तो हम देख नहीं सकता । हमकू बुरा लगता । बच्चा रोता, हम भी रोता ।
बंगाली : अरे छोटा बाबू, मत रो । तुम्हारा माँ-बाप किधर हैं?
बालक : (सिसकते हुए) मेरा कोई नहीं, मैं अनाथ हूँ ।
मद्रासी : स्वामी, तुम्हारा नाम अनाथ है? Funny name !
मराठी : तू साला वेडा है ।
बालक : मेरी माँ कहीं खो गई है ।
मद्रासी : किधर है जी तुम्हारा अम्मा?
बंगाली : (गुस्सेमें) तोमी बीचबीचमे क्यों बोलता?
मद्रासी : हम बोलेगा जी । तुम्हारा परमिशन नहीं मँगता हमकू । (बंगाली गुस्सेमे अपना हाथ उठाता है ।) सॉरी जी, अब हम नहीं बोलेगा, कुछ भी नहीं बोलेगा ।
सिख : देखेंगे पुत्तर । ओय मुँडे, तेरी माँ कैसे खो गई?
बालक : मुझे नहीं पता । अब तो मेरे रहनेकी भी जगह नहीं है ।
मद्रासी : सिम्पल है जी । इसका नाम पूछो । नाम सुनेगा तो हम बराब्बर बोलेगा, ये किधर रहता वो ।
सिख : तूने दिल खुश कित्ता । जियो राजा, यह हुई ना गल्ल?
मद्रासी : पयला हम पूछेगा जी । बालक, नीव पेरी येन्ना?
बालक : तुम क्या पूछ रहे, अन्कल?
सिख : तुस्सी परे हट्टो जी । पुत्तर, त्वाडा नाँ की हैगा?
बालक : आप मुझसे मेरा नाम पूछ रहे हो ना?
सिख : जियो पुत्तर, तुम तो मेरे पिंडके हो । मेरी बोली समझते हो ।
बंगाली : नहीं बाबू मोशाय, इतना सुंदर बोच्चा अमार बाडीका होगा । बालक, तोमार नाम की?
मराठी : (सबको दूर हटाते हुए) वो घाबरता है आप सबसे । यह मेरे गाँवका लगता है । मुला, तुझं नांव काय?
बालक : (थोडी देर सोचकर) मैं जानता हूँ, आप सब मेरा नाम जानना चाहते हो । है ना?
मद्रासी : अय्ययो, ये बच्चा तो सब भाषा समझती है ।
बालक : मैं आप सबकी भाषा तो नहीं समझता, लेकिन आपका मतलब जानता हूँ । आप सबने मेरा नाम ही पूछा था ना? मुझे तो सिर्फ एकही भाषा आती है । मेरी माँने मुझे यही एक भाषा सिखाई है ।
सिख : कोई गल्ल नहीं पुत्तर । तू नाम तो बता अपना ।
बालक : भारत । भारत नाम है मेरा ।
मराठी : भंकस, ये भी कोई नाम है?
बंगाली : बालक, तूम हमारा मोजाक करता है? इतना ओजीब नाम हम आजतक नहीं सुना ।
बालक : मैं मज़ाक नहीं कर रहा हूँ । सचमें मेरा नाम भारत है । और मेरी माँका नाम है भारती । वह कहती है, सब हमें भूल गये हैं, इसीलिये लोगोंको हमारा नाम अजीबसा लगता है । अब मैं कहाँ जाऊँ?
सिख : तू फिक्र ना कर पुत्तर । बस्स, तू बता कि तूने किसके साथ रहना है ।
बालक : तुम सब लोग बहुत अच्छे हो । मैं सबके साथ रहना चाहूँगा । लेकिन तुम थोडेही मानोगे इस बातको?
( बालककी यह बात सुनकर सब आपसमें लडने लगते हैं कि बालक सिर्फ उनके साथ रहेगा ।उन्हें झगडते देख बालक रोने लगता है । )
मद्रासी : अय्ययो, तुम फिर रोने लगा जी । तुम रोती तो मैं भी रोती ।
बंगाली : बोच्चा, तुम क्यों रोता है? मोत रो ।
बालक : तुम आपसमें लडते-झगडते हो तो मुझे बहुत डर लगता है ।
सिख : ठीक है, पुत्तर, हम नहीं लडेंगे । पर तू दस्स तो सही, तू रहेगा किसके साथ?
बालक : मैंने कह तो दिया, मैं आप सबके साथ रहना चाहता हूँ ।
सिख : बेट्टा, यह तो मुमकीन नहीं । इसका मतबल यह होगा कि हम सबको अपनीअपनी जगह छोडकर इक्क साथ रहना होगा ।
मद्रासी : हम तैयार नहीं है जी ।
सब लोग : हम भी तैय्यार नहीं हैं ।
( इतनेमें बाहरसे एक आदमी आता है । )
आदमी : और इसकी ज़रूरत भी तो नहीं है ।
सिख : ओये, तू है कौन?
आदमी : (मुस्कराकर) मुझे नहीं पहचाना? मैं तुम्हारा पडोसी हूँ । दुर्जन खान नाम है मेरा ।
बालक : (सहमकर) मैं इसे जानता हूँ , खराब आदमी है यह ।
आदमी : (गुस्सेमें) ए लडके, चूप हो जा, वरना तुझे चुप कराना मैं जानता हूँ ।
बालक : (सबसे बिनती करते हुए) आप इसकी बात मत सुनो । मुझे याद है, जब माँ अकेली थी तब यह उसे बहुत सताता था । कहनेको तो हमारा पडोसी है ।
आदमी : (हँसकर) और पडोसी भला कभी किसीको सताता है? यह बच्चा पागल है । अपनी माँसे बिछड गया है, इसलिये बहकी-बहकी बातें कर रहा है ।
सिख : ठीक है । यह पागल है; तुस्सी तो भले आदमी लगते हो । करना क्या है इस लडकेका?
आदमी : लो करलो बात । करना है क्या इसका? सबके साथ रहनेको तैय्यार नहीं है, तो भगा दो । इस नादान के लिये तुम लोग अपनी-अपनी भाषा, अपनी संस्कृति भुलाकर एक क्यों होना चाहते हो? इतना आसान थोडेही है ना यह करना? कितनी तकलीफ़ होगी सबकॊ!
बंगाली : तोकलीफ़? कैसी तोकलीफ़?
आदमी : अब देखो, अगर तुम सब एक साथ रहने लगोगे तो इस बगीचे की सफ़ाईकी ज़िम्मेदारी तुम सबपर ही तो आयेगी ना? कभी कोई काम करे ना करे? इस झंझटसे बचना है तो अपना अपना हिस्सा बाँट लो, अपना अपना काम करॊ, और अपनी-अपनी जगह मस्त रहो । एक दूसरेसे कोई ताल्लुक ही नहीं । बस, बात खतम ।
बालक : (सबको समझानेकी कोशिशमें) फिर तो सचमुच ही बात खतम । ऐसा मत करो, ज़रा सोचो ।
बंगाली : ओ मोशाय, तोम इतना छोटा बच्चा है और बात इतना बडा कोरता है ? आँ, आ की चोमत्कार?
बालक : वक्त के झपेटोंने मुझे समझदार बनाया है । हम सब साथसाथ रहेंगे, आप सब मिलकर मेरी देखभाल करोगे, तो मैं बहुत ज़ल्दी बडा हो जाऊँगा और इस बुरे आदमीको सज़ा दूँगा । मेरी मदद करो ।
( आदमी गुस्सेमें बालकके मुँहमें तमाचा जडता है । बालक रोने लगता है । सब उसकी तरफ बढने लगते हैं तो वह आदमी उन्हें रोकता है । )
आदमी : रोने दे सालेको । बिल्कुल बदमाश है । देखा ना कैसे चटरपटर करता है । छोटा मुँह बडी बात । दोस्तों, मेरी बात मानो तो जैसा मैंने कहा है वैसे ही रहो । अपना-अपना काम करो और खुश रहो ।
सिख : (तीनोंको एक तरफ लेकर) शायद यह ठीक कह रहा है । हमें इसके झंझटमें नहीं पडना नहीं चाहिये ।
आदमी : क्या सोच रहे हो?
सिख : तुम ठीक बोल रहे हो ।
बंगाली : बोंधू, तुमी ठीक बोलछो । बहोत धोन्यबाद ।
आदमी : अब मैं चलता हूँ । लेकिन मेरी बात याद रखना । (चला जाता है । )
( उस आदमीके चले जानेके बाद चारों अपने-अपने कोनोंमें चले जाते हैं । बालक बीचमें अकेला बैठकर सिसकियाँ भरता है । )
बंगाली : ओ बालक, मोत रो । I hate tears!
मराठी : अरे ए पोरा, अब गप्प बैठो, नाहीतर कानके नीचे वाजवेगा ।
बालक : (आँसूँ पोंछते हुए) ठीक है । मेरी कोई नहीं सुनता ।मैं अनाथ हूँ, और करभी क्या सकता हूँ? मैं बारीबारी आप सबके साथ रहूँगा ।
मद्रासी : बडा प्यारा बच्चा है जी ।
मराठी : तो तू कायका वास्ते मस्का लगाता है रे?
मद्रासी : लगायेगा जी, हम मस्का लगायेगा, चटनी लगायेगा । तुम क्या करेगा जी? बोलो, तुम क्या करेगा?
मराठी : तो मी तेरा सांबार बनायेगा । तुम क्या करेगा? आँ, हिम्मत असेल तर बोल, तुम क्या करेगा?
मद्रासी : (घबराकर) तो हम पीछे हटेगा जी ।
मराठी : (हँसकर) डर गया ना?
मद्रासी : हम डरा नहीं जी, लेकिन हम पागल आदमीसे कुंजम-कुंजम डरता है जी ।
मराठी : तू मला वेडा बोला?
मद्रासी : तेरेकू वेडा बोलनेकू मैं पागल नहीं है जी ।
( दोनों एक दूसरेपर चिल्लाने लगते हैं, बालक अचानक रोने लगता है । )
बंगाली : बोच्चा, अब क्या हुआ?
बालक : ये लडते हैं तो मुझे डर लगता है, और मुझे डर लगता है तो --- (हाथकी छोटी उँगली उठाकर रोता है ।)
सिख : ए मुण्डे, इत्थे नहीं, पल्ली तरफ चला जा ।
( बच्चा रोतेरोते दुसरी तरफ निकल जाता है और सब हँसने लगते हैं । जब उनके ध्यानमें आता है कि हँसते-हँसते वे सब एक दूसरेके पास आ गये हैं, तो वे अचानक रुक जाते हैं । )
सिख : ओ यारों, तुस्सी मेरी जगहविच्च क्यों आये हो?
बंगाली : सोरदारजी, तुमी मुँह सोंभालकर बोलना । आमी जोगह पोर ही है ।
मराठी : मैं साँगता है, यह मद्रासी पक्का लोचट है, हँसकर मेरे पास आनेकू देखता है ।
मद्रासी : क्या बात करता जी? तुम्हारी घरमे तुम क्या इडली-साँभार रक्खी है जो मैं तुम्हारी पास आयेगी? मैं तुमको वॉर्न करता जी, हमसे दूर रहॊ ।
मराठी : ए, फोक्कट बडबड नहीं करनेका । यह मेराईच हिस्सा है । मेरे पास तो यह निशानी पण है । ये देखो, मेरे ज़मीनसे थोडाथोडा पानी निकलता है ।
मद्रासी : ए पानी हमारे जमीनसे आता है जी ।
सिख : ओ भाईओं, मेरी गल्ल सुनो । सब अपनी जगहमें ही हैं । थोडा हँसते-हॅसते एक दुज्जेदे पास आ गये थे । सब अपनी-अपनी जगह वापस चले जाओ । (सब पीछे हट जाते हैं ।) देखा यारों, इत्तासा प्यारा बच्चा हमें पास ले आया !
बंगाली : कोरेक्ट बोला तुम । हम उस बोच्चेको देखता है तो बोहोत खुशी होता है ।
मद्रासी : एकदम प्यारा बच्चा है जी
मराठी : ये पहला मैंच बोला ।
( बाहरसे एक औरतके सिसकनेकी आवाज़ आती है तो सब उस तरफ़ देखते हैं । वहाँसे एक दुबली-पतली औरत आती है । उसके कपडे फटे-पुराने हैं । )
सिख : तुस्सी कौन हो जी?
औरत : मैं एक दुखी अबला हूँ, क्या मेरी सहायता करोगे?
मद्रासी : तुमारा नाम सहायता है क्या जी? मेरा पडोसका औरतका नाम एकता है जी ।
बंगाली : मोशाय, तुम एकदम चूप बैठो ।
मद्रासी : माफ करो जी । अब हम बोलेगा नही । हम बोलेगा तो तुम बोलेगा की बोलता है ।
मराठी : तुम पहला रडणा बंद करो और बोलो, तुम कौन है?
औरत : कोई मेरी सहायता करो ।
मराठी : परत-परत वोहीच डायलॉग मत बोलो ।
औरत : मेरा सब कुछ लुट गया है ।
मराठी : वो ठीक है, पण म्हणजे नक्की काय हुआ है?
औरत : पहले हम बहुत सुखी थे, हमारा परिवार फला-फूला था । फिर एक दिन पडोसी गाँवसे कुछ मेहमान आये । फिर क्या था, हमारी किस्मत ही बदल गई ।
मद्रासी : ट्रॅजडीमें बदला के कॉमेडीमें? व्हेरी इण्टरेस्टींग स्टोरी जी ! हमारा तामील पिक्चरके माफ़िक --- (अचानक) माफ करना जी । अब हम नहीं बोलेगा ।
मराठी : (औरतसे) और फिर क्या हुआ?
औरत : हमारे हरे-भरे घरको, पता नहीं, किसकी नज़र लगी । जैसेही वे मेहमान आये, उन्होंने धीरे-धीरे हमारे पूरे घरपर कब्ज़ा कर लिया ।
बंगाली : बहुत खोराब । फिर?
औरत : कुछ दिनों बाद वे मेहमान तो वापस चले गये, लेकिन जाते-जाते जैसे हमारे घरकी खुशियाँ भी साथ ले गये । जहाँ शांति छाई रहती थी वहाँ हर समय झगडे होने लगे । घरका हरएक आदमी एक दूसरेपर ऐसे चिढता था, जैसे वे अलग-अलग घरके हों ... जैसे वे प्यारकी भाषा भूल चुके थे । फिर एक दिन सब अपना-अपना हिस्सा लेकर अलग हो गये ।
सिख : ओये, फिर की होया? बडी दुखभरी, लेकिन दिलचस्प कहानी है । आगे दस्सो जी ।
औरत : मैं रोई, चिल्लाई, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ । मेरे बच्चेके साथ मैं बिल्कुल अकेली रह गई । जहाँ सब अलग-अलग रहने लगे थे, मैं अकेली जाती तो कहाँ जाती? हम घरसे बेघर हुए ... यहाँ-वहाँ भटकने लगे । फिर एक दिन मेरा बच्चा मुझसे खो गया ।
( चारों अचम्भेसे एक दूसरेकी तरफ देखने लगते हैं ।
बंगाली : तोमारा नाम की, बोहन?
औरत : भारती । क्यों?
मद्रासी : और तुम्हारे बच्चेका नाम, भारत । करेक्ट?
औरत : (उत्साहित होकर) तुम लोगोंने देखा है मेरे लालको? मेरे भारतको?
( तीनों मद्रासीकी तरफ अँगारभरी आँखोंसे देखते हैं । वह डर जाता है । )
मद्रासी : नहीं देखा, सिस्टर, हम कैसे देखती जी? हमारा आँख बँद था, अब हम हमारा मुँह बंद रखेगा जी ।
औरत : (निराश स्वरमें) हे भगवान, फिरसे वही निराशा ! कबसे ढूँढ रही हूँ उसे । पता नहीं कब मिलेगा मेरा लाल?
बंगाली : इधर कोई बोच्चा नही आया ।
मराठी : उधर जाकर शोधो ।
सिख : मैं झूठ नहीं बोलता. इधर कोई बच्चा नहीं है ।
औरत : तो कहीं और जाकर खोजती हूँ उसे ।
( वह निराश होकर चली जाती है । उसके जाते ही तीनों मद्रासीपर च्चिल्लाने लगते हैं । किसीके कुछ समझमें नहीं आता है । )
मद्रासी : क्या जी, सब एक साथ बोलती? कुछ समझमें नहीं आती ।
मराठी : ए बुद्धू, समझ नहीं आती तो मध्येमध्ये क्यों झक मारती?
बंगाली : तोमारे बीचमें बोलनेका आदतसे सब गडबड होता ।
मद्रासी : क्या गडबड होता जी?
सिख : अरे पगले, तू उस बच्चेके बारेमें उस औरतको बताता तो वह ले जाती थी ना उसे अपने साथ?
मद्रासी : अय्ययो, सॉरी जी । हम समझा नहीं । अब हम कभी बीचमे नहीं बोलेगा, जी ।
मराठी : बोलेगा तो तेरी जीभ उखडून हातमें देएगा मैं ।
( इतनेमें बच्चा आता है । )
बालक : आप सब अभी भी झगड रहे हो?
सिख : नहीं पुत्तर, कोईभी लड नहीं रहा । तू फिक्र ना कर ।
मद्रासी : तुम इधर नहीं था तो इधर बहुत बडी --- बहुत बडी ---
मराठी : अरे ए, क्या सारखं बडी ---- बडी करतो?
मद्रासी : क्या करेगा जी? हमको वो करेक्ट वर्ड याद नहीं आती । मैं बोलता था कि ये बच्चा इधर नहीं थी तो बहुत बडा ---
मराठी : (हँसकर) --- बहुत बडा लफडा हुई ।
मद्रासी : (खुशीसे) एकदम बराबर --- वहीच -- इधर बहुत बडी झगडा हुई ।
बालक : झगडा हुआ?
मराठी : झगडा नहीं, मुला, लफडाच हुआ । ये साफ वेडा है ।
सिख : तुस्सी फिक्र ना कर, मुंडे, कुछ नहीं हुआ । लेकिन ज़रूर कुछ होता । देख, तू बाहर जायेगा तो जल्दी वापस आया कर ।
बालक : पर क्यों?
सिख : ये लो जी । अब तू सवाल भी करन लगा । पुत्तर, तू अपनी आँखदा तारा है । कभी हमें छोडकर जाना नहीं, समझे?
बालक : और तुम भी मुझे छोडकर नहीं जाओगे ना?
बंगाली : की बात कोरता तुमी? आमी तोमाको भालो बाशी । मतलब होमको तुमसे प्यार हो गया ।
मद्रासी : हम एक आयडिया बोलता जी । हम इस लडकेका नाम बदली करेगा ।
मराठी : (गुस्सेसे) वाह ! क्या पण आयडिया बोला । मैं सुना है कि शादीके बाद बायकोका नाम बदली करता है । पण ये एकदम नया बात है । अक्कल कुठे गयी तुझी?
मद्रासी : तुम हर टाईम हमारा इन्सल्ट कायकू करता जी? हम तुमको नहीं बोलेगा, हम ये सरदारजीको बतायेगा । सरदारजी, तुम बहुत समझदार है जी । मेरा बात सुनो । (सिखके कानोंमे कुछ कहता है ।)
सिख : (खुशीसे) ओये, ओये, जियो राजा । तुस्सी ग्रेट हो ।
बंगाली : सोरदारजी, की बात?
( सिख बंगालीके कानमें कुछ कहता है, और बंगाली उसी बातको मराठीके कानमें दोहराता है । )
मराठी : हेँ, इसमें कौनसा बडी बात है? मैं यहीच बात बोलनेवाला था ।
बालक : मेरा नाम बदलेनेकी बात? ऐसा मत करो ना ।
सिख : पुत्तर, आजसे तेरा नाम भारत नहीं ।
बालक : पर क्यों? पहलेसेही लोग मुझे भूल गये हैं । तुम मेरा नाम बदल दोगे तो फिर मुझे कोईभी पहचान नहीं पायेगा । ऐसा मत करो, प्लीज़ ।
सिख : ओये बच्चे, तूने हमारे साथ रहना है, तो इतनी बहस मत कर तू । समझा?
बालक : (निराश होकर) ठीक है, अब मैं कुछ नहीं कहूँगा ।
सिख : यह हुई ना गल्ल ! अब हम ज़रा बाहर जाकर आते हैं । तू यह जगह छोडकर कहीं न जाना ।
बालक : कहीं नहीं जाऊँगा । पर एक सवाल पूछूँ?
मद्रासी : (हँसते हुए) अय्ययो, तुम तो हमारा गुरूका गुरू निकला जी, जगदगुरू ।
बालक : क्यों?
मद्रासी : अभी तुम बोलता कि सवाल नहीं बोलेगा, और अभी बोलता कि एक सवाल पूछूँ? हमभी एकदम ऐसाच करता जी ।
मराठी : यहीच तो तकलीफ़ है । तुम बीचबीचमें बोलता है और घोटाळा करता है ।
बालक : मैं वचन देता हूँ, मैं कोई घोटाला नहीं करूँगा । मदर प्रोमीस । लेकिन सिर्फ़ एक सवाल पूछना चाहता हूँ ।
सिख : जल्दी पूछ, की पूछना है तूने?
बालक : मुझे अकेला छोडकर तुम सब कहाँ जा रहे हो?
सिख : बल्ले बल्ले, यह भी कोई बात हुई? पुत्तर, अपने रहनेका बंदोबस्त हो गया । अब कुछ कमाना भी तो है । समझ गये?
बालक : समझ गया । तुम सब पैसे कमाने जा रहे हो?
बंगाली : बालक, तुम बोहोत सोमझदार है --- ओमार जैसा ।
बालक : (मुस्कराकर) समझदार तो हूँ, तुम सब लोगों जैसा ।
सिख : ठीक है, तो चलो भाईयों ।
( सब जाने लगते हैं, तो अचानक बालक उन्हें रोकता है । )
बालक : ठहरो, ठहरो । (सब वापस लौटते हैं ।) एक सवाल पूछना है ।
मद्रासी : अय्ययो, फिर सवाल जी?
बालक : एक आखरी सवाल ।
सिख : मुण्डे, तेरे सवाल तो खत्म ही नहीं हुंदे । पूछ ।
बालक : तुम अब बाहर जा रहे हो । (सब सर हिलाते हैं ।) फिर तुमसे कोई मिलने आयेगा । (सब सर हिलाते हैं ।) वह मुझे देखेगा ।
मराठी : सरळ-सरळ पूछॊ । अपना मान हिलाहिलाके दुखने लगा ।
बालक : कोई मुझे देखेगा तो मेरा नाम ज़रूर पूछेगा । पूछेगा की नहीं?
मराठी : पूछेगा, मग? तेरेको म्हणणेका क्या है?
बालक : तुम सब कह रहे हो कि तुमने मेरा नाम बदल दिया ।
सिख : हाँ, बदल दिया । तो की होया?
बालक : कोई मुझसे मेरा नाम पूछेगा तो मैं क्या जवाब दूँगा?
मराठी : (सोचकर) अरे ये पोरगा बरोबर बोलता है । इसका हमने विचार ही नहीं किया ।
बालक : तो अब करो । क्या मैं उनसे कहूँ कि इन लोगोंने मेरा नाम बदल दिया है और मैं पहले कोई और था?
मद्रासी : अय्ययो, ऐसा नहीं बोलना जी, गडबड होयेंगा ।
बालक : तो फिर बोलो, मेरा नाम --- नया नाम क्या है?
सिख : (सोचते हुए) त्वाडा नाम --- नाम --- अनाम कैसे रहेगा? तेरा नाम होगा अनाम ।
बालक : अनाम सिंग?
बंगाली : नोही, सिंग नहीं । तोमी सरदारजी है क्या?
बालक : मुझे नहीं पता ।
बंगाली : इसीलिये आमी बोलता है, तोमार नाम सिंग नहीं, खाली अनाम ।
बालक : खाली अनाम क्यों? गुरनाम क्यों नहीं? कार्तिक क्यों नहीं? शिवाजी क्यों नहीं? मोहनलाल क्यों नहीं?
सिख : (गुस्सेमें) अबे चूप, ज़्यादा बकबक ना कर । नहीं तो ---
बालक : क्या करोगे? बताओ ----
सिख : (और चिढकर) तो एकदम ऊपर भेज दूँगा ।
बालक : ऊपर माने?
सिख : स्वर्गमें ---
बालक : वह तो बहुतही ऊपर है । कैसे भेजोगे? गाडीसे या हवाई जहाज़से?
सिख : (चिल्लाकर) नहीं मालूम ।
बालक : तो फिर भेजोगे कैसे?
सिख : चलो दोस्तों, इस शैतानके मुँह लगनेका कोई मतबल नहीं । बोल बच्चे, तेरा नाम क्या है?
बालक : खाली अनाम । गुरनाम नहीं, सतनाम नहीं, हरनाम नहीं, कार्तिक नहीं, शिवाजी नहीं, मोहनलाल नहीं । सिर्फ अनाम । मैं जानता हूँ । सब जानता हूँ ।
बंगाली : कोई गोलती नहीं कोरना । सोमझा?
बालक : पोक्का समझा । कोई गोलती नहीं कोरेगा ।
बंगाली : ए बाबू, तोमी हमारा मोज़ाक कोरता?
बालक : नहीं, आमी तोमारा मोज़ाक नोहीं कोरता ।
बंगाली : फिर मोज़ाक किया ।
सिख : ओ बाबू, तू इस बच्चेके क्यों मुँह लगता है? चलो, कुछ कमानेकी सोचते हैं ।
बंगाली : चोलो मोशाय ।
( सब बाहर चले जाते हैं । )
बालक : (चिढाते हुए) चोलो मोशाय । बातें तो ऐसी करते हैं, जैसे जिगरी दोस्त हो । और झगडते ऐसे हैं जैसे पुराने दुश्मन हों और एक दूसरेकी जान ले लेंगे । यह हिस्सा इसका, वह हिस्सा उसका । मैं हूँ एक और रहना पडेगा इन सबके साथ, चार हिस्सोंमें बँटकर । कहते हैं मेरा नाम भी बदल दिया है । पहले भारत था, अब हूँ अनाम । अभी छोटा हूँ, शिकायत भी तो कर नहीं सकता किसीसे । जैसे नचाते हैं, वैसे नाचना पडेगा । जैसे कोई इन्सानका नहीं, मदारीकी डुगडुगीपर नाचनेवाला बँदरका बच्चा हूँ ।
( बाहरसे वह औरत आती है । )
औरत : बेटा, मेरे सवालका जवाब दोगे?
बालक : दूँगा । बोलो ।
औरत : कुछ देर पहले यहाँ कुछ आदमी थे ।
बालक : कुछ देर पहले थे, अब नहीं ।
औरत : कहाँ गये हैं?
बालक : पता नहीं । छोटा हूँ ना, मुझे बताकर नहीं गये ।
औरत : कब आयेंगे?
बालक : मैं कुछ नहीं जानता, माँजी । (औरतकी आँखें भर आती हैं ।) क्या हुआ, माँजी? तुम रो क्यों रही हो?
औरत : तुमने मुझे माँ कहा, तो मुझे मेरे बेटेकी याद आयी ।
बालक : तुम्हारा बच्चा खो गया है? कहाँ है वह? तुम्हारा घर कहाँ है?
औरत : पता नहीं ।मेरा घर मुझसे छिन गया, मेरा बच्चा भी मुझसे छिन गया । अब मेरा कोई नहीं ।
बालक : मेरा भी कोई नहीं । अब हम साथ-साथ रहेंगे । यहींपर ।
औरत : तुम यहाँ रहते हो?
बालक : अब यहीं रहता हूँ । तुम भी यहीं पर रहो । मैं उन लोगोंसे कह दूँगा । वे आपसमें बहुत झगडते हैं, लेकिन मुझसे बहुत प्यार करते हैं । मेरी बात वे कभी नहीं टालेंगे । रहोगी ना मेरे साथ?
औरत : बडे प्यारे बच्चे हो तुम । तुम्हारा नाम क्या है?
बालक : (अपनेसे) अब फँस गया ना? मैं इससे ना झूठ बोल सकता हूँ, और ना सच बोलनेकी हिम्मत रखता हूँ । मेरा नाम अनाम है । अजीबसा नाम है ना?
औरत : ज़रा भी नहीं । बहुत प्यारा नाम है, बिल्कुल तुम्हारे जैसा ।
बालक : सच?
औरत : सच । मैं झूठ क्यों बोलूँ?
बालक : लेकिन माँ, मैंने तुमसे झूठ बोला ।
औरत : क्या?
बालक : माँ, तुमने मुझे पहचाना नहीं?
औरत : नहीं, लेकिन जब मैंने तुम्हें पहली बार देखा, तो ज़रूर ऐसा लगा कि तुम्हें पहले भी देखा है ।
बालक : माँ, मेरा नाम अनाम नहीं । मैं भारत हूँ --- तुम्हारा बेटा । तुम हमेशा कहती थी कि मैं तुम्हारी आँखोंका तारा हूँ । कुछ याद आया?
औरत : (उसे गले लगाते हुए) भारत, मेरे लाल, कहाँ खो गये थे इतने दिन? मैंने तुम्हें कहाँ कहाँ नहीं ढूंढा?
बालक : माँ ---
औरत : मुझे फिरसे पुकारो, बेटा । तुम्हारे मुँहसे यह शब्द सुनने के लिये मेरे कान कबसे तरस गये थे ।
बालक : मतलब?
औरत : यह जगह हमारी है, बेटा । कभी फलाफूला यह बगीचा हमारी अमानत थी ।
बालक : लेकिन माँ, यहाँ तो वे चार लोग रहते हैं ।
औरत : यही तो रोना है, बेटा । मुझ अबलाकी कौन सुनता है? कौन पहचानता है मुझे? खुद अपनी जगहके लिये मारेमारे घूम रही हूँ ।
बालक : माँ, अब हम यहीं रहेंगे ना?
औरत : और कहाँ जा सकते है, मेरे लाल?
( इसी वक्त वह आदमी आता है । )
आदमी : तुम्हें छोडकर मैं भी कहाँ जा सकता हूँ?
बालक : (औरतके पीछे छिपते हुए) माँ, मुझे इस आदमीसे बहुत डर लगता है । बहुत बुरा है यह ।
आदमी : मुझसे डर लगता है? मैं तो पडोसी हूँ तुम्हारा, मुझसे क्या डरना?
आदमी : (औरतसे) और तुम यहाँ क्या कर रही हो?
औरत : यह मेरा बेटा है और मैं इस जगहकी मालकिन हूँ ।
आदमी : बकवास बंद करो । मालकिन हो नहीं, थी । अब यह बगीचा किसी औरका है । जो जहाँ रहता है वही वहाँका मालिक होता है । यही कानून है यहाँका ।
औरत : और जो पहले रहता था?
आदमी : अब कोई हक नहीं है उसका । चली जाओ यहाँसे ।
बालक : (आदमीकी तरफ बढते हुए) मेरी माँको कुछ मत कहना । मैं तुम्हें मारूँगा । यह घर हमारा है । मेरी माँ कभी झूठ नहीं बोलती । चले जाओ यहाँसे ।
आदमी : (हँसकर) कैसे जा सकता हूँ मैं? अब तो मैं यहींपर रहने आया हूँ ।
औरत : यह घर तुम्हारा नहीं ।
आदमी : अब यह घर तुम्हारा भी तो नहीं ।
बालक : मैं यहाँ रहता हूँ और यह मेरी माँ है । हम यहीं रहेंगे ।
आदमी : मैं भी यहाँसे नहीं हिलनेवाला । कभी तुम्हारा मेहमान था मैं, और मेहमानको घरसे निकालना कहाँका धर्म है?
औरत : धर्म-अधर्मकी बातें तुम क्या जानो?
बालक : अब वे लोग वापस आयेंगे तो मैं तुम्हारी शिकायत करूँगा ।
आदमी : शौकसे करो मेरी शिकायत । तुम्हारी बात उन्होंने पहले कहाँ सुनी है, जो अब सुनेंगे? देखो, वे आ रहे हैं ।
( सिख, मराठी, मद्रासी और बंगाली आते हैं । ) कर लो शिकायत ।
सिख : सत स्री अकाल, भय्या, की हाल है त्वाडा?
आदमी : चंगा हूँ, दोस्त । थोडा मुसीबतमें हूँ ।
सिख : दस्सो, क्या प्रॉब्लेम है?
बंगाली : तोकलीफ क्या है, बोंधू? हम तुम्हारा मोदद करेगा ।
मद्रासी : अय्ययो, don't worry, जी ।
मराठी : बोल मित्रा, क्या त्रास है तेरेको?
आदमी : शुक्रिया । मुझे यकीन था कि तुम सब मेरी मदद ज़रूर करोगे । बात यह है कि आजकल मेरे घरमें जगह कुछ कम पड रही है । मुझे जगहकी तलाश थी ।
मद्रासी : पर्वा इल्ले, फिक्र नॉट, जी । तुम हमारा घरमें रहो ।
बालक : तुम ऐसा क्यों कर रहे हो?
मद्रासी : ए बच्चा, तुम बहुत सवाल करता जी । सरदारजी, तुम ये आदमीको अपना घरमे रक्खो जी । यह तुम्हारा रिश्तेदार मालूम होता ।
बंगाली : ओमार सोरकार भी बोलता है, "ओतिथी देवो भव ।"
आदमी : मुझे तुमसे यही उम्मीद थी । मैं अभी जाकर अपना सामान ले आता हूँ ।
सिख : सामान भी है त्वाडेकुल?
आदमी : (हँसकर) बस थोडासा है । (चला जाता है ।)
बालक : तुम पछताओगे, मैं बता रहा हूँ ।
सिख : ओये, तू चुप्प कर । बहुत बोलता है । (औरतसे) और तुम यहाँ क्यों आई हो?
बालक : यह मेरी माँ है ।
सब : (अचम्भेसे) क्या?
बालक : (अपने आपको संभालकर) सचमुचवाली माँ नहीं, ऐसेही ।
मराठी : होयेंगी, पण इधर कायकू?
बालक : मेरे जैसे इसका भी कोई नहीं ।
बंगाली : तो हम की कोरेगा, बोंधू?
बालक : इसे यहाँ रहने दो ।
सब : (चिल्लाकर) क्या?
बालक : इसे मेरे साथ रहने दो; उस पराये आदमीको भी तो तुम यहाँ रहने दोगे । यह मुझसे बहुत प्यार करती है । मेरी माँ, मेरा मतलब, मेरी माँ जैसी है । इसे भी यहाँ रहने दो ।
औरत : हम यहीं कहीं एक कोनेमें पडे रहेंगे । मैं हर तरहसे तुम लोगोंकी सेवा करूँगी ।
बंगाली : रहने दो इसे । यह हम सोबको खाना खिलायेगी । मोच्छी-चावल ---
मद्रासी : इडली-साँबार ---
मराठी : लसनकी चटणी और जवारकी रोटी ---
सिख : मकईदी रोटी और सरसोंदा साग ---
सब : ठीक है, इसे यहाँ रहने देते हैं ।
औरत : मैं तुम्हारा उपकार कभी नहीं भूलूंगी ।
( इतनेमें वह आदमी ढेर सारा सामान लेकर आता है और सिखके हिस्सेमें रख देता है । )
आदमी : मैं भी तुम्हारा उपकार कभी नहीं भूलूंगा ।
सिख : (हँसकर) कोई बात नहीं दोस्त । तुम तो मेहमान हो हमारे ।
आदमी : एक एहसान और कर दो, दोस्त ।
सिख : दस्सो, याराँ ।
आदमी : देखो, बुरा मत मानना, मुझे इतनी कम जगहमें रहनेकी आदत नहीं ।
सिख : तो, की कराँगा?
आदमी : तो तुम यह जगह खाली कर दो --- और कहीं और चले जाओ ।
सिख : (झल्लाकर) ऐ, क्या पागलोंजैसी बात कर रहे हो?
आदमी : देखो भई, गुस्सा होनेसे कोई फायदा नहीं । भलाई इसीमें है, कि तुम मेरा कहा मानो और यहाँसे चले जाओ, वरना ---
सिख : वरना की करोगे?
आदमी : (हँसकर) वरना तुम अपनी मौतको दावत दोगे । मैं यहाँ अकेला नहीं हूँ । उस तरफ देखो, मेरे और भी साथी हैं । मेरे एक निशानेपर वे तुम्हारा नामोनिशानतक मिटानेको तैयार हैं ।अब चुपचाप निकल जाओ यहाँसे ।
( वह आदमी धक्के देकर सिखको अपनी जगहसे निकाल देता है । )
सिख : (असहायतासे) अरे, कोई तो मेरी मदद करो । (सब अपना मुँह फेर लेते हैं ।)
बालक : मैंने तुम्हें पहलेसे सचेत किया था ।
सिख : तू चुप बैठ । मैं पहलेसे परेशान हूँ ।
( रंगमंचके एक कोनेमें जाकर बैठ जाता है । )
आदमी : (बंगाली आदमीसे) बाबू मोशाय, क्या मैं आपकी जगहमेंसे थोडी जगह ले सकता हूँ?
बंगाली : तुम ये की बात कोरता है?
आदमी : आपके भलेकी बात कोरता हूँ । मैं मेरे मेहमानोंको यहाँपर ला रहा हूँ । ज़ाहिर है, हमें ज्यादा जगहकी ज़रूरत होगी । मैं जा रहा हूँ, बहुत जल्द अपने मेहमानॊंको लेकर वापस आऊँगा । और हाँ, कोई चालाकी करनेकी कोशिश भी मत करना । (जाता है ।)
बंगाली : अरे कोई मेरा मोदद कोरो ।
मराठी : अरे, कोई मेरा मदत करो । अब मेरी बारी आनेवली है । हे भगवान ---
औरत : भगवान भी उन्हींकी मदद करता है, जो अपनी मदद खुद करते हैं ।
मद्रासी : वो कैसा करेंगा जी? जल्दी बोलो ।
सिख : ओ माँ, जल्दी दस्सो जी । नहीं तो वह शैतान हम लोगोंकी पूरी ज़मीन निगल जायेगा ।
औरत : ऐसा मत होने दो । इस ज़मीनको मत खोना, इसके अंदर सोना भरा पडा है ।
सब : सोना ?
मराठी : तेरेको क्या माहीत? लवकर बोलो ।
औरत : कभी हम यहींपर रहा करते थे । हमें सब पता है । (सब सोचने लगते हैं ।) ज़्यादा मत सोचो, उतना वक्त नहीं है । पहले इस दुश्मनसे छुटकारा तो पा लो, फिर मैं आपको सब बता दूँगी ।
सिख : उसके पास कितने सारे आदमी हैं । मैं अकेला कर भी क्या सकता हूँ?
औरत : यही तो भूल कर रहे हो तुम । तुम अकेले नहीं हो ।
सिख : की मतबल?
औरत : तुम एक दूसरेको भूल चुके हो --- अपनी असली ताकतको भूल गये हो । बंधी मुट्ठी लाखकी ---
बंगाली : हम क्या कोरेगा? जल्दी सोचो, दुश्मन आ रहा है ।
सिख : अब सोचना क्या है जी? यह औरत सच कह रही है । हम सब मिलकर इन शैतानोंका सामना करेंगे ।
( सब आपसमे हाथ मिलाते हैं । इतनेमें वह आदमी, अपने साथ दो-तीन आदमियोंको ले आता है । )
आदमी : चलो दोस्तों, हम आ गये हैं, घर खाली करो ।
सिख : घर हम नहीं, तुम खाली करोगे । अब हम सब साथ-साथ हैं ।
( दोनो गुटोंमें थोडी देरके लिये मुकाबला होता है । नये आदमियोंका इनके सामने कुछ नहीं चलता, और वे भाग जाते हैं । )
मद्रासी : अय्ययो, सब भाग गया जी । मेरेसे डरके भाग गया ।
मराठी : अकेले तेरेसे नहीं, हम सबसे घाबरून भाग गये वो लोग ।
बंगाली : एकदम सोच बोला । हम सब मिलकर उनको होराया ।
सिख : और हम सब मिलकर उनका सामान भी बाहर फेकेंगे ।
( सब मिलकर सामान बाहर फेंकने लगते हैं । )
औरत : अब यह गुलशन हमारा है ।
बालक : और अब हम यहाँ राज करेंगे ।
* * * * * पर्दा गिरने लगता है * * * * *
लक्ष्मीनारायण हटंगडी
(suneelhattangadi@gmail.com)
Thursday, December 9, 2010
सबसे बडा कौन?
( पर्दा खुलनेपर बहुत शोर सुनाई देता है। अचानक एक आवाज़ ज़ोरसे सुनाई देती है, "सब चुप हो जाऒ।" कुछ देर सब शांत हो जाता है, और फिर धीरे धीरे शोर बढने लगता है। फिरसे वही आवाज़ आती है, "अरे मूर्खों, चुप हो जाओ।" सब धीरेधीरे चुप हो जाते हैं। )
इतिहास : यह कौन बोला? किस मूर्ख ने मुझे ’मूर्ख’ कहा? विज्ञान, यह ढिटाई सिर्फ तुमही कर सकते हो।
विज्ञान : बुढऊ, काश की मैं यह कहता। लेकिन जो सभी जानते हैं उसे दोहरानेकी मूर्खता मैं भला क्यों करूं?
इतिहास : क्या मतलब?
विज्ञान : यही की तुम मूर्ख हो। केवल अतीत मे जीते हो।
इतिहास : तो? मैं अतीत हूं, इसीलिये महत्त्वपूर्ण हूं।
विज्ञान : (कुत्सित हंसकर) अच्छा! तो तुम इस भ्रममे हो? सठिया गये हो। अगर मैं न होता तो ना जाने दुनिया कहां होती? विश्व ने इतनी प्रगति की है तो सिर्फ मेरे आविष्कारों के कारण। मैने ही इस विशाल विश्व को करीब ला रक्खा है।
इतिहास : और वह कैसे?
विज्ञान : हवाई जहाज़, टेलिफोन, टेलिग्राम, टीव्ही, विडिऒ, और अब इंटरनेट। विज्ञान ने लोगोंको ना केवल ज्ञान दिया है, बल्कि उनका मनोरंजन भी किया है। अब कौन इन्कार कर सकता है कि विज्ञान ही सबसे महत्त्वपूर्ण है? ना कि इतिहास ...
भूगोल : विज्ञान, तुम बिल्कुल सच बोल रहे हो --
विज्ञान : धन्यवाद ... धन्यवाद ...
भूगोल : तुम सच बोल रहे हो कि इतिहास सबसे महत्त्वपूर्ण नहीं। लेकिन तुम गलत बोल रहे हो कि तुम, विज्ञान, सबसे महत्त्वपूर्ण हो।
विज्ञान : क्या मतलब? मुझसे ज़्यादा महत्त्वपूर्ण कौन हो सकता है?
भूगोल : (गर्वसे) मैं --- भूगोल।
इतिहास : यह क्या मज़ाक है?
भूगोल : इतिहास, मुझे कहींसे जलनेकी बू आ रही है। मेरी तो यह समझमे नही आता कि इतिहास और भूगोल को एक साथ क्यों रखा जाता है? इतिहास के अस्तित्वमे आनेसे कई पहलेसे मैं यहांपर हूं। मैं ही तो सबको विश्वके बारेमें जानकारी देता हूं। अलग-अलग प्रांत और वहांके हालातके बारेमे मैं ही तो सबको बताता हूं। अब इसमे ज़रा भी शक नहीं कि भूगोल ही सबसे महत्त्वपूर्ण है।
गणित : क्षमा चाहता हूं। बहुत देरसे मैं चुपचाप आप सबकी बकवास सुन रहा हूं। सच कहूं तो आपके इस मूर्ख वादविवादोंमे मुझे ज़रासी भी दिलचस्पी नहीं थी। लेकिन ज़्यादा देर चुप रहना भी कठिण था। आखिर इस संसारमे सिर्फ मैं ही सही मापदण्ड हूं सच और झूट का
विज्ञान : (गुस्सेमे) यह तुम कैसे कह सकते हो? क्या तुम नहीं जानते कि मैं विज्ञान हूं?
गणित : जानता हूं, जानता हूं। भलीभांति जानता हूं। लेकिन शायद तुम यह भूल गये हो कि विज्ञान को भी गणित की मदद लेनी पडती है। इसके बादही विज्ञान किसी निर्णयपर पहुंच सकता है। मेरे बगैर सब कुछ बेकार है। जानते हो, एक शून्यके लगाने या हटाने से साम्राज्य बन या टूट सकते हैं। इस बातका तो इतिहास साक्षी है।
इतिहास : भाई, इसी बातको तो मैं दोहरा रहा हूं। इतिहास सबका साक्षी है। इतिहास नहीं तो कुछ भी नहीं। पूरे विश्वका आरंभ ही इतिहास से होता है।
भूगोल : मित्र, तुम गलत हो। विश्वका इतिहास आरंभ होने के लिये पहले विश्वका होना ज़रूरी होता है। और मैं -- भूगोल ही -- विश्व की जानकारी देता हूं।
( फिरसे सब एक साथ चिल्लाने लगते हैं। फिरसे वही तीखी आवाज़ आती है, "चुप हो जाओ।" सब शांत हो जाते हैं। )
सब : यह कौन बोला?
( एक छोटीसी लडकी, भाषा, सामने आती है। )
भाषा : मैं बोली। कोई शक?
सब : तुम कौन हो?
भाषा : (मुस्कराकर) क्या, तुम सब मुझे भूल गये?
इतिहास : अरे, हम तुम्हे जानते ही नहीं ---
भूगोल : --- तो तुम्हें भूलने का सवाल ही नहीं उठता!
भाषा : मैंने तुम सभी को जन्म दिया।
विज्ञान : तुमने? और हमें जन्म दिया? ज़रा सुनो तो इसकी बकवास!!
( सब ठहाका लगाकर हंसने लगते हैं। )
भाषा : हंसो नहीं। यह पूर्णत: सच है कि मैने ही तुम्हें जन्म दिया है। सब लोग तुम्हें जानते हैं तो सिर्फ मेरे कारण।
गणित : यह कैसे हो सकता है? तुम तो इतनी छोटी लगती हो। ऐसे लगता है कि अभी तुम्हारे दूध के दांत भी नहीं गिरे।
विज्ञान : तुम हमें कैसे जन्म दे सकती हो?
इतिहास : इतने पुराने इतिहास को?
भूगोल : इतने लंबे-चौडे और विशाल भूगोल को?
भाषा : (हंसते हुए) यही तो मेरे बारेमें सबसे मज़ेकी और रहस्यपूर्ण बात है। मैं सैंकडो, हज़ारों साल पुरानी हूं -- और फिर भी जवान हूं -- नईनई सी -- ताज़ा और हरीभरी!
इतिहास : देखो, बहुत हुआ। अब यह घुमाफिराकर बोलना बस करो, और यह बताओ कि तुम हो कौन।
भाषा : मैं भाषा हूं -- मैंने ही तुम सबको जन्म दिया। मैंही सबका माध्यम हूं। यह पूरा विश्व तुम्हें और तुम्हारे विषयमे जानता है क्योंकि मैं, भाषा, तुम्हें जन्म देती हूं। भाषा के आविष्कारसे ही दुनियामे सारा व्यवहार सरल हो गया है।
गणित : वह कैसे?
भाषा : ध्यानसे सुनो। इतिहास, भूगोल, विज्ञान, गणित हो या कोई और विषय हो, भाषा ही तो सबको जन्म देती है। मैं समय के साथ बडी होती हूं -- जैसेजैसे मानवजाति विकसित होती है वैसेवैसे मेरा भी विकास होता रहता है। और इसीलिये मै जितनी पुरानी होती हूं, उतनी ही नई रहती हूं। कुछ आई बात समझमें?
गणित : दोस्तों, मैं सोचता हूं कि इसकी बातमे दम है, सच्चाई है। ज़रा सोचो, भाषा है, इसीलिये तो लोग हमें जानते हैं, पहचानते हैं।
भाषा : सच कहा, मित्र। अगर मैं ना होती तो तुम सबको कौन जानता और कौन पढता? तो मानते हो कि मैं सबसे महत्वपूर्ण हूं?
इतिहास : यह बात भले ही गणित मानता हो, मैं नही मानता।
भाषा : (आश्चर्यसे) नहीं मानते?
भूगोल : मैं इतिहासके साथ हूं। मैं भी नहीं मानता।
विज्ञान : मैं भी नहीं मानता।
( सब एक साथ चिल्लाने और लडने लगते हैं। तभी अंदरसे एक लडका आता है और उन सबको रोकनेकी कोशिश करता है। )
लडका : आप सब शांत रहिये। मेरी बात सुनिये।
इतिहास : अब तुम कौन हो?
भूगोल : और कहांसे आये हो?
सब : आखिर हो कौन तुम?
लडका : मैं एक विद्यार्थी हूं। मेरी मानो तो तुम सब सही हो ... और सब गलत भी हो।
भाषा : मूर्ख बालक, कोई एक ही समय सही और गलत कैसे हो सकता है? क्या तुम अपनी भाषा भूल गये हो?
लडका : (मुस्कराकर) नहीं, मैं अपनी भाषा नहीं भूला। मैं अपनी भाषाको और तुम सबको अच्छी तरह जानता हूं। सच बात तो यह है कि हम विद्यार्थियों के लिये सभी विषय महत्त्वपूर्ण होते हैं। और दूसरी सच बात यह भी है कि अब सिर्फ तुम ही नहीं हो ...
सब : क्या मतलब?
लडका : मतलब यह कि दुनिया अब बहुत आगे निकल चुकी है। मानव बहुत तरक्की कर चुका है और तरक्की कर भी रहा है। इन सब पुराने विषयोंके साथसाथ कई नये विषय भी आ गये हैं।
सब : जैसे?
लडका : जैसे कम्प्युटर, पर्यावरण, संगीत, नाट्य, चित्रकला और इतने सारे कि जिनके नाम भी मुझे इस वक्त याद नहीं आते। जैसे मैंने अभीअभी कहा, मानव बहुत तरक्की कर चुका है। और हमें चाहिये कि हम समय के साथ साथ कदम मिलाकर चलें। अगर हमनें ऐसा नहीं किया तो हमारा ज्ञान अधूरा रह जायेगा।
गणित : मैंने पहलेही कहा, तुम सच बोल रहे हो। मैं मानता हूं तुम्हारी बात।
लडका : हम विद्यार्थियोंको सभी विषय मन लगाकर पढने चाहिये। यहि सच्चा ज्ञान है। और एक मज़ेकी बात कहूं? कईं बार मन ऊब जाता है और पाठशाला छोडकर भाग जानेको दिल करता है। लेकिन अगले क्षण ही समझमें आता है कि आजके युग की यही ज़रूरत है। इसीलिये अब लडना बंद करो और अपनीअपनी जगह बैठ जाओ।
( धीरेधीरे सभी विषय अंदर चले जाते हैं और कुछ देर के लिये रंगमंचपर कोई नहीं होता। जब धीरेधीरे उजाला होने लगता है, तो एक लडका अपनी टेबलके सामने बैठा ऊंगता दिखाई देता है। उसके सामने बहुत सारी किताबें बिखरी पडी हुई हैं। इतने मे उसके पिताजी/माताजी/बडा भाई आते हैं और उसे जगाते हैं। )
व्यक्ति : जाग जाओ, जाग जाओ।
लडका : (आंखे मलते हुए जागता है) क्या मैं सो गया था?
व्यक्ति : हां, तुम सो गये थे और नींद मे कुछ बडबडा भी रहे थे। क्या तुमने कोई सपना देखा?
लडका : (हंसते हुए) हां, मैने एक बडा ही अज़ीब सपना देखा। हमारी हिंदी के अध्यापकजी ने हमें एक निबंध लिखनेके लिये कहा था। विषय है, "मेरा प्रिय विषय"।
व्यक्ति : तो तुमने क्या सपना देखा?
लडका : यही कि सारे विषय मेरे सपनेमें आकर आपसमें लडझगड रहे थे कि कौनसा विषय सबसे महत्त्वपूर्ण है।
व्यक्ति : तो तुमने क्या देखा? जो भी देखा हो, चलो, अब जागने का समय हुआ है। एक बात गांठ बांध लो, सिर्फ वही इन्सान तरक्की कर सकता है जो देखे हुए सपनॊंको जागृत रूप देनेकी चेष्टा करे।
लडका : तुम सच कह रहे हो। अब मैं जल्दीसे अपना निबंध लिख देता हूं और पाठशाला जानेकी तैयारी करने लगता हूं।
( लडका उठकर अपनी बिखरी हुई किताबें समेटने लगता है। धीरेधीरे पर्दा गिरने लगता है। )
लेखक
लक्ष्मीनारायण हटंगडी
EC51/B104, Sai Suman CHS,
Evershine City, Vasai (E)
PIN 401208
(E-mail: suneelhattangadi@gmail.com)
इतिहास : यह कौन बोला? किस मूर्ख ने मुझे ’मूर्ख’ कहा? विज्ञान, यह ढिटाई सिर्फ तुमही कर सकते हो।
विज्ञान : बुढऊ, काश की मैं यह कहता। लेकिन जो सभी जानते हैं उसे दोहरानेकी मूर्खता मैं भला क्यों करूं?
इतिहास : क्या मतलब?
विज्ञान : यही की तुम मूर्ख हो। केवल अतीत मे जीते हो।
इतिहास : तो? मैं अतीत हूं, इसीलिये महत्त्वपूर्ण हूं।
विज्ञान : (कुत्सित हंसकर) अच्छा! तो तुम इस भ्रममे हो? सठिया गये हो। अगर मैं न होता तो ना जाने दुनिया कहां होती? विश्व ने इतनी प्रगति की है तो सिर्फ मेरे आविष्कारों के कारण। मैने ही इस विशाल विश्व को करीब ला रक्खा है।
इतिहास : और वह कैसे?
विज्ञान : हवाई जहाज़, टेलिफोन, टेलिग्राम, टीव्ही, विडिऒ, और अब इंटरनेट। विज्ञान ने लोगोंको ना केवल ज्ञान दिया है, बल्कि उनका मनोरंजन भी किया है। अब कौन इन्कार कर सकता है कि विज्ञान ही सबसे महत्त्वपूर्ण है? ना कि इतिहास ...
भूगोल : विज्ञान, तुम बिल्कुल सच बोल रहे हो --
विज्ञान : धन्यवाद ... धन्यवाद ...
भूगोल : तुम सच बोल रहे हो कि इतिहास सबसे महत्त्वपूर्ण नहीं। लेकिन तुम गलत बोल रहे हो कि तुम, विज्ञान, सबसे महत्त्वपूर्ण हो।
विज्ञान : क्या मतलब? मुझसे ज़्यादा महत्त्वपूर्ण कौन हो सकता है?
भूगोल : (गर्वसे) मैं --- भूगोल।
इतिहास : यह क्या मज़ाक है?
भूगोल : इतिहास, मुझे कहींसे जलनेकी बू आ रही है। मेरी तो यह समझमे नही आता कि इतिहास और भूगोल को एक साथ क्यों रखा जाता है? इतिहास के अस्तित्वमे आनेसे कई पहलेसे मैं यहांपर हूं। मैं ही तो सबको विश्वके बारेमें जानकारी देता हूं। अलग-अलग प्रांत और वहांके हालातके बारेमे मैं ही तो सबको बताता हूं। अब इसमे ज़रा भी शक नहीं कि भूगोल ही सबसे महत्त्वपूर्ण है।
गणित : क्षमा चाहता हूं। बहुत देरसे मैं चुपचाप आप सबकी बकवास सुन रहा हूं। सच कहूं तो आपके इस मूर्ख वादविवादोंमे मुझे ज़रासी भी दिलचस्पी नहीं थी। लेकिन ज़्यादा देर चुप रहना भी कठिण था। आखिर इस संसारमे सिर्फ मैं ही सही मापदण्ड हूं सच और झूट का
विज्ञान : (गुस्सेमे) यह तुम कैसे कह सकते हो? क्या तुम नहीं जानते कि मैं विज्ञान हूं?
गणित : जानता हूं, जानता हूं। भलीभांति जानता हूं। लेकिन शायद तुम यह भूल गये हो कि विज्ञान को भी गणित की मदद लेनी पडती है। इसके बादही विज्ञान किसी निर्णयपर पहुंच सकता है। मेरे बगैर सब कुछ बेकार है। जानते हो, एक शून्यके लगाने या हटाने से साम्राज्य बन या टूट सकते हैं। इस बातका तो इतिहास साक्षी है।
इतिहास : भाई, इसी बातको तो मैं दोहरा रहा हूं। इतिहास सबका साक्षी है। इतिहास नहीं तो कुछ भी नहीं। पूरे विश्वका आरंभ ही इतिहास से होता है।
भूगोल : मित्र, तुम गलत हो। विश्वका इतिहास आरंभ होने के लिये पहले विश्वका होना ज़रूरी होता है। और मैं -- भूगोल ही -- विश्व की जानकारी देता हूं।
( फिरसे सब एक साथ चिल्लाने लगते हैं। फिरसे वही तीखी आवाज़ आती है, "चुप हो जाओ।" सब शांत हो जाते हैं। )
सब : यह कौन बोला?
( एक छोटीसी लडकी, भाषा, सामने आती है। )
भाषा : मैं बोली। कोई शक?
सब : तुम कौन हो?
भाषा : (मुस्कराकर) क्या, तुम सब मुझे भूल गये?
इतिहास : अरे, हम तुम्हे जानते ही नहीं ---
भूगोल : --- तो तुम्हें भूलने का सवाल ही नहीं उठता!
भाषा : मैंने तुम सभी को जन्म दिया।
विज्ञान : तुमने? और हमें जन्म दिया? ज़रा सुनो तो इसकी बकवास!!
( सब ठहाका लगाकर हंसने लगते हैं। )
भाषा : हंसो नहीं। यह पूर्णत: सच है कि मैने ही तुम्हें जन्म दिया है। सब लोग तुम्हें जानते हैं तो सिर्फ मेरे कारण।
गणित : यह कैसे हो सकता है? तुम तो इतनी छोटी लगती हो। ऐसे लगता है कि अभी तुम्हारे दूध के दांत भी नहीं गिरे।
विज्ञान : तुम हमें कैसे जन्म दे सकती हो?
इतिहास : इतने पुराने इतिहास को?
भूगोल : इतने लंबे-चौडे और विशाल भूगोल को?
भाषा : (हंसते हुए) यही तो मेरे बारेमें सबसे मज़ेकी और रहस्यपूर्ण बात है। मैं सैंकडो, हज़ारों साल पुरानी हूं -- और फिर भी जवान हूं -- नईनई सी -- ताज़ा और हरीभरी!
इतिहास : देखो, बहुत हुआ। अब यह घुमाफिराकर बोलना बस करो, और यह बताओ कि तुम हो कौन।
भाषा : मैं भाषा हूं -- मैंने ही तुम सबको जन्म दिया। मैंही सबका माध्यम हूं। यह पूरा विश्व तुम्हें और तुम्हारे विषयमे जानता है क्योंकि मैं, भाषा, तुम्हें जन्म देती हूं। भाषा के आविष्कारसे ही दुनियामे सारा व्यवहार सरल हो गया है।
गणित : वह कैसे?
भाषा : ध्यानसे सुनो। इतिहास, भूगोल, विज्ञान, गणित हो या कोई और विषय हो, भाषा ही तो सबको जन्म देती है। मैं समय के साथ बडी होती हूं -- जैसेजैसे मानवजाति विकसित होती है वैसेवैसे मेरा भी विकास होता रहता है। और इसीलिये मै जितनी पुरानी होती हूं, उतनी ही नई रहती हूं। कुछ आई बात समझमें?
गणित : दोस्तों, मैं सोचता हूं कि इसकी बातमे दम है, सच्चाई है। ज़रा सोचो, भाषा है, इसीलिये तो लोग हमें जानते हैं, पहचानते हैं।
भाषा : सच कहा, मित्र। अगर मैं ना होती तो तुम सबको कौन जानता और कौन पढता? तो मानते हो कि मैं सबसे महत्वपूर्ण हूं?
इतिहास : यह बात भले ही गणित मानता हो, मैं नही मानता।
भाषा : (आश्चर्यसे) नहीं मानते?
भूगोल : मैं इतिहासके साथ हूं। मैं भी नहीं मानता।
विज्ञान : मैं भी नहीं मानता।
( सब एक साथ चिल्लाने और लडने लगते हैं। तभी अंदरसे एक लडका आता है और उन सबको रोकनेकी कोशिश करता है। )
लडका : आप सब शांत रहिये। मेरी बात सुनिये।
इतिहास : अब तुम कौन हो?
भूगोल : और कहांसे आये हो?
सब : आखिर हो कौन तुम?
लडका : मैं एक विद्यार्थी हूं। मेरी मानो तो तुम सब सही हो ... और सब गलत भी हो।
भाषा : मूर्ख बालक, कोई एक ही समय सही और गलत कैसे हो सकता है? क्या तुम अपनी भाषा भूल गये हो?
लडका : (मुस्कराकर) नहीं, मैं अपनी भाषा नहीं भूला। मैं अपनी भाषाको और तुम सबको अच्छी तरह जानता हूं। सच बात तो यह है कि हम विद्यार्थियों के लिये सभी विषय महत्त्वपूर्ण होते हैं। और दूसरी सच बात यह भी है कि अब सिर्फ तुम ही नहीं हो ...
सब : क्या मतलब?
लडका : मतलब यह कि दुनिया अब बहुत आगे निकल चुकी है। मानव बहुत तरक्की कर चुका है और तरक्की कर भी रहा है। इन सब पुराने विषयोंके साथसाथ कई नये विषय भी आ गये हैं।
सब : जैसे?
लडका : जैसे कम्प्युटर, पर्यावरण, संगीत, नाट्य, चित्रकला और इतने सारे कि जिनके नाम भी मुझे इस वक्त याद नहीं आते। जैसे मैंने अभीअभी कहा, मानव बहुत तरक्की कर चुका है। और हमें चाहिये कि हम समय के साथ साथ कदम मिलाकर चलें। अगर हमनें ऐसा नहीं किया तो हमारा ज्ञान अधूरा रह जायेगा।
गणित : मैंने पहलेही कहा, तुम सच बोल रहे हो। मैं मानता हूं तुम्हारी बात।
लडका : हम विद्यार्थियोंको सभी विषय मन लगाकर पढने चाहिये। यहि सच्चा ज्ञान है। और एक मज़ेकी बात कहूं? कईं बार मन ऊब जाता है और पाठशाला छोडकर भाग जानेको दिल करता है। लेकिन अगले क्षण ही समझमें आता है कि आजके युग की यही ज़रूरत है। इसीलिये अब लडना बंद करो और अपनीअपनी जगह बैठ जाओ।
( धीरेधीरे सभी विषय अंदर चले जाते हैं और कुछ देर के लिये रंगमंचपर कोई नहीं होता। जब धीरेधीरे उजाला होने लगता है, तो एक लडका अपनी टेबलके सामने बैठा ऊंगता दिखाई देता है। उसके सामने बहुत सारी किताबें बिखरी पडी हुई हैं। इतने मे उसके पिताजी/माताजी/बडा भाई आते हैं और उसे जगाते हैं। )
व्यक्ति : जाग जाओ, जाग जाओ।
लडका : (आंखे मलते हुए जागता है) क्या मैं सो गया था?
व्यक्ति : हां, तुम सो गये थे और नींद मे कुछ बडबडा भी रहे थे। क्या तुमने कोई सपना देखा?
लडका : (हंसते हुए) हां, मैने एक बडा ही अज़ीब सपना देखा। हमारी हिंदी के अध्यापकजी ने हमें एक निबंध लिखनेके लिये कहा था। विषय है, "मेरा प्रिय विषय"।
व्यक्ति : तो तुमने क्या सपना देखा?
लडका : यही कि सारे विषय मेरे सपनेमें आकर आपसमें लडझगड रहे थे कि कौनसा विषय सबसे महत्त्वपूर्ण है।
व्यक्ति : तो तुमने क्या देखा? जो भी देखा हो, चलो, अब जागने का समय हुआ है। एक बात गांठ बांध लो, सिर्फ वही इन्सान तरक्की कर सकता है जो देखे हुए सपनॊंको जागृत रूप देनेकी चेष्टा करे।
लडका : तुम सच कह रहे हो। अब मैं जल्दीसे अपना निबंध लिख देता हूं और पाठशाला जानेकी तैयारी करने लगता हूं।
( लडका उठकर अपनी बिखरी हुई किताबें समेटने लगता है। धीरेधीरे पर्दा गिरने लगता है। )
लेखक
लक्ष्मीनारायण हटंगडी
EC51/B104, Sai Suman CHS,
Evershine City, Vasai (E)
PIN 401208
(E-mail: suneelhattangadi@gmail.com)
Tuesday, September 7, 2010
दूरी
घडीमे दस बज रहे थे । दफ़्तरकी लडकियोंने एकसाथ मुडकर दरवाज़ेकी तरफ़ देखा -- वह अपनी गर्दन झुकाये अंदर आ रहा था । सब एक दूसरेकी तरफ़ देखकर व्यंगसे मुस्कराने लगीं । वह पास आया और उनकी तरफ़ न देखते हुए वहाँसे गुज़रा । सब धीमी आवाज़मे खुसरफुसर करने लगीं ।
"अपने आपको पता नही क्या समझता है?"
"बडा snobbish है ।"
"कभी मुस्कराता भी नहीं ।"
"बडा छुपा रुस्तम है । सिर्फ़ अपने आपको भोला बताता है ।"
"क्या दुनियामे कभी किसीकी बीवी कभी मरी ही नहीं?"
यह आखरी बात शायद संजीवने सुन ली । उसने धीरेसे अपनी फ़ाइल बंद की और उस लडकीकी ओर देखा जिसने यह बात कही थी । अब सब चुपचाप हो गईं । संजीवकी आँखॊंमे एक गहरीसी उदासी छाई हुई थी । जबभी उसकी बीवीका ज़िक्र आता, वह पहलेसे ज़्यादा गंभीर हो जाता था, जैसे उसके नीजी दर्दको किसीने ज़बरदस्ती बाज़ारमे बिछा दिया हो । वह सब कुछ भूल जाना चाहता था, लेकिन ज़माना उसे अकेला छोडना नही चाहता । वह आतेजाते हमेशा इन लडकियोंके ताने सुनता था । उसने फिरसे अपना काम शुरू किया । फिर एक बार लडकियोंकी झुकी हुई गर्दनें ऊपर उठ गईं ।
"बेचारा..."
"अरी, उसे बच्चोंसे बहुत प्यार था ।"
"शायद इसीलिये ईश्वरने उससे उसकी बीवी और बच्चा दोनोंको छीन लिया ।"
"क्या तुमने कभी उसे यहाँ देखा है?"
"किसे?"
"अरे पगली, संजीवकी पत्नीको । मैने तो उसे कभी यहाँ नही देखा ।"
"डेढ सालमे ही अपनी बीवी-बच्चेको खा गया ।"
"श्श.. बॉस आ रहे हैं। चुप बैठो ।"
"Good morning -- one minute please. मिस्टर संजीव सेन, कॉल फ़ॉर यू ।"
संजीवने फोन उठाया -- "संजीव बोल रहा हूँ ।"
"मैं सुनिता ।"
"देखो, मैने तुमसे पहले भी कहा है, मैं तुमसे बात नही करना चाहता । आईंदा दोबारा मुझे फोन मत करना ।" बोलतेबोलते संजीवकी आवाज़ ऊँची हो गई और सब लोग अजीबसे चेहरे किये उसकी ओर देखने लगे । वह पसीनेसे लथपथ हो रहा था । लडखडाते कदमोंसे वह अपने टेबलके पास आ गया । उसकी यह हालत देखकर प्रकाश उसके पास आया । प्रकाशका हाथ कँधेपर पडतेही चौंककर संजीवने पीछे देखा और मुस्करानेकी नाकाम कोशिश की ।
"क्या हुआ, संजीव?"
"प्रकाश, सुनिताका फोन था ।"
"तुम्हारी यह हालत देखकर मैं समझ गया था । आखिर वह चाहती क्या है?"
"मैं नहीं जानता," संजीवने अपना पसीना पोंछते हुए जवाब दिया ।
"शायद मैं जानता हूँ । कल मेरे नाम भी उसका फोन आया था ।"
"क्या कह रही थी वह?"
"वह तुमसे अपनी ज़िंदगीके बारेमे बात करना चाहती है ---"
थोडी देरके लिये प्रकाश सोचता रहा । फिर उसने कहा, "संजीव, तुमने बडी गलती की । क्यों सबकॊ बोलते रहे कि तुम्हारी बीवी बच्च्चेको जन्म देकर मर गई?"
"तुमही बताओ, प्रकाश, और क्या करता मैं?"
"और कुछ भी कह देते । लेकिन उसके मर जानेकी यह बात? ओफ, अगर किसीको शक हो गया तो?"
"किसीको शक नहीं होगा ।"
"संजीव, मैं समझता हूँ कि फिर भी तुमने ठीक नही किया ।"
"प्रकाश, क्या ठीक है और क्या गलत इसका फैसला कौन करेगा? और वह जो मेरे जीवनसे खेल रही थी, क्या वह ठीक था?"
संजीवकी आँखोमें आँसूं भर आये । "क्या था मैं, और क्या बन गया हूँ आज?", संजीव उदास मनसे सोच रहा था । उसकी ज़िंदगी एक ऐसा सवाल बनकर उसके सामने खडी थी, जिसका उसके पास कोई जवाब नहीं था । जिन आँखॊंमे हमेशा एक ज़िंदा मुस्कराहट झलकती थी, उन्हीं आँखोंमे आज अक्सर एक अनकहा दर्द भरा रहता था । जिस पत्नीसे कभी उसने बहुत प्यार करना चाहा था, उसके मौतकी खबर सबको देते हुए उसके दिलपर भारी बोझसा रहता था । लेकिन वह मजबूर था । जो औरत उसके जीवनसे अचानक गायब हो गई उसके बारेमे वह और कहता भी क्या? और किस किससे? जबभी उसके बीवीकी बात छिडती तो वह दर्दभरी आवाज़मे कह देता, "मेरी बीवी मेरे बच्चेको जन्म देते वक्त मौतका शिकार हो गई । दोनों नही बचे ।"
यह बात सुनकर लोग दंग रह जाते थे । इस दुर्भाग्यपर संजीवसे सब हमदर्दी जताकर चल देते थे । कभी किसीको कोई शक नही होता । संजीव यह बात इतनी गंभीरतासे कहता कि कईं बार उसे अपने आपको इस बातपर विश्वास होने लगता । अपने इस अनूठे दु:खका हर पल जीनेकी वह क्षमता रखता था । अपने इस नये जीवनकी उसे आदत सी हो गई थी, जब सुनिताके फोनने उसे बेचैन कर दिया । आखिर यह औरत उससे चाहती क्या थी?
उस शामको संजीव घर जानेके बजाय क्लबमे पहुँचा । जातेही उसके सब दोस्तोंने उसे घेर लिया । आज संजीव बहुत समयके बाद क्लबमे आया था । सब उससे हमदर्दी जता रहे थे । संजीवके बीवी की मौतकी खबर कहींसे उनके कानोंपर पडी थी । सब उसे घेरे हुए थे । इतनेमे जॉनीकी आवाज़ सुनाई दी, "धत साले, झूठा कहींका ।" संजीवने मुडकर देखा, नशेमे धुत जॉनी उसीकी ओर आ रहा था ।
"अबे साले, तूने मुझसे झूठ बोला । मुझसे दगाबाज़ी किया । लायर ..."
संजीव कुछ समझ नही पाया । सब जॉनीका मज़ाक उडाने लगे । जॉनी ने सबको दूर हटाकर संजीवकी पीठपर हाथ मारा ।
"साले, तू बडा दगाबाज़ है ।"
"जॉनी, आखिर हुआ क्या? ज़रा बताओ भी ।"
"तू तो कह रहा था कि तेरी बीवी दो महीने पहले मर गई ..." जॉनी और कुछ कहनेवाला ही था कि संजीवने झटसे उसका मुँह बंद किया और खींचकर उसे एक कोनेमे ले गया । संजीव पीता नही था लेकिन उसने सुना ज़रूर था कि शराबके नशेमे लोग बहुत सारा सच उगल जाते हैं । वह हाथ जोडकर बोला, "जॉनी, उसका ज़िक्र यहां मत करो, प्लीज़ ।"
जॉनीने झटसे संजीवका हाथ हटा दिया और वह चिल्ला उठा, "क्यों ना करूं? साला, तू लायर है । दोस्तोंसे भी झूठ बोलता है और फिर उनको चुप रहनेको बोलता है ... हाथ जोडनेका नाटक करता है । साला, तू तो कह रहा था कि तेरी वाइफ़ और बच्चेको मरे हुए दो महीने हो रहे हैं ..."
संजीव अपना सर पकडे एक कोनेमे बैठ गया । पता नही जॉनी और क्या क्या बक देता? एक शराबीका मुँह भला कौन बंद कर सकता है? संजीवको चुपचाप बैठा देखकर उसका एक दोस्त उसके पास आया और अपना हाथ उसके कंधेपर रखकर बोला, "संजीव, तू जॉनीकी फ़िक्र मत कर -- उसको आज कुछ ज़्यादा चढ गई है । मैं जानता हूँ, तुम्हे तुम्हारे अपनोंकी याद सता रही है । लेकिन यह शराबी ..."
वहाँ वह शराबी ज़ोरज़ोरसे बोले जा रहा था, "साला झूठ बोलता है दोस्तोंसे । कहता है कि बीवी मर गई । एकदम नॉनसेन्स बोलता है । परसो शामको मै उसको स्टुडिओमे देखा, साला हीरोईनका मेक-अप कर रहा था । " जॉनीकी यह बात सुनकर सब ठहाका मारकर हँसने लगे । "जॉनीको बहुत ज़्यादा चढ गई है -- उसे मरे हुए लोग भी दिखाई देते हैं । पगला कहींका !"
लेकिन संजीव उस शराबी पागलकी बातोंसे डरा हुआ एक कोनेमे बैठा हुआ था । उसके चेहरेका रंग ऐसे उड गया जैसे उसने अभी अभी किसी भूतको देखा हो । वह चुपचाप सामने घूर रहा था ... अपने अतीतकी ओर ।
* * * * *
वह सामने घूर रहा था, अपने भविष्यकी ओर । उसकी नन्ही आँखोमे टूटे हुए सपनोंका रंग बिखरा हुआ था । एक कोनेमे बैठी उसकी माँ रो रही थी । वह सोच रहा था, आखिर लोग शादी क्यों करते हैं? क्या शादीका मतलब यही है? जब भी वह अपनी माँके साथ किसी शादीमे जाता, वहाँकी भीड और हँगामा देखता तो उसकी भोलीभाली आँखोके सामने एक शैतान आ जाता, जो दिनरात अपनी बीवीपर चिल्लाता रहता । बिना वजह उस गरीबको पीटता । नन्हे संजीवने बस शादीका यही रूप देखा था । वह बडी देरतक सोचता रहता, लेकिन उसे कोई जवाब नही मिलता ।
"माँ, बाबा तुमसे प्यार नही करते?"
कोई जवाब नही ।
"माँ, बाबा तुम्हे कहाँ मिले?"
"हमारे गाँवमे -- उन्होंने मुझे देखा और पसंद किया ।"
"और मैं तुम्हें कहाँ मिला?"
"तुम मुझे मिले नही... मैने तुम्हे जन्म दिया । नौ महीने यहाँ अपने पेटमे रखने के बाद ।"
"माँ, मैं इतना बडा, तुम्हारे इतने छोटेसे पेटमे कैसे समाया? और जन्म देना क्या होता है?"
संजीवके सवाल कभी खत्म नही होते थे । वह पूछता रहता ।
"माँ, यह घर, यह सामान हमें कहाँसे मिला? क्या बाबा इसे साथ लाये? यहाँसे हम कहाँ जायेंगे? क्या ये सब चीज़ें हम अपने साथ ले जायेंगे?"
"संजीव, बस भी करो. मै तंग आ गई हूँ तुम्हारे इन सवालोंसे ।"
थोडी देर चुप रहनेके बाद उसके सवालोंका सिलसिला फिर शुरू होता । जब अपनी माँसे डाँट मिलती तो अपने अनगिनत सवाल वह अपनी बहनसे करने लगता ।
"दीदी, बाबा माँसे प्यार नही करते?"
"तुमसे किसने कहा? करते हैं ।"
"तो फिर वह मम्मीको डाँटते क्यों रहते हैं? मारते क्यों है उसे? और अगर वह माँ से प्यार नही करते, तो फिर उन्होंने माँ से शादी क्यों की? शादीके बाद मारनेका हक मिलता है का? मैं कभी शादी नहीं करूँगा । तू करेगी शादी?"
अंजना अब युवावस्था की ओर कदम बढा रही थी । वह शर्मसे चूरचूर हुई । उसने संजीवको एक हलकीसी चपत मारी और कहा, "सुन, तू अभी बहुत छोटा है । ये बातें अभी तेरी समझमे नही आयेगी ।" संजीवके बहुत ज़िद करनेपर वह आगे बोली,
"पगले, शादी एक ही ऐसा रिश्ता है जो सबसे बडा होता है । बाकी रिश्तोंपर हमारा कोई ज़ोर नही होता क्योंकि हम उन्हे चुनते नही । वे रिश्ते बस हमसे जुड जाते हैं । मम्मी और पापा की शादीके बाद ही तो तुम पैदा हुए । और मम्मी तुमसे प्यार करने लगी । शादी हम उसीसे करते हैं जिसे हम जानते हैं, चाहते हैं और प्यार करते हैं ।" संजीवकी समझमे कुछ नही आया -- अपनी दीदीकी बातें सुनते सुनते वह सो गया ।
दिन बीतते गये । संजीवकी माँ अक्सर दुखी रहती थी । और पता नही क्यों, संजीवके दिलमे भी एक अजीबसा डर छिप गया था । वह कभी खुलकर बात नही करता, कभी मुस्कराता नहीं । उस घरकी कैदमे आज़ाद दिलसे कुछ भी तो नही कर पाता वह ! उसे वहाँ घुटनसी महसूस होती थी, फिर भी वह जी रहा था । और क्यों नही? उसकी प्यारी माँ भी तो वहीं जी रही थी ... एक ऐसे इन्सान के साथ जो उससे कतई प्यार नही करता था । एक ऐसे इन्सानके साथ, जिससे उसका सिर्फ़ शादीका रिश्ता था । यह संबंध तोडे क्यों नही जा सकते? जिस समाजके डरसे यह शादीका रिश्ता, आपसमे प्यार न होते हुए भी, निभाया जा रहा था, वह समाज आखिर चीज़ क्या थी?
कईं बार संजीव गुस्सेमे आकर अपनी माँ से कहता, "चलो माँ, हम यहांसे कहीं दूर चले जाते हैं । तोड ही दो यह रिश्ता । हम कोई नया घर बसायेंगे ।" लेकिन शायद उसकी माँ उस भयानक समाजसे डरती थी... शायद उसे अपने छोटे बच्चोंकी फिक्र थी ... या फिर हो सकता है कि ना चाहते हुए भी वह यह रिश्ता बनाए हुई थी । इस तमाशेसे तंग आकर कई बार संजीव अपने आपसे कहता, "मैं ऐसी शादी कभी नहीं करूंगा । जिस शख्स से मेरी ज़रा भी न बनती हो, उससे मैं निभाऊंगा कैसे? क्या शादी समाजके ठेकेदारोंकी दी हुई ऐसी ज़ंजीर है जो कभी टूट ही नहीं सकती? आखिर क्या मतलब है ऐसी शादीका? जो रिश्ता इन्सान खुद चुनता है क्या वह इतना घिनौना हो सकता है?"
इन्हीं सवालोंके जवाब तलाश करते हुए संजीव बडा होता गया । जो आज़ादी उसे अपने घरकी चार दीवारोंमे न मिल सकी थी, उसे वह घरके बाहर पानेकी कोशिश करता रहता । उसके जैसे दो अलग-अलग रूप थे । अपने घरमे वह प्यारसे महरूम, मायूस रहता तो घरसे बाहर हमेशा मुस्कराता रहता । वह जहाँ भी जाता, खुशी छा जाती । घरके सभी रिश्तोंमे वह विश्वास खो चुका था । अपना खोया हुआ बचपन वह खुले आसमान की छाँव तले ढूँढता । वह रोज़ नये रिश्ते ढूँढता रहता । जो रिश्ता इन्सान खुद अपनी मर्ज़ीसे जोड सके ऐसे दोस्तीके रिश्तेको वह सबसे अहम मानता । उसकी नज़रोंमे बाकी सभी रिश्ते बेमतलब और बेमानी थे । वह अक्सर घरसे बाहर रहता । जो प्यार उसे अपने घरमे नसीब न हुआ, वही प्यार उसे घरके बाहर बिना किसी शर्तॊंके मिलता । संजीवको हमेशा ऐसे साथियोंकी तलाश रहती जो बिना कोई सवाल पूछे उसे पूरी तरह स्वीकार करते ।
कईं बार वह महसूस करता कि उसके तलाशकी कोई मंज़ील ही ना हो । कईं बार भीडमे होकर भी वह अपने आपको अकेला महसूस करता । जैसे सारी दुनिया उसके साथ हो, लेकिन उसका अपना कोई ना हो ।फिर नये रिश्ते जुडते रहते । हर बार उसे लगता कि हर नये रिश्तेसे दिलका खाली कोना भर जायेगा । नये रिश्ते पुराने हो जाते, दिलका खाली कोना और भी ज़्यादा गहरा होता जाता । रह जाता एक नया दर्द । जब भी यह दर्द उसे सताता, तो संजीव सागर किनारे जा बैठता । सागरकी उठती-मचलती लहरोंमे उसे जीवनका संगीत सुनाई देता । कई बार वह चाहता कि अपने आपको सागरके हवाले कर दे और जीवन-संगीतका असली मतलब ढूँढ ले । लेकिन जितना वह ज़िंदगीसे उकता गया था, उतना ही मौतसे डरता था । जब भी वह मौतके बारेमे सोचता तो उसे वह अजीबसा सपना याद आता जो उसे अक्सर रातोंको जगा देता था । वह देखता कि अपनीही लाश उठानेके लिये चौथे आदमीकी तलाशमे वह यहाँवहाँ घूम रहा है ।
क्या सचमुच वह इतना अकेला था कि उसे अपनी लाश उठानेके लिये भी कोई न मिलता हो? वह चाहता कि किसीके लिये वह कुछ करे जिससे वह अपने आपको भूल जाये । उसे महसूस हुआ कि सभी लोग उसकी तरह नहीं थे । उसने महसूस किया कि सिर्फ बच्चे ही दोस्तीमे सब कुछ भूल जानेकी क्षमता रखते हैं ... बिना किसी मतलबके खुलकर हँसते-मुस्कराते । हँसीका खज़ाना पूरी तरह कोई लूटा सकता हो तो वे सिर्फ बच्चे ही थे । क्यों न हम बडे लोग इन बच्चोंकी तरह हमेशा हँसते रहे? मासूम बच्चोंको दुनिया भुलाकर हँसते-खेलते देख वह अपने सारे गम भूल जाता । उनके खिलते हुए बचपनमे वह अपने खोये हुए बचपनकी तलाश करता । कईं बार लोग "चाचा नेहरू" कहकर उसका मज़ाक उडाया करते । लेकिन उसने कभी इस बातकी परवाह न की ।
इस बीच उसकी बहन अंजनाकी शादी तय हुई । बाज़ारमे रक्खे गये बिकाऊ चीज़ोंकी तरह नुमाईश करानेके बाद किसी अन्जान शहरके एक अन्जान आदमीके साथ अंजनाका ब्याह तय हो गया । उसके पिताके अज़ीब स्वभावके कारण कईं बार अंजनाकी शादी होते होते टूट जाती थी । "जिस आदमीको मैं जानती हूँ, जिसे मैं प्यार करती हूँ, उसीसे शादी करूँगी" इस बातको बारबार दोहरानेवाली अंजना एक बिलकुल अजनबी के साथ शादीके बंधनोंमे बंध गयी । संजीवके बसमे होता तो वह कभी अपनी प्यारी बहनको उस अन्जान आदमीके साथ जाने न देता ।
शादीके सिर्फ एक साल बाद अंजना अपने घर वापस लौट आई । उसके सपनोंका महल चूरचूर हो गया । किसी कारण उसे पता चला कि उन दोनोंका निबाह होना मुमकीन नही था । जो कदम उठानेकी हिम्मत उसकी माँ मे नही थी, वह हिम्मत अंजनाने दिखाई । शादीका रिश्ता ठुकराकर वह वापस तो आ गई, लेकिन समाजके ठेकेदारोंके ताने सुनसुनकर वह मनही मनमे सहमा गई थी । जिस उम्रमे अंजनाका घर बसना चाहिये था उस उम्रमे उसका उजडा हुआ आशियाना देखकर संजीवका दिलभी टूट गया । अबतक वह शादीके कईं घिनौने रूप देख चुका था ।
एक तरफ़ वह शादीके नामसे भी नफ़रत करता, तो दूसरी तरफ़ दिल ही दिल में चाहता था कि जिस प्यारका अनुभव वह अपने पिताके हाथों खुद नही कर पाया था, वही प्यार वह अपनी औलादको दे । और इसके लिये उसे शादी तो करनी ही पडती ना? उसे यकीन था कि उसे कोई ऐसा साथी ज़रूर मिलेगा जो बिना किसी शर्तके उसे अपना लेता ।फिर चाहे वह साथी अच्छाबुरा जैसा भी हो, उसे वह स्वीकारेगा । आखिर इसीको तो प्यार कहते होंगे ना?
संजीव समझ गया था कि हर इन्सान किसी न किसी तरह अधूरा होता है । वह अपनी पत्नीको, फिर चाहे वह जैसी भी हो, -- उसकी अच्छाईयों और बुराईयोंके साथ स्वीकार करेगा । वैसेभी पूर्ण इन्सानकी तलाश कभी पूरी ही नही होती । उसे चाहिये कि वह हर हालमे मुस्कराता रहे । मुस्कराकर अपने अंदरका दर्द छुपाकर दुसरोंको खुशी दे । खुद दु:ख सहकर भी दूसरोंको खुश रखनेमे संजीव अजीबसी खुशी महसूस करता । उसके चेहरेकी खुशी उसकी सबसे कीमती दौलत थी ।
"जोकर आया, जोकर आया ।", चिल्लाकर सभी बच्चे संजीवकी ओर दौडे । जोकर भी अपनी टेढी चाल चलते हुए उन बच्चोंकी ओर दौडा । दौडते-दौडते वह पैर फिसलकर गिरा तो सब बच्चे उसके इर्दगिर्द जमा हो गये । जोकर रोने लगा तो बच्चे ज़ोरज़ोरसे हँसने लगे । बच्चोंको हँसते देखकर जोकर भी हँसने लगा । बच्चोंने मिलकर उसे उठा लिया और वे सब आनंदबज़ारमे घूमने लगे । कोई उसकी टोपी खींचता, कोई उसकी पीठपर मारता, तो कोई उसे पत्थर मारता -- फिर भी जोकर हँसता रहता, सबसे हाथ मिलाता, सबको गले लगाता ।
यहींपर सुनिताने पहली बार संजीवको देखा । वह अपनी सहेली मायाके साथ वहां आई थी । संजीवको हँसतेखेलते देख उसने मायासे पूछा, "कौन है वह जोकर?"
"हूँ... लगता है जोकर तेरा दिल ले गया ! अरी, तू तो बंदरिया दिखती है । अब इस जोकरको लेकर एक सर्कस शुरू कर दे । अच्छा खेल जमेगा" ।
मायाकी यह सीधी बात सुनिताको शूलकी तरह चुभी । मायाने शायद मज़ाकमे यह बात की हो, लेकिन सुनिता अपने आपपर हँस भी नही सकती थी । अपने काले रंगका ज़िक्र सुनकर वह कुछ देरके लिये चुप रह गई । मायाने फिर उसे छेडते हुए कहा, "ए बंदरिया, मै उस जोकरको बहुत अच्छी तरह जानती हूँ । कहो तो, ’इण्ट्रो’ दूँ?" फिरसे सुनिताके चेहरेपर हँसी छा गई । भीड निकल चुकी तो माया सुनिताको संजीवके पास ले गई "इण्ट्रो" देनेके लिये । अबतक संजीवने मुँह धो लिया था । जोकरके रंगीन चेहरेके पीछे छिपा हुआ उसका असली चेहरा सुनिताको पहली नज़रमे भा गया । उसने संजीवसे बातें करनेकी कोशिश की, लेकिन वह चुप था ।अपनी मीठी ज़बानसे सब बच्चोंका दिल जीतनेवाला संजीव बडोंसे बातें करनेमे झिझकता था । और फिर एक लडकीसे?
जब वह कॉलेजमे पढ रहा था तब भी उसे एक लडकीसे प्यार हुआ था ।उसने बहुत चाहा कि धीरज बँधाकर वह अपना प्यार जताये । लेकिन लडकी अमीर थी और उसे डर था कि कहीं वह इस रिश्तेसे इन्कार न कर दे । उसने हिम्मत ही नही की और सब कुछ शुरू होनेसे पहलेही खत्म हो गया । अब तो उसे यह भी पता नही था कि वह कॉलेजेवाली लडकी कहाँ और किस हालमे होगी । और यहाँ यह लडकी है जो मुझसे बात करना चाहती है... जानपहचान बढाना चाहती है ! संजीव मन ही मन खुश हुआ कि कोई उसे चाहने लगा था । इस अहसाससे संजीव खुश था किसीने उसे चुन लिया था । क्या इसीको प्यार कहते है ? क्या बाबाने माँ को इसी तरह देखकर चुन लिया था?
उसने झुकी हुई नज़रोंसे सुनिताको देखा । उस लडकीमे कोई भी बात ऐसी नही थी कि जो किसीका मन मोह ले । उसे अपनी बडी बहनका ख्याल आया । शायद इसे भी किसी कारण रिश्ता जोडनेमे दिक्कत होती होगी, जैसे अंजनाको हुआ करती थी । कितनोंने इसके बाहरी रूपको देखकर इससे शादी करनेसे इन्कार किया होगा । अगर मैं भी ऐसा करूं, तो उन लडकोंमे और मुझमे फर्क क्या रहा? मैं तो औरों जैसा नही हूँ, फिर ये कैसी बातें सोच रहा हूँ? अंजनाका जन्म एक ऐसा इत्तेफ़ाक था जिसपर उसका कोई बस नही था, फिर भी लोग उसे ठुकराते आये थे क्योंकि वह एक ऐसे आदमीकी बेटी थी जो दुनियाकी नज़रोंमे बुरा था । तो क्या सुनिताके साथ भी वैसाही होगा जैसा अंजनाके साथ हुआ था? इसेभी दुल्होंके बाज़ारमे एक बिकाऊ चीज़की तरह नुमाईशपर रक्खा जायेगा? इसेभी लोग देखने आयेंगे और ठुकराएंगे, सिर्फ इसलिये कि वह खूबसूरत नही थी? लेकिन अपने खूबसूरत या बदसूरत होनेपर किसका बस होता है? वह खुद तो ज़िम्मेदार नही थी इस बातके लिये? संजीवने सोचा, जब मै शादी करूँगा तो ऐसी छोटीछोटी बातोंपर बिलकुल ध्यान नहीं दूँगा ।
कुछ दिनॊं बाद सुनिताके घरवाले उसका रिश्ता लेकर संजीवके घर आये तो कुछ देरके लिये वह सोचमे पड गया । सारे जीवनभरका सवाल इतनी जल्दी सिर्फ हाँ या ना मे देना इतना आसान तो नही था । वह ना सुंदर थी ना ही ज़्यादा पढीलिखी । वे एक दूसरेको ठीकसे जानते भी नही थे । संजीवके सोचनेका ढंग बिलकुल अनूठा था । क्या यह लडकी उसे समझ पायेगी? क्या संजीव उसे प्यार कर पायेगा? दूसरे पल वह सोचता, आखिर प्यार किस चिडियाका नाम है? बस वह एक भावना ही तो है । पति-पत्नी एक साथ रहेंगे, एक दूसरेको समझने लगेंगे, जान जायेंगे, तो फिर प्यार अपने आप हो ही जायेगा । क्यों न मैं इस लडकीको "हाँ" कह दूँ, जिसने मुझे चुन लिया है । रिश्तेकी बात छेडने आये हैं तो उन्होंने पूछताछ तो की ही होगी । जब इसने मेरेलिये "हाँ" कह दी है तो "ना" कहनेवाला मैं कौन होता हूँ? संजीवने झटसे रिश्ता कबूल किया ।
जल्दही सुनिताके घरवाले सगाईकी तारीख तय करनेके लिये संजीवके घर आये । पता चला कि सुनिताके पिता संजीवके पिताजीके दोस्त थे । संजीवके सगाईकी बात जल्दही सब जगह फैल गयी । सगाईके दिन अंजनाकी एक सहेली वहाँ मौजूद थी । उसने धीरेसे अंजनाके कानोंमे कुछ कहा । अंजनाने संजीवको अपने पास बुलाकर उससे पूछा, " संजीव, ज़रा यहाँ तो आओ ।"
"क्या बात है, दीदी?" संजीवने पूछा ।
"सुना है, लडकी शराब पीती है, सिगरेट पीती है ।"
"मैं जानता हूँ, दीदी ।", संजीवने कहा । "और मैंने उससे यह भी कह दिया है कि सिर्फ़ समाजके डरसे उसे अपनी ये आदतें छोडनेकी ज़रूरत नही । जब उसे अहसास हो कि ये आदतें उसके लिये ठीक नहीं, तो वह अपने आप उन्हे त्याग दे । जैसे मैं नही चाहता कि मुझपर किसी तरहका दबाव न डाला जाये, ठीक उसी तरह पतीके नाते मैं भी उसपर कोई दबाव नही डालना चाहता ।"
"संजीव, शायद तुम समझते हो कि तुम्हारे आदर्श बहुत ऊँचे हैं । लेकिन वक्त आयेगा जब तुम पछताओगे ।" इतना कहकर अंजनाने मुँह फेर लिया ।
संजीव अपने आपसे मुस्कराने लगा । उसने मनही मन कहा, "शायद मुझे कोई समझ नहीं पाता । क्या हमेशा यही होता रहेगा?"
संजीव और सुनिताकी सगाई हो गई । संजीवकी बस एकही शर्त थी कि सगाई और शादी के बीच कमसे कम छ: महीनोंका अंतर हो, जिससे दोनोंको एक दूसरेको समझनेका वक्त मिले । अपने माता-पिता के अनुभव के बाद वह ज़रूरी समझता था कि पति-पत्नी एक दूसरोंकी अच्छी-बुरी आदतोंको जान ले, उन्हें स्वीकार करनेकी क्षमता रक्खें । वह नही चाहता था कि उसकी शादीका वही अंजाम हो जो उसके अपने माता-पिताकी शादीका हुआ था । जिसे समाज सुनिताकी कमज़ोरियाँ कहता था संजीव उन्हॆं जानता था, और वह यह चाहता था कि सुनिता भी उसकी सभी कमज़ोरियोंको समझ ले ताकि उसे शादीके बाद कोई शिकायत ना हो ।
संजीव सारी दुनियाको अपना समझता था । कभी इसके लिये, कभी उसके लिये, तो कभी और किसीके लिये कुछ न कुछ करनेमे उसे खुशी महसूस होती थी । और इन कामोंसे जब कभी उसे फुरसत मिलती तो वह सुनितासे मिलने जाता । कभी वह उससे मिलने आती । एक बार उसके शिकायत करनेपर संजीवने सुनिताको समझानेकी कोशिश की । "देखो सुनिता, मेरी ज़िंदगी कई हिस्सोंमे बँटी हुई है । जो वक्त मैं तुम्हें नहीं दे पाता, उसके बारेमे शिकायत करनेके बजाय मैं जो वक्त तुम्हारे साथ गुज़ारता हूं उसे एन्जॉय करो । शिकायत करनेसे कुछ हासिल नहीं होगा । उल्टा हो सकता है कि मैं तुमसे दूर होता रहूंगा । मुझे अभी किसी भी बंधनोंमे ज़कडेनेकी कोशिश मत करो, मुझे घुटनसी होती है । मुमकीन है कि कुछ वक्त साथ गुज़ारने के बाद मैं अपने आप सँवर जाऊँ ।"
वक्त गुज़रता गया । जैसे-जैसे शादीकी तारीख पास आने लगी, वैसे-वैसे संजीवको एक अज़ीबसा डर लगने लगा । जिस आज़ादीको मैंने बडे प्यारसे संजोया था, कहीं वह शादीके बंधनोंमे खो तो नहीं जायेगी? उम्रभरके इस बंधनका क्या मैं उसी तरह सामना कर पाऊंगा जिस तरह आजतक करता आया हूँ? क्या होगा मेरा? कहीं मेरे कारण सुनितापर भी बंदिशें आ जायेगी तो? लेकिन मैंने तो उसे सब साफ-साफ बता दिया है । अगर उसे मेरे अज़ीब खयालात पसंद नही तो उसे मुझसे कोई उम्मीद ही नहीं रखनी चाहिये । संजीव जितना सोचता उतनाही घबरा जाता ।
कभी कभी उसे लगता कि सुनिता उसके हर रूपको स्वीकार करनेको तैयार है । अगर ऐसा नहीं होता तो वह इस बंधनमे बंधना ही क्यों चाहती? उसने कईं बार सुनिताको कहा भी, "अगर मेरे साथ मेरे तरीकेसे रहना मुश्किल समझो तो शौकसे इसे तोड सकती हो । मेरा स्वभाव इतनी आसानीसे बदलना अगर असंभव नहीं तो मुश्किल ज़रूर होगा । सिर्फ़ समाजके डरसे शादीके बंधनको स्वीकार मत करो ।" इस बातपर सुनिता सिर्फ़ मुस्कराई थी । सच, क्या यह शादी करके मैं खुश रह पाऊँगा?
संजीवका मन दुविधामे पड गया था । लेकिन वक्त कहाँ रुकनेवाला? पतझड गई, बसंत आया । पेडोंपर फिर एक बार बहारें आईं ; सारा मौसम खुशीसे डोलने लगा । पँछी चहकचहक कर गीत सुनाने लगे । चारों तरफ़ खुशियाँ छाई हुईं थी । सब जगह शहनाईयाँ बज रही थीं । सिर्फ़ संजीव सोचमे डूबा हुआ था, जैसे अंतरात्माकी कोई आवाज़ उसे चेतावनी दे रही हो । लेकिन अब हो भी क्या सकता था? मेरे शहीद होनेका वक्त हो चुका है, वह अपने आपसे मुस्कराकर बोला ।
वक्त आया और चला गया । शादीके बाद सब रिश्तेदार और दोस्त अपने अपने घर चले गये । संजीवके जीवनमे एक नया दौर शुरू हो रहा था । पता नही क्या लिखा है मेरे भविष्यमें? अंध:कार ... या सुनहरा उजाला?
संजीव दबे हुए कदमोंसे कमरेमे आया । उसकी आहट लगतेही सुनिता शरमाई और सिकुडकर बैठी । उसने अपना घूँघट ओढ लिया और दाँतोतले अपने होंठ दबाकर वह संजीवकी प्रतीक्षा करने लगी । उस अँधकारको चीरते हुए धीमीसी रोशनीमे भी वह संजीवके सुडौल शरीरको देख सकती थी । ओफ़ ! आज वक्त रुका हुआ क्यों है ? सारी उम्रभर सुनिताने इस रातके सपने सजाये थे -- बडी बेसब्रीसे इस सुहानी घडीका इन्तज़ार किया था । इससे बडी खुशी उसने इससे पहले जानी नहीं थी । दो शरीरोंका मिलन ....
"सुनिता, एक बात पूछूँ?"
"हं ...."
"सेक्सके बारेमे तुम्हारे क्या विचार हैं?"
"ऊई माँ! ऐसा बेशर्म सवाल?", इस अचानक सवालसे शरमाकर सुनिता बोली ।
"इसमे बेशर्मी की क्या बात है, सुनिता?", संजीव बोला । "हमें चाहिये कि हम इस बारेमे एक दूसरेके विचार जान लें । मैं तो समझता हूं कि शादीसे पहले किसीको ’सेक्स’ के बारेमें सोचना नही चाहिये । इतने पवित्र मिलनको बेसब्रीसे गंदा रूप नहीं देना चाहिये । हाँ, हालाकि ये मेरे अपने विचार हैं और दूसरोंके बारेमे मैं कुछ नही कहना चाहता । तुम क्या समझती हो?"
आज अपनी सुहाग रातको पलंगपर बैठे ये बातें सुनकर सुनिताको अजीबसा लगा । इससे पहले जब वे दोनों इस विषयपर बोले थे तब वह झूठ बोली थी । लेकिन संजीव, आज यह कोई वक्त है इन बातोंमे समय बरबाद करनेका? वह चाहती थी कि संजीव चुपचाप वहाँ बिछे हुए फूलोंको मसल दे -- दोनों हमेशा-हमेशाके लिये एक दूसरेमे समा जाये । ओह संजीव, अब आ भी जाओ ...
संजीव धीमे कदमोंसे आकर पलंगपर बैठ गया । उस अंधेरे कमरेमे अब रोशनी छा गई थी । सुनिताकी गर्दन झुक गई । इस वक्त जब उसे इस अंधेरेसे प्यार होने लगा था, तब उन दोनोंके बीच यह रोशनीका पर्दा क्यों था? संजीवने सुनिताका घूँघट दूर किया, प्यारभरे हाथोंसे उसकी झुकी हुई गर्दनको उठाया और धीरेसे अपने होंठ उसके होठोंपर रख दिये । सुनिताके पूरे बदनमे बिजलीसी दौडने लगी । उसे सिर्फ़ इसी घडीका इन्तज़ार था, और उसके इन्तज़ारकी घडियाँ खत्म होनेको थी । संजीवने फिरसे उसकी ओर देखा और कहा, " सुनिता, आज मैं बहुत थक गया हूँ । चलो, सो जायें, अब पूरी उम्र साथ ही तो रहना है ।"
सुनिताने चौंककर संजीवकी ओर देखा । वह थकानसे चूर बिस्तरपर लेट गया था । सुनिताकी आँखोंमे अब संजीवके लिये घृणा भरी हुई थी । यह कैसा शैतान है जिसने उसके सपनोंकी दुनियाको उजाड दिया था? वह गुस्सेसे मुँह फेरकर सो गई ।
सूरजकी किरणोंने जब संजीवको जगाया तब उसने देखा कि सुनिता गहरी नींद सो रही थी । उसे जगाना संजीवने ठीक नही समझा । झुककर उसने सुनिताके चेहरेको चूमा । जब सुनिताकी आँख खुली तो उसने देखा कि संजीव कहीं जानेकी तैयारियाँ कर रहा था ।
"कहाँ जा रहे हो तुम?" सुनिताकी आवाज़में गुस्सा झलक रहा था ।
"सुनिता, इतना गुस्सा ठीक नहीं ।"
"यह मेरे सवालका जवाब नही । और जो तुम कर रहे हो वह क्या ठीक है?"
"अच्छा, तो इस लिये नाराज़ हो? सुनिये मोहतरमा, मै स्कूल जा रहा हूँ ।"
संजीवके इस ठण्डे मिजाज़से वह और चिढ गई । "तुम भूल रहे हो, कलही तुम्हारी और मेरी शादी हुई है । आज जाना ज़रूरी है? आज मेरे साथ नही रह सकते?"
संजीवने हँसकर उसका हाथ थामा और जवाब दिया, "सुनिता, हम दोनों को तो उम्रभर साथ रहना है । और रही आज जानेकी बात, तो हाँ, आज जाना ज़रूरी है ।"
"क्यों?"
"क्योंकि कल शामको स्कूलका सालाना जलसा है, जिसके लिये बच्चोंकी प्रॅक्टीस लेना मेरी ज़िम्मेदारी है । पहले ही काफी दिनोंसे मैं जा नहीं सका था । सब बच्चे मेरी राह देख रहे होंगे । मैं ज़बान दे चुका हूँ । क्या तुम चाहती हो कि मैं अपने फर्ज़से मुँह मोड लूँ?"
"तो क्या शादी-प्यार कोई फ़र्ज़ नहीं?"
"ज़रूर है, लेकिन मै प्यारके फ़र्ज़से ज़्यादा फ़र्ज़के प्यारको मानता हूँ ।"
इतना कहकर संजीव झटसे बाहर चला गया । घरसे बाहर निकलकर उसकी चाल अपने आप धीमी हो गई । वह सोचनेपर मज़बूर हुआ । क्या उसका जीवनसाथीका चुनाव सही था? क्या सुनिताका बर्ताव सही था? क्या सुनिताके प्रति उसका अपना बर्ताव सही था? प्यारमे सारी दुनियाको भूल जाना ज़रूरी होता है क्या? अगर सुनिता गुस्सेके बजाय प्यारसे उसे रोकनेकी कोशिश करती, तो शायद वह रुक जाता । लेकिन ---
शामको जब वह देरसे घर लौटा तो उसने देखा कि सुनिता एक कोनेमे मुँह लटकाकर बैठी थी । उसके पास जाकर संजीवने बात करनेकी कोशिश की तो सुनिताने गुस्सेसे अपना मुँह फेर लिया और दूसरी जगह जाकर बैठ गई । यकायक संजीवको अपने आपसे घृणा होने लगी । उसने सोचा था कि थका हुआ घर लौट आनेपर कोई उसे प्यारसे पानी पूछेगा, उससे बातें करेगा । बाथरूम जाकर संजीवने बहते नलके ठण्डे पानीके नीचे अपना सर रखा ।
रातको सुनिता दीवारकी ओर मुँह किये लेटी हुई थी । संजीवकी आहट लगी तो वह उठकर बिस्तरपर बैठ गई । संजीव उसके पास बैठ गया । "सुनिता, मै तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ ।"
"संजीव, मैं भी तुमसे बहुत कुछ कहना चाहती हूँ ।"
"सुनिता, पहले मेरी बात सुनो । मैं जानता हूँ, तुम मुझसे बहुत नाराज़ हो । अपनी सुहाग रात तुम्हें करवट बदलकर गुज़ारनी पडी । सच कहूँ तो थकानका एक बहाना था । मेरे जीवनमे कुछ ऐसी घटनाएँ घटी हैं, जिनके कारण मैं अपने आपमे, इन रिश्तोंमे विश्वास खो चुका हूँ । मुझे तुम्हारे सहारेकी ज़रूरत है । मैने पहलेभी तुम्हे मेरे जीवनके बारेमे बताया है, और आज फिर एक बार बताना चाहता हूँ ।" संजीवने अपनी सारी जीवनकहानी सुनिताके सामने दोहराई और उसे लगा जैसे उसके दिलका बोझ कुछ हलका हो गया ।
"संजीव, तुमने अपनी रामकहानी तो सुना दी । अब मेरी सुन लो । एक लडकीको अपने माँ-बापके घरमे सब कुछ मिल जाता है, सिवा सेक्सके । और एक लडकी शादी करती है तो सिर्फ़ अपने सुहाग रातकी तमन्ना लेकर । ..... "
सुनिता बोलती रही और संजीव सुनता रहा । सुनिताका एकएक शब्द उसके दिलमे शूलकी तरह चुभ रहा था । उसे लगा, उसकी आँखोंके सामने उसके प्यारका महल टूट रहा था । तो क्या एक औरत सिर्फ़ सेक्सके लिये शादी करती है? शादी क्या सिर्फ़ सेक्सका नाम है? शादीका अटूट बंधन कोई मायने नही रखता? अगर किसीको सिर्फ़ सेक्स ही चाहिये होता है, तो क्या मण्डीमे नही मिलता? एक मर्द और एक औरतको क्या एक ऐसे घरकी ज़रूरत नही होती जहाँ उसे प्यार मिले? अपनापन मिले? हमदर्दी मिले? एक ऐसा जीवनसाथी मिले जो एक दूसरेको उसकी कमज़ोरियोंके साथ अपना ले? क्या शादी सेक्सका सिर्फ़ लायसन्स है? सिर्फ़ एक सौदा? मुझे ऐसा सौदा तो नही करना था । उसे अपने जीवनमे एक दरारसी नज़र आने लगी ।
दूसरे दिनसे ही संजीवको सुनिताके व्यवहारमे कुछ बदलावसा नज़र आने लगा, जैसे कोई भारी बोझ दिमागपर लेकर वह जी रही हो । उसके चेहरेसे हँसी गायब हो गयी । पूरे घरमे मातमसा छाया रहता । ऐसे माहौलमे संजीवको घुटनसी महसूस होने लगी । उसे लगने लगा कि उसने कोई बहुत बडा गुनाह किया हो जिसके कारण सुनिता नाराज़ थी । धीरेधीरे उसे अपने आपसे नफ़रत होने लगी । देखते ही देखते उसके चेहरेसे भी हँसी गायब होने लगी । हर वक्त वह चिढचिढासा रहने लगा । आजतक उसे लगता था कि लोग उसके करीब आकर खुश रहते हैं । लेकिन उसके अपने घरमे यह आलम था कि उसकी अपनी जीवनसंगिनी उसके कारण हमेशा मायूस रहती । क्या संजीवके व्यक्तित्वमें ही कोई कमी थी? यह न्यूनगण्ड हमेशा उसे सताता रहता ।
फ़िरभी एक बात उसकी समझमे नही आयी । दिनभर उससे खफ़ाखफ़ा रहनेवाली सुनिता रात होतेही बदल जाती । दिनभर उससे दूरी रखनेवाली वह औरत रातके अंधेरेमे उससे लिपट जाती । जैसे बिस्तरपर होनेवाली और बिस्तरसे बाहर होनेवाली सुनिता दो अलग-अलग व्यक्तित्व थे । यह बात संजीवके समझमे नही आई और वह इस रहस्यपूर्ण औरतके साथ रात बितानेमे झिझकने लगा । यह नकाब किस लिये? यह ढोंग कैसा और आखिर क्यों? दिनमे उससे दूरदूर भागनेवाली उसकी पत्नी रात होतेही उससे लिपटी रहती? उसे गलीमे देखे हुए वे कुत्ते याद आये जो जब जी चाहे यौनाचार कर पाते । आखिर शादीका मतलब क्या सेक्सतक ही सीमित होता है? अगर मैं भी यह करनेमे सफ़ल रहूं तो मुझमे और मेरे पितामे अंतरही क्या रहा? फिर दोनों पशूही तो कहलायेंगे ना? कई दिनोंतक यह सिलसिला चलता रहा -- दिनमे सुनिता उससे दूर भागती और रातको संजीव सुनितासे दूर रहता । आखिर उसने एक दिन सुनितासे पूछ ही लिया, "सुनिता, जो रुची तुम रातोंमे दिखाती हो वह दिनमे क्यों नही?"
"कैसी बात कर रहे हो संजीव? हम आखिर दिनमे ’वह काम’ कैसे कर सकते हैं?"
सुनिताका जवाब सुनकर संजीव हैरानसा रह गया । क्या इस लडकीका सारा जीवन "उस काम" के दायरेमेही सीमित था? क्या उसके लिये शादीका मतलब सेक्सके सिवा और कुछ नही था? यह कैसी औरतसे मैने अपने आपको बाँध लिया है? हम दोनोंकी सोच अलग है, रास्ते अलग हैं, मंज़िलें अलग हैं । अगर बात सिर्फ़ जिस्मानी रिश्तोंकी है तो आखिर दो दिल मिले भी तो कहाँ और कैसे? सोच-सोचकर संजीवका सर चकराने लगा । एक दिन उसने सुनितासे कहा, "सुनिता, हो सकता है, तुमने गलत आदमीसे रिश्ता जोडा है । तुम्हे एक ऐसे रिश्तेकी तलाश थी जो कहीं भी पूरी हो सकती थी । तुम्हें एक जिस्म चाहिये था, जिसका कोई नाम ना हो, कोई चेहरा ना हो, अलग अस्तित्व ना हो । तुम्हे तलाश थी एक ऐसे बदनकी जो रातके धुँधले उजालेमे तुम्हारे बदनको गर्मी दे सके । तुम्हारे सेक्सकी भूख मिटा सके । और मुझे तलाश थी एक ऐसे साथीकी जो ना सिर्फ़ मेरे बदनकी, बल्कि मेरे दिलकी, दिमागकी ज़रूरत पूरी कर सके । मैं समझता हूँ कि हम एक दूसरेसे गलत जगह मिले हैं । हमें बाज़ारमे होना चाहिये था, लेकिन हम एक घरमे बंद हैं ।"
"तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई, संजीव, मुझे वेश्या कहनेकी? तुमने मुझे वेश्या कहा?" सुनिता झल्लाकर चिल्ला उठी ।
"सुनिता, जो मैने कभी कहा ही नही, तुम हमेशा वही सुनती आयी हो । शायद गलती मेरी ही थी ।"
"क्या मतलब?"
"क्या यह सच नहीं कि तुम सिग्रेट और शराब भी पीती हो?"
"तो इसमे कौनसी बडी बात है, मिस्टर संजीव? मै जिस माहौलमे काम करती आई हूँ, वहाँ तो यह आम बात है । ऊँचे घरकी कईं औरतें सिग्रेट और शराब पीती हैं ।"
"ऊँचे घरकी औरतें पीती होंगी, हमारे घरकी नहीं ।"
"और तुम्हें पता भी था इस बातका ।"
"और इसीलिये मैं चुप था । किसी भी तरहका दबाव नही डालना चाहता था तुमपर । अगर चाहता तो तुमपर ज़बरदस्ती कर सकता था कि ये सब बातें मुझे कतई पसंद नही, और ये आदतें छोड दो । लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया । सोचा, तुम्हे खुद एहसास होगा किसी दिन और छोड दोगी ये सब बातें ।"
"तो क्यों नही किया? क्यों मेरी ज़िंदगी बरबाद की?"
"किसने किसकी ज़िंदगी बरबाद की, किसे पता, सुनिता? मैं हमेशा अपने फ़ैसले अपने आप लेता आया हूँ, और चाहता था कि तुमभी वही करो । मुझे अभिमान था तुमपर कि तुम ढोंगी नही हो । जो भी करती हो, खुले आम करती हो । कितना गलत था मैं ।"
कहनेको तो उस दिन बात वहींपर खत्म हुई, लेकिन उन दोनोंकी बीच एक ऐसी दीवार उभर रही थी जिसको पार करना दोनोंके लिये मुश्किल था । उस रातके बाद, संजीव ज़्यादासे ज़्यादा वक्त घरके बाहर गुज़ारने लगा । एक दिन जब उसकी माँने पूछा तो उसने जवाब दिया, " घरमें रहकर भी क्या करूं माँ? जो चीज़ घरमे नही मिलती उसे बाहर ढूँढनेसे दिल तो बहलता है कुछ देरके लिये ।"
देखते-देखते दिन महीनोंमे गुज़र गये । अपने हँसीका खज़ाना अब संजीव घरसे बाहर दूसरोंके लिये लुटाता फिरता । संजीव और सुनिताके बीचकी दूरी बढती ही गई । जब किसी कारणवश उन दोनोंको एक साथ बाहर निकलना पडता तो वे खुशीका एक झूठा नकाब पहनकर निकलते, जिससे किसीको कुछ पता नहीं चलता ।
फिर एक दिन सुनिताने संजीवसे पूछा, "आखिर ये सब कबतक चलता रहेगा?"
"क्या?"
"यही तुम्हारा दिनभर घरसे गायब रहना? घर ज़ल्दी क्यों नही आते? हर समय बच्चो-बूढोंको लेकर घूमते रहते हो, कभी मुझे लेकर घूमने क्यों नही जाते?"
"घर जल्दी आऊँ भी तो किस लिये? तुम्हारा यह हरदम चढा हुआ चेहरा देखने? अगर कभी तुम्हे खुश देखता हूँ तो सिर्फ़ जब साथ सोनेकी बात आती है तब ।"
"तो इसमे बुरा ही क्या है? वह हक है मेरा । मैं चाहती हूँ, तुम हमेशा मेरे साथ रहो ।"
"साथ रहूँ बिस्तरमें? तुम्हारा बस चले तो सब कामधाम छोडकर चौबीस घण्टे मुझे अपने साथ सुला दोगी ।"
"अगर तुम्हे अपने पास रखनेका यही रास्ता है तो मैं वही करूंगी ।"
"सुनिता, मैंने तुमसे कईं बार कहा है कि जो समय मैं तुम्हारे साथ गुज़ारता हूं, उसमे खुश रहनेकी कोशिश करो, ना कि उस वक्तके बारेमे शिकायत करती रहो जो मैं तुम्हारे साथ नहीं गुजार पाता । एक दूसरेको अपनी मुठ्ठीमें बंद रक्खो, इसका मतलब प्यार तो नहीं । क्या यह मुमकीन नही कि कुछ वक्त तुम अपने आप गुज़ारो, कुछ मैं अपने आप गुज़ारूं और कुछ हम एक दूसरेके साथ गुज़ारें? जिनसे हम सच्चा प्यार करते हैं उन्हें हमें खुले आसमानमे छोड देना चाहिये । अगर वह लौटकर आये तो वह अपना कहलाता है । वर्ना वह कभी अपना था ही नहीं ।"
संजीवकी बहस सुनकर सुनिता झल्ला उठी । "यह तुम्हारा फलसफ़ा मेरी समझके बाहर है और ना ही मैं उसे समझना चाहती हूँ । मैं बस चाहती हूँ कि तुम सिर्फ़ मेरे हो और सिर्फ़ मेरे बनकर रहो । मैं तुम्हे किसी औरके साथ बाँटना नही चाहती । बिल्कुल नही ।"
"देखो सुनिता, प्यार बाँटनेसे कम नहीं होता । प्यार एक झरना है इन्सानके दिलमे, जो बस बहना चाहता है, बिना किसी बंधनके । उसके कईं नाम होते हैं ।अच्छे-बुरे नाम देकर समाज प्यारको बंधनोंमे जखडना चाहता है । मैं समझता हूँ, जिस प्यारकी तुम्हे भूख है, वह सेक्स सिर्फ़ एक छोटासा रूप है प्यारका । और मै प्यारके सिर्फ़ इस रूपमे विश्वास नही रखता । जब आदमी थका-मांदा शामको घर लौटता है तो उसकी पत्नीकी आँखोंमे जो लुक्का-छुप्पी खेलता है, मुझे उस प्यारकी तलाश है । मै ..."
संजीवको बीचमे टोकते हुए सुनिता चिल्ला उठी, "ये तुम्हारी किताबोंवाली बातें मुझे मत सुनाओ । मै सिर्फ़ व्यवहारकी बातें समझती हूँ । तुम्हारे लेव्हलतक उठना मेरे बसकी बात नहीं ।"
संजीवने हँसनेकी कोशिश करते हुए कहा, "सुनिता, किसीके लेव्हलतक मत उठो, कमसे कम कोशिश तो किया करो ।"
ना चाहते हुए भी सुनिताने अपने आपको बदलनेकी कोशिश की । लेकिन उसका असली चेहरा बारबार उभर आता । किसी शामको वे दोनों एक पार्टीमे गये हुए थे । हमेशाकी तरह संजीव सबसे मिलजुलकर पार्टीकी जान बनता रहा, हँसताहँसाता रहा । संजीव और उसके दोस्तोंके लाख कोशिश करनेपर भी सुनिता सबसे अलग अपने आपमे खोई बैठी रही । घर लौटते हुए भी वह काफ़ी देर चुपचाप बैठी थी । फिर मौका पाकर वह अपने दिलकी भडास निकालने लगी, संजीवको छोटेमोटे ताने देने लगी । उसे बस यही शिकायत थी कि संजीवने उसके साथ बहुत कम वक्त बिताया । जब संजीव सह नही पाया तो वह भी बोल उठा, "अगर हम पार्टीमे जाते हैं तो लोगोंसे मिलने, ना कि एक दूसरेके गलेमे लिपटके बैठने । मै अगर हर किसीसे बात करता हूँ तो इस लिये नही कि जानबूझकर तुम्हे अकेला छोडूँ । स्वभाव है मेरा । अपने दोस्तोंके साथ वक्त बितानेसे मैं तो कभी तुम्हें रोकता नहीं । अगर तुम ज़रासा भी बदलनेकी कोशिश नही करना चाहती तो मुझसे यह उम्मीद क्यों रखती हो कि रातोंरात मैं बदलूँ? शादीसे पहले अपने घरमे तुम किसी और ढंगसे जीती थी, तो यहाँ अचानक यह बदलाव क्यों? क्या अपने घरमे तुमने यह कोशिश नही की कि अपनी माँ को ज़्यादा काम ना करना पडे? तो मेरे घरमे मेरी माँ से यह बर्ताव क्यों? क्यों सवेरे-सवेरे उठकर सब काम उसेही करने पडते हैं? क्या मेरी माँ तुम्हारी माँ नही? क्या मेरा घर तुम्हारा घर नही?"
"नही, यह घर मेरा नही । जहाँ रातको मुझे छोटेसे किचनमें सोना पडे, वह घर मेरा कभी नही हो सकता । मुझे एक बडा घर चाहिये जहाँ मैं रानी बनकर रहूँ, ना कि एक नौकरानी, जिसे किचनमे सोना पडे, समझे? यह घर मेरा नही । और ना ही तुम्हारे घरवाले मेरे घरवाले हैं । "
सुनिताकी यह बात सुनकर संजीव दंग रह गया । "ओह, तो तुम्हे एक महलकी तलाश थी -- एक घरकी नही, जिसमे सीधेसाधे लोग रहते हैं ! ठीक उसी तरह, जिस तरह तुम्हे सिर्फ़ एक बेजान जिस्म की ज़रूरत है जो जब तुम चाहो तुम्हारे बदनसे लिपटा रहे । तो क्यों यह शादीका ढोंग रचा रही हो? क्यों अपने आपको इस बेतुके बंधनसे ज़कड रखा है? तोड दो इस बेमतलब बंधनको ... छोड दो इस घरोंदेको । ढूंढ लो अपने राजमहलको । निकल जाओ मेरी ज़िंदगीसे ।"
संजीवकी माँने संजीवकी यह आखरी बात सुनी, तो वह झटसे दरवाज़ा खोलकर अंदर आई और संजीवके मुँहपर एक चाँटा जमा दिया ।
सुनिता चिल्लाई, "अब तुम्हें यह भी तमीज़ नही कि दरवाज़ा खटखटाकर अंदर आओ? पती-पत्नी की बातोंको छुपछुपकर सुननेमे तुम्हें शर्म नहीं आती?"
संजीव गुस्सेमे आकर सुनितापर हाथ उठानेवाला ही था तो फिरसे उसकी माँ बोली, "संजीव, खबरदार जो तुमने बहूको छुआ भी । मुझसे बुरा कोई नही होगा । आखिर उसने जो कहा उसमे गलत ही क्या है? हर लडकी शादीसे पहले बहुतसे सपने देखती है । एक सपना सुनिताने भी देखा, तो उसमे उसकी क्या गलती है?"
सुनिता फिरसे चिल्ला उठी, "मेरे सामने यह नाटक करनेकी ज़रा भी ज़रूरत नही । अपने लडकेको किस तरहकी परवरिश दी है, देख चुकी हूँ मै । पल्लूसे बाँधकर रक्खो अपने लाडलेको ।"
सुनिताकी यह बात सुनकर संजीवकी माँ सिसकियाँ देते हुई कमरेसे बाहर चली गईं । चाहते हुए भी संजीव कुछ नही कर सका । अपने खिलाफ़ कोई भी आरोप सहनेकी वह क्षमता रखता था, लेकिन अपने माँकी बेइज़्ज़ती देखकर वह पूरी तरह टूट गया । देखतेदेखते उसके सारे अरमानोंकी बारात अर्थीमे बदल रही थी । जिस जीवनसाथीके ख्वाब उसने देखे थे वह यह नही थी । अपने पिताके हाथों अपने माँकी हालत तो वह देख चुका था, और अब अपनी पत्नीके हाथों अपनी माँका अपमान सहनेकी हिम्मत उसमे नही थी । वह कमरेसे बाहर निकलकर सडकपर आ गया । जिस प्यारकी उसे तलाश थी वह उसके नसीबमे नही था ।
जिस प्यारसे वह अपने बचपनमे महरूम रहा, वही प्यार वह अपनी औलादको देनेकी चाह रखता था । ऐसी औलाद, जो एक ऐसे रिश्तेकी निशानी हो जिसे उसने खुद चुना था । लेकिन यह कैसा रिश्ता उसके नसीबमे आया था? आखिर क्यों? वह जानता था कि किसी हदतक इन हालातके लिये वह भी ज़िम्मेदार था । लेकिन क्या पूरी तरह वही ज़िम्मेदार था? सोचसोचकर संजीवका सर चकराने लगा । उसकी आँखोंके सामने अँधेरासा छाने लगा । देखते ही देखते उसकी आँखें आँसूओंसे भर गयी ।
आँखोंसे बहती हुई धारामे उसके अतीतकी प्रतिमा धुँधलीसी हो गयी । उस हालतमे पता नही वह कितनी देर बैठा रहा । जब उसे होश आया तो प्रकाश उसके सामने खडा था ।
"चलो संजीव, तुम्हारी माँ राह देख रही होगी ।"
"चलो, प्रकाश । मेरी राह और कौन देखेगा?"
दोनों जब क्लबसे बाहर आये तो रातकी धुँधली चादर ओढे सारा शहर नींदमें डूबनेकी तैयारी कर रहा था । हलकेसे अपना हाथ संजीवके कँधेपर रखते हुए प्रकाशने कहा, " संजीव, एक बात कहूँ तो बुरा तो नहीं मानोगे? सुनिता कल फिर एक बार ऑफिस आनेवाली है ---"
"तो? प्रकाश, मेरे लिये तो वह कबकी मर चुकी है --- जिस बच्चेकी मुझे चाह थी, उसे पैदा करनेसे पहले ।"
"ऐसा मत कहॊ, संजीव । मुमकिन है कि अबतक तुम दोनोंने एक दूसरेको गलत समझा हो । अब छ: महीनोंकी दूरीके बाद हो सकता है कि तुम एक दूसरेको अच्छी तरह समझने लगो । तुम एक बार उससे मिल तो लो । हो सकता है कि जिस मंज़ीलकी तुम दोनोंको तलाश थी वह अपने सामने पाओ । आखिर इस समस्याका कुछ तो हल हो ।"
कुछ देर सोचनेके बाद संजीव बोला, " हाँ प्रकाश, मैं भी इस सबसे तंग आ चुका हूँ । चाहता हूँ कि इस समस्याका कुछ हल निकले -- इस पार या उस पार । मैं मिलूँगा सुनितासे ।"
दूसरे दिन ऑफिसके बाद संजीव और सुनिता चौपाटीकी रेतमे बैठकर बातें कर रहे थे । संजीवके साथ प्रकाश और सुनिताके साथ उसकी सहेली रंजिता थी । आईसक्रीम खतम होतेही आसमान की तरफ़ देखकर सुनिताने सवाल किया, "संजीव, आखिर क्या सोचा है तुमने मेरी ज़िंदगीके बारेमे?"
"सुनिता, मैं चाहता हूँ कि तुम यही सवाल मुझसे आँख मिलाकर पूछॊ । सच बात तो यह है कि तुमने सवाल ही गलत किया है ।"
"क्या मतलब है तुम्हारा, संजीव?"
"सुनिता, अगर मैने तुम्हे जानेके लिये कहा था तो उसकी वजह थी ।"
"तुम्हारा मतलब है कि मैं बिना वजह चली गई थी?"
"वजह थी, समझ सकता हूँ मै । मैने तुमसे जानेके लिये सिर्फ़ एक बार कहा था, जब तुमने मेरी माँका अपमान किया था । जब वह तुम्हारी तरफ़दारी करते हुए मुझसे लड पडी थी । और तुम बार बार घर छोडकर जाती रही । कोई खास वजह?"
संजीवकी इस बातको सुनकर अचानक रंजिताकी झुकी हुई गर्दन उपर उठ गई । "सुनिता, तुमने यह बात तो कभी मुझे बताई नहीं । जवाब दो ..."
"रंजिता, सुनिता जवाब नही दे पायेगी, क्योंकि उसके पास इस बातका कोई जवाब नही है । सच बात तो यह है कि उसने शादीको हमेशा एक गुड्डागुड्डीका खेल समझा है । एक ऐसा खेल जो एक मर्द और औरत एक दूसरेके शरीरसे खेलते हैं । जिसमे और किसी भी बातकी गुँजाईश नही होती ।"
सुनिता चिल्ला उठी, "मैने कभी ऐसा तो नही कहा था ।"
"कहा था, सुनिता, ऐसाही कहा था । सिर्फ़ अपनी ज़बानसे नही, बल्कि अपने व्यवहारसे भी । यही वजह थी कि तुम यह खेल बारबार मेरी ज़िंदगीसे खेलती रही । और जब मैं तुम्हारे खेलमे हर बार तुम्हारा साथ नही दे सका, तो तुम बारबार घर छोडकर जाती रही । जबजब तुम्हे मेरे नामकी ज़रूरत महसूस हुई तबतब तुम मेरी ज़िंदगीमे वापस आती रही । जिस तरह बिल्ली चूहेके साथ ज़िंदगी और मौतका खेल खेलती रहती है ठीक उसी तरह तुम मेरी ज़िंदगीसे खेलती रही ... मेरी भावनाओंसे खेलती रही । शादीका मतलब तुम्हारे लिये सिर्फ़ एक खेल था ।"
"संजीव, झूठी तोहमत लगा रहे हो तुम मुझपर ।"
"सुनिता, सच बहुत कडवा होता है । तुम्हारी नज़रोंमे शादी सिर्फ़ एक लायसन्स है जो समाज बक्शता है ’सेक्स’का खेल खेलनेके लिये । तुमने हमेशा चाहा कि दो शरीर एक साथ लिपटे रहें, चाहे उनके दिल मिलें न मिलें । जहाँ दो शरीरोंके साथ साथ दो दिलोंका मिलन ना हो सके, ऐसे बंधनको शादीका नाम देनेके लिये मैं हरगिज़ तैयार नहीं हूँ । न ही ऐसे बंधनको मैं कभी मानता हूँ । हमारी मंज़िलें जुदा थी और हमारा अलग होना लाज़मी था ।"
"इसका मतलब है कि तुम मुझे वापस नही लोगे?"
"ज़िंदगीमे पहली बार तुमने मुझे ठीक समझा है, सुनिता । बधाई हो ।"
"संजीव, मै तुमसे साफ़साफ़ कह रही हूँ, तुम अगर मुझे स्वीकार नही करोगे तो मैं यहीं कूदकर ..."
"... तुम अपनी जान कभी नही दे सकती, सुनिता । तुम्हे अपने शरीरसे हदसे ज़्यादा प्यार है । मुझ जैसे आदमीके लिये तुम अपनी कीमती जान कभी नही गँवाना चाहोगी । अगर ऐसा होता तो छ: महीने मुझसे दूर रहकर तुम कभी ज़िंदा रह नही सकती थी । जब मुझे तुम्हारे सच्चे प्यारकी ज़रूरत थी, तब तुम मुझसे दूर रही । मैं समझ नही पा रहा हूँ कि आज तुम्हारी क्या मज़बूरी है जिसके लिये तुम मेरी ज़िंदगीमे वापस आना चाहती हो । आज के समाजमे जीनेके लिये किसीको किसीके नामकी ज़रूरत नही होती । ना मर्दको, और ना ही एक औरतको । सुनिता, मेरी शुभकामनाएं तुम्हारे साथ थीं और हमेशा रहेंगी । तुम अपनी नई दुनिया बसा लॊ, और मै अपनी नई दुनिया बसानेके लिये किसी ऐसे साथी की तलाशमे रहूँगा जो मुझे मेरी कमज़ोरियोंके साथ स्वीकार करे । "
संजीवकी यह बात सुनकर सुनिता हैरान रह गई । "आखिर तुम चाहते क्या हो, संजीव?"
"सुनिता, मै चाहता हूँ कि इस समाजके ठेकेदारोंको कुछ बता सकूँ । जब पति-पत्नीकी आपसमे बनती ना हो, तब ज़रूरी नही कि समाजके डरसे वे एक छतके नीचे अजनबी बनकर रहें । इससे अच्छा तो यह है कि वे एक दूसरेसे अलग हो जायें । जिस तरह मै शादीके लायसन्सको, याने Marriage Certificate को नही मानता, ठीक उसी तरह मै उस कागज़के टुकडेको भी नही मानता जिसे समाजके ठेकेदार तलाक या divorce कहते हैं ।"
"तो तुम दूसरी शादी करना चाहते हो?"
"सुनिता, हमेशाकी तरह अबभी तुमने मुझे गलत समझा । क्या ज़रूरी है कि हर तलाशकी मंज़िल शादी हो? याद है, कभी मैने तुमसे कहा था, प्यार एक झरना है जो कईं रूप लेकर बहना चाहता है । इसी प्यारका एक नया रिश्ता जोड लूँगा मै । बताना चाहता हूँ समाजके ठेकेदारोंको कि वही रिश्ता सबसे बडा होता है जो इन्सान अपनी मर्ज़ीसे जोड सके । चाहे वह रिश्ता पति-पत्नीका हो, दोस्त-दोस्तका हो; बाप-बेटेका हो । कभी कोई ऐसा साथी मिले जो मुझे पूरी तरह समझकर अपना सके, तो शादी ज़रूर कर लूँगा । अगर समाज इजाज़त दे तो किसी अनाथ बच्चेको गोद लेकर उसकी परवरिश करूँगा । उसे अपना नाम दूँगा, अपना प्यार दूँगा, जिससे प्यारका यह झरना हमेशा बहता ही रहेगा ।"
बोलते बोलते संजीव सबको पीछे छोडकर डूबते हुए उस ढलते हुए सूरजकी तरफ़ बढता गया जो कभी उसकी ज़िंदगीमे एक नया उजाला ले आये । सुनिता और बाकी सब उसकी तरह देखते रहे । उन्हें पता चल गया कि यह दूरी अब कभी कम नही होनेवाली ।
लक्ष्मीनारायण हटंगडी
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"अपने आपको पता नही क्या समझता है?"
"बडा snobbish है ।"
"कभी मुस्कराता भी नहीं ।"
"बडा छुपा रुस्तम है । सिर्फ़ अपने आपको भोला बताता है ।"
"क्या दुनियामे कभी किसीकी बीवी कभी मरी ही नहीं?"
यह आखरी बात शायद संजीवने सुन ली । उसने धीरेसे अपनी फ़ाइल बंद की और उस लडकीकी ओर देखा जिसने यह बात कही थी । अब सब चुपचाप हो गईं । संजीवकी आँखॊंमे एक गहरीसी उदासी छाई हुई थी । जबभी उसकी बीवीका ज़िक्र आता, वह पहलेसे ज़्यादा गंभीर हो जाता था, जैसे उसके नीजी दर्दको किसीने ज़बरदस्ती बाज़ारमे बिछा दिया हो । वह सब कुछ भूल जाना चाहता था, लेकिन ज़माना उसे अकेला छोडना नही चाहता । वह आतेजाते हमेशा इन लडकियोंके ताने सुनता था । उसने फिरसे अपना काम शुरू किया । फिर एक बार लडकियोंकी झुकी हुई गर्दनें ऊपर उठ गईं ।
"बेचारा..."
"अरी, उसे बच्चोंसे बहुत प्यार था ।"
"शायद इसीलिये ईश्वरने उससे उसकी बीवी और बच्चा दोनोंको छीन लिया ।"
"क्या तुमने कभी उसे यहाँ देखा है?"
"किसे?"
"अरे पगली, संजीवकी पत्नीको । मैने तो उसे कभी यहाँ नही देखा ।"
"डेढ सालमे ही अपनी बीवी-बच्चेको खा गया ।"
"श्श.. बॉस आ रहे हैं। चुप बैठो ।"
"Good morning -- one minute please. मिस्टर संजीव सेन, कॉल फ़ॉर यू ।"
संजीवने फोन उठाया -- "संजीव बोल रहा हूँ ।"
"मैं सुनिता ।"
"देखो, मैने तुमसे पहले भी कहा है, मैं तुमसे बात नही करना चाहता । आईंदा दोबारा मुझे फोन मत करना ।" बोलतेबोलते संजीवकी आवाज़ ऊँची हो गई और सब लोग अजीबसे चेहरे किये उसकी ओर देखने लगे । वह पसीनेसे लथपथ हो रहा था । लडखडाते कदमोंसे वह अपने टेबलके पास आ गया । उसकी यह हालत देखकर प्रकाश उसके पास आया । प्रकाशका हाथ कँधेपर पडतेही चौंककर संजीवने पीछे देखा और मुस्करानेकी नाकाम कोशिश की ।
"क्या हुआ, संजीव?"
"प्रकाश, सुनिताका फोन था ।"
"तुम्हारी यह हालत देखकर मैं समझ गया था । आखिर वह चाहती क्या है?"
"मैं नहीं जानता," संजीवने अपना पसीना पोंछते हुए जवाब दिया ।
"शायद मैं जानता हूँ । कल मेरे नाम भी उसका फोन आया था ।"
"क्या कह रही थी वह?"
"वह तुमसे अपनी ज़िंदगीके बारेमे बात करना चाहती है ---"
थोडी देरके लिये प्रकाश सोचता रहा । फिर उसने कहा, "संजीव, तुमने बडी गलती की । क्यों सबकॊ बोलते रहे कि तुम्हारी बीवी बच्च्चेको जन्म देकर मर गई?"
"तुमही बताओ, प्रकाश, और क्या करता मैं?"
"और कुछ भी कह देते । लेकिन उसके मर जानेकी यह बात? ओफ, अगर किसीको शक हो गया तो?"
"किसीको शक नहीं होगा ।"
"संजीव, मैं समझता हूँ कि फिर भी तुमने ठीक नही किया ।"
"प्रकाश, क्या ठीक है और क्या गलत इसका फैसला कौन करेगा? और वह जो मेरे जीवनसे खेल रही थी, क्या वह ठीक था?"
संजीवकी आँखोमें आँसूं भर आये । "क्या था मैं, और क्या बन गया हूँ आज?", संजीव उदास मनसे सोच रहा था । उसकी ज़िंदगी एक ऐसा सवाल बनकर उसके सामने खडी थी, जिसका उसके पास कोई जवाब नहीं था । जिन आँखॊंमे हमेशा एक ज़िंदा मुस्कराहट झलकती थी, उन्हीं आँखोंमे आज अक्सर एक अनकहा दर्द भरा रहता था । जिस पत्नीसे कभी उसने बहुत प्यार करना चाहा था, उसके मौतकी खबर सबको देते हुए उसके दिलपर भारी बोझसा रहता था । लेकिन वह मजबूर था । जो औरत उसके जीवनसे अचानक गायब हो गई उसके बारेमे वह और कहता भी क्या? और किस किससे? जबभी उसके बीवीकी बात छिडती तो वह दर्दभरी आवाज़मे कह देता, "मेरी बीवी मेरे बच्चेको जन्म देते वक्त मौतका शिकार हो गई । दोनों नही बचे ।"
यह बात सुनकर लोग दंग रह जाते थे । इस दुर्भाग्यपर संजीवसे सब हमदर्दी जताकर चल देते थे । कभी किसीको कोई शक नही होता । संजीव यह बात इतनी गंभीरतासे कहता कि कईं बार उसे अपने आपको इस बातपर विश्वास होने लगता । अपने इस अनूठे दु:खका हर पल जीनेकी वह क्षमता रखता था । अपने इस नये जीवनकी उसे आदत सी हो गई थी, जब सुनिताके फोनने उसे बेचैन कर दिया । आखिर यह औरत उससे चाहती क्या थी?
उस शामको संजीव घर जानेके बजाय क्लबमे पहुँचा । जातेही उसके सब दोस्तोंने उसे घेर लिया । आज संजीव बहुत समयके बाद क्लबमे आया था । सब उससे हमदर्दी जता रहे थे । संजीवके बीवी की मौतकी खबर कहींसे उनके कानोंपर पडी थी । सब उसे घेरे हुए थे । इतनेमे जॉनीकी आवाज़ सुनाई दी, "धत साले, झूठा कहींका ।" संजीवने मुडकर देखा, नशेमे धुत जॉनी उसीकी ओर आ रहा था ।
"अबे साले, तूने मुझसे झूठ बोला । मुझसे दगाबाज़ी किया । लायर ..."
संजीव कुछ समझ नही पाया । सब जॉनीका मज़ाक उडाने लगे । जॉनी ने सबको दूर हटाकर संजीवकी पीठपर हाथ मारा ।
"साले, तू बडा दगाबाज़ है ।"
"जॉनी, आखिर हुआ क्या? ज़रा बताओ भी ।"
"तू तो कह रहा था कि तेरी बीवी दो महीने पहले मर गई ..." जॉनी और कुछ कहनेवाला ही था कि संजीवने झटसे उसका मुँह बंद किया और खींचकर उसे एक कोनेमे ले गया । संजीव पीता नही था लेकिन उसने सुना ज़रूर था कि शराबके नशेमे लोग बहुत सारा सच उगल जाते हैं । वह हाथ जोडकर बोला, "जॉनी, उसका ज़िक्र यहां मत करो, प्लीज़ ।"
जॉनीने झटसे संजीवका हाथ हटा दिया और वह चिल्ला उठा, "क्यों ना करूं? साला, तू लायर है । दोस्तोंसे भी झूठ बोलता है और फिर उनको चुप रहनेको बोलता है ... हाथ जोडनेका नाटक करता है । साला, तू तो कह रहा था कि तेरी वाइफ़ और बच्चेको मरे हुए दो महीने हो रहे हैं ..."
संजीव अपना सर पकडे एक कोनेमे बैठ गया । पता नही जॉनी और क्या क्या बक देता? एक शराबीका मुँह भला कौन बंद कर सकता है? संजीवको चुपचाप बैठा देखकर उसका एक दोस्त उसके पास आया और अपना हाथ उसके कंधेपर रखकर बोला, "संजीव, तू जॉनीकी फ़िक्र मत कर -- उसको आज कुछ ज़्यादा चढ गई है । मैं जानता हूँ, तुम्हे तुम्हारे अपनोंकी याद सता रही है । लेकिन यह शराबी ..."
वहाँ वह शराबी ज़ोरज़ोरसे बोले जा रहा था, "साला झूठ बोलता है दोस्तोंसे । कहता है कि बीवी मर गई । एकदम नॉनसेन्स बोलता है । परसो शामको मै उसको स्टुडिओमे देखा, साला हीरोईनका मेक-अप कर रहा था । " जॉनीकी यह बात सुनकर सब ठहाका मारकर हँसने लगे । "जॉनीको बहुत ज़्यादा चढ गई है -- उसे मरे हुए लोग भी दिखाई देते हैं । पगला कहींका !"
लेकिन संजीव उस शराबी पागलकी बातोंसे डरा हुआ एक कोनेमे बैठा हुआ था । उसके चेहरेका रंग ऐसे उड गया जैसे उसने अभी अभी किसी भूतको देखा हो । वह चुपचाप सामने घूर रहा था ... अपने अतीतकी ओर ।
* * * * *
वह सामने घूर रहा था, अपने भविष्यकी ओर । उसकी नन्ही आँखोमे टूटे हुए सपनोंका रंग बिखरा हुआ था । एक कोनेमे बैठी उसकी माँ रो रही थी । वह सोच रहा था, आखिर लोग शादी क्यों करते हैं? क्या शादीका मतलब यही है? जब भी वह अपनी माँके साथ किसी शादीमे जाता, वहाँकी भीड और हँगामा देखता तो उसकी भोलीभाली आँखोके सामने एक शैतान आ जाता, जो दिनरात अपनी बीवीपर चिल्लाता रहता । बिना वजह उस गरीबको पीटता । नन्हे संजीवने बस शादीका यही रूप देखा था । वह बडी देरतक सोचता रहता, लेकिन उसे कोई जवाब नही मिलता ।
"माँ, बाबा तुमसे प्यार नही करते?"
कोई जवाब नही ।
"माँ, बाबा तुम्हे कहाँ मिले?"
"हमारे गाँवमे -- उन्होंने मुझे देखा और पसंद किया ।"
"और मैं तुम्हें कहाँ मिला?"
"तुम मुझे मिले नही... मैने तुम्हे जन्म दिया । नौ महीने यहाँ अपने पेटमे रखने के बाद ।"
"माँ, मैं इतना बडा, तुम्हारे इतने छोटेसे पेटमे कैसे समाया? और जन्म देना क्या होता है?"
संजीवके सवाल कभी खत्म नही होते थे । वह पूछता रहता ।
"माँ, यह घर, यह सामान हमें कहाँसे मिला? क्या बाबा इसे साथ लाये? यहाँसे हम कहाँ जायेंगे? क्या ये सब चीज़ें हम अपने साथ ले जायेंगे?"
"संजीव, बस भी करो. मै तंग आ गई हूँ तुम्हारे इन सवालोंसे ।"
थोडी देर चुप रहनेके बाद उसके सवालोंका सिलसिला फिर शुरू होता । जब अपनी माँसे डाँट मिलती तो अपने अनगिनत सवाल वह अपनी बहनसे करने लगता ।
"दीदी, बाबा माँसे प्यार नही करते?"
"तुमसे किसने कहा? करते हैं ।"
"तो फिर वह मम्मीको डाँटते क्यों रहते हैं? मारते क्यों है उसे? और अगर वह माँ से प्यार नही करते, तो फिर उन्होंने माँ से शादी क्यों की? शादीके बाद मारनेका हक मिलता है का? मैं कभी शादी नहीं करूँगा । तू करेगी शादी?"
अंजना अब युवावस्था की ओर कदम बढा रही थी । वह शर्मसे चूरचूर हुई । उसने संजीवको एक हलकीसी चपत मारी और कहा, "सुन, तू अभी बहुत छोटा है । ये बातें अभी तेरी समझमे नही आयेगी ।" संजीवके बहुत ज़िद करनेपर वह आगे बोली,
"पगले, शादी एक ही ऐसा रिश्ता है जो सबसे बडा होता है । बाकी रिश्तोंपर हमारा कोई ज़ोर नही होता क्योंकि हम उन्हे चुनते नही । वे रिश्ते बस हमसे जुड जाते हैं । मम्मी और पापा की शादीके बाद ही तो तुम पैदा हुए । और मम्मी तुमसे प्यार करने लगी । शादी हम उसीसे करते हैं जिसे हम जानते हैं, चाहते हैं और प्यार करते हैं ।" संजीवकी समझमे कुछ नही आया -- अपनी दीदीकी बातें सुनते सुनते वह सो गया ।
दिन बीतते गये । संजीवकी माँ अक्सर दुखी रहती थी । और पता नही क्यों, संजीवके दिलमे भी एक अजीबसा डर छिप गया था । वह कभी खुलकर बात नही करता, कभी मुस्कराता नहीं । उस घरकी कैदमे आज़ाद दिलसे कुछ भी तो नही कर पाता वह ! उसे वहाँ घुटनसी महसूस होती थी, फिर भी वह जी रहा था । और क्यों नही? उसकी प्यारी माँ भी तो वहीं जी रही थी ... एक ऐसे इन्सान के साथ जो उससे कतई प्यार नही करता था । एक ऐसे इन्सानके साथ, जिससे उसका सिर्फ़ शादीका रिश्ता था । यह संबंध तोडे क्यों नही जा सकते? जिस समाजके डरसे यह शादीका रिश्ता, आपसमे प्यार न होते हुए भी, निभाया जा रहा था, वह समाज आखिर चीज़ क्या थी?
कईं बार संजीव गुस्सेमे आकर अपनी माँ से कहता, "चलो माँ, हम यहांसे कहीं दूर चले जाते हैं । तोड ही दो यह रिश्ता । हम कोई नया घर बसायेंगे ।" लेकिन शायद उसकी माँ उस भयानक समाजसे डरती थी... शायद उसे अपने छोटे बच्चोंकी फिक्र थी ... या फिर हो सकता है कि ना चाहते हुए भी वह यह रिश्ता बनाए हुई थी । इस तमाशेसे तंग आकर कई बार संजीव अपने आपसे कहता, "मैं ऐसी शादी कभी नहीं करूंगा । जिस शख्स से मेरी ज़रा भी न बनती हो, उससे मैं निभाऊंगा कैसे? क्या शादी समाजके ठेकेदारोंकी दी हुई ऐसी ज़ंजीर है जो कभी टूट ही नहीं सकती? आखिर क्या मतलब है ऐसी शादीका? जो रिश्ता इन्सान खुद चुनता है क्या वह इतना घिनौना हो सकता है?"
इन्हीं सवालोंके जवाब तलाश करते हुए संजीव बडा होता गया । जो आज़ादी उसे अपने घरकी चार दीवारोंमे न मिल सकी थी, उसे वह घरके बाहर पानेकी कोशिश करता रहता । उसके जैसे दो अलग-अलग रूप थे । अपने घरमे वह प्यारसे महरूम, मायूस रहता तो घरसे बाहर हमेशा मुस्कराता रहता । वह जहाँ भी जाता, खुशी छा जाती । घरके सभी रिश्तोंमे वह विश्वास खो चुका था । अपना खोया हुआ बचपन वह खुले आसमान की छाँव तले ढूँढता । वह रोज़ नये रिश्ते ढूँढता रहता । जो रिश्ता इन्सान खुद अपनी मर्ज़ीसे जोड सके ऐसे दोस्तीके रिश्तेको वह सबसे अहम मानता । उसकी नज़रोंमे बाकी सभी रिश्ते बेमतलब और बेमानी थे । वह अक्सर घरसे बाहर रहता । जो प्यार उसे अपने घरमे नसीब न हुआ, वही प्यार उसे घरके बाहर बिना किसी शर्तॊंके मिलता । संजीवको हमेशा ऐसे साथियोंकी तलाश रहती जो बिना कोई सवाल पूछे उसे पूरी तरह स्वीकार करते ।
कईं बार वह महसूस करता कि उसके तलाशकी कोई मंज़ील ही ना हो । कईं बार भीडमे होकर भी वह अपने आपको अकेला महसूस करता । जैसे सारी दुनिया उसके साथ हो, लेकिन उसका अपना कोई ना हो ।फिर नये रिश्ते जुडते रहते । हर बार उसे लगता कि हर नये रिश्तेसे दिलका खाली कोना भर जायेगा । नये रिश्ते पुराने हो जाते, दिलका खाली कोना और भी ज़्यादा गहरा होता जाता । रह जाता एक नया दर्द । जब भी यह दर्द उसे सताता, तो संजीव सागर किनारे जा बैठता । सागरकी उठती-मचलती लहरोंमे उसे जीवनका संगीत सुनाई देता । कई बार वह चाहता कि अपने आपको सागरके हवाले कर दे और जीवन-संगीतका असली मतलब ढूँढ ले । लेकिन जितना वह ज़िंदगीसे उकता गया था, उतना ही मौतसे डरता था । जब भी वह मौतके बारेमे सोचता तो उसे वह अजीबसा सपना याद आता जो उसे अक्सर रातोंको जगा देता था । वह देखता कि अपनीही लाश उठानेके लिये चौथे आदमीकी तलाशमे वह यहाँवहाँ घूम रहा है ।
क्या सचमुच वह इतना अकेला था कि उसे अपनी लाश उठानेके लिये भी कोई न मिलता हो? वह चाहता कि किसीके लिये वह कुछ करे जिससे वह अपने आपको भूल जाये । उसे महसूस हुआ कि सभी लोग उसकी तरह नहीं थे । उसने महसूस किया कि सिर्फ बच्चे ही दोस्तीमे सब कुछ भूल जानेकी क्षमता रखते हैं ... बिना किसी मतलबके खुलकर हँसते-मुस्कराते । हँसीका खज़ाना पूरी तरह कोई लूटा सकता हो तो वे सिर्फ बच्चे ही थे । क्यों न हम बडे लोग इन बच्चोंकी तरह हमेशा हँसते रहे? मासूम बच्चोंको दुनिया भुलाकर हँसते-खेलते देख वह अपने सारे गम भूल जाता । उनके खिलते हुए बचपनमे वह अपने खोये हुए बचपनकी तलाश करता । कईं बार लोग "चाचा नेहरू" कहकर उसका मज़ाक उडाया करते । लेकिन उसने कभी इस बातकी परवाह न की ।
इस बीच उसकी बहन अंजनाकी शादी तय हुई । बाज़ारमे रक्खे गये बिकाऊ चीज़ोंकी तरह नुमाईश करानेके बाद किसी अन्जान शहरके एक अन्जान आदमीके साथ अंजनाका ब्याह तय हो गया । उसके पिताके अज़ीब स्वभावके कारण कईं बार अंजनाकी शादी होते होते टूट जाती थी । "जिस आदमीको मैं जानती हूँ, जिसे मैं प्यार करती हूँ, उसीसे शादी करूँगी" इस बातको बारबार दोहरानेवाली अंजना एक बिलकुल अजनबी के साथ शादीके बंधनोंमे बंध गयी । संजीवके बसमे होता तो वह कभी अपनी प्यारी बहनको उस अन्जान आदमीके साथ जाने न देता ।
शादीके सिर्फ एक साल बाद अंजना अपने घर वापस लौट आई । उसके सपनोंका महल चूरचूर हो गया । किसी कारण उसे पता चला कि उन दोनोंका निबाह होना मुमकीन नही था । जो कदम उठानेकी हिम्मत उसकी माँ मे नही थी, वह हिम्मत अंजनाने दिखाई । शादीका रिश्ता ठुकराकर वह वापस तो आ गई, लेकिन समाजके ठेकेदारोंके ताने सुनसुनकर वह मनही मनमे सहमा गई थी । जिस उम्रमे अंजनाका घर बसना चाहिये था उस उम्रमे उसका उजडा हुआ आशियाना देखकर संजीवका दिलभी टूट गया । अबतक वह शादीके कईं घिनौने रूप देख चुका था ।
एक तरफ़ वह शादीके नामसे भी नफ़रत करता, तो दूसरी तरफ़ दिल ही दिल में चाहता था कि जिस प्यारका अनुभव वह अपने पिताके हाथों खुद नही कर पाया था, वही प्यार वह अपनी औलादको दे । और इसके लिये उसे शादी तो करनी ही पडती ना? उसे यकीन था कि उसे कोई ऐसा साथी ज़रूर मिलेगा जो बिना किसी शर्तके उसे अपना लेता ।फिर चाहे वह साथी अच्छाबुरा जैसा भी हो, उसे वह स्वीकारेगा । आखिर इसीको तो प्यार कहते होंगे ना?
संजीव समझ गया था कि हर इन्सान किसी न किसी तरह अधूरा होता है । वह अपनी पत्नीको, फिर चाहे वह जैसी भी हो, -- उसकी अच्छाईयों और बुराईयोंके साथ स्वीकार करेगा । वैसेभी पूर्ण इन्सानकी तलाश कभी पूरी ही नही होती । उसे चाहिये कि वह हर हालमे मुस्कराता रहे । मुस्कराकर अपने अंदरका दर्द छुपाकर दुसरोंको खुशी दे । खुद दु:ख सहकर भी दूसरोंको खुश रखनेमे संजीव अजीबसी खुशी महसूस करता । उसके चेहरेकी खुशी उसकी सबसे कीमती दौलत थी ।
"जोकर आया, जोकर आया ।", चिल्लाकर सभी बच्चे संजीवकी ओर दौडे । जोकर भी अपनी टेढी चाल चलते हुए उन बच्चोंकी ओर दौडा । दौडते-दौडते वह पैर फिसलकर गिरा तो सब बच्चे उसके इर्दगिर्द जमा हो गये । जोकर रोने लगा तो बच्चे ज़ोरज़ोरसे हँसने लगे । बच्चोंको हँसते देखकर जोकर भी हँसने लगा । बच्चोंने मिलकर उसे उठा लिया और वे सब आनंदबज़ारमे घूमने लगे । कोई उसकी टोपी खींचता, कोई उसकी पीठपर मारता, तो कोई उसे पत्थर मारता -- फिर भी जोकर हँसता रहता, सबसे हाथ मिलाता, सबको गले लगाता ।
यहींपर सुनिताने पहली बार संजीवको देखा । वह अपनी सहेली मायाके साथ वहां आई थी । संजीवको हँसतेखेलते देख उसने मायासे पूछा, "कौन है वह जोकर?"
"हूँ... लगता है जोकर तेरा दिल ले गया ! अरी, तू तो बंदरिया दिखती है । अब इस जोकरको लेकर एक सर्कस शुरू कर दे । अच्छा खेल जमेगा" ।
मायाकी यह सीधी बात सुनिताको शूलकी तरह चुभी । मायाने शायद मज़ाकमे यह बात की हो, लेकिन सुनिता अपने आपपर हँस भी नही सकती थी । अपने काले रंगका ज़िक्र सुनकर वह कुछ देरके लिये चुप रह गई । मायाने फिर उसे छेडते हुए कहा, "ए बंदरिया, मै उस जोकरको बहुत अच्छी तरह जानती हूँ । कहो तो, ’इण्ट्रो’ दूँ?" फिरसे सुनिताके चेहरेपर हँसी छा गई । भीड निकल चुकी तो माया सुनिताको संजीवके पास ले गई "इण्ट्रो" देनेके लिये । अबतक संजीवने मुँह धो लिया था । जोकरके रंगीन चेहरेके पीछे छिपा हुआ उसका असली चेहरा सुनिताको पहली नज़रमे भा गया । उसने संजीवसे बातें करनेकी कोशिश की, लेकिन वह चुप था ।अपनी मीठी ज़बानसे सब बच्चोंका दिल जीतनेवाला संजीव बडोंसे बातें करनेमे झिझकता था । और फिर एक लडकीसे?
जब वह कॉलेजमे पढ रहा था तब भी उसे एक लडकीसे प्यार हुआ था ।उसने बहुत चाहा कि धीरज बँधाकर वह अपना प्यार जताये । लेकिन लडकी अमीर थी और उसे डर था कि कहीं वह इस रिश्तेसे इन्कार न कर दे । उसने हिम्मत ही नही की और सब कुछ शुरू होनेसे पहलेही खत्म हो गया । अब तो उसे यह भी पता नही था कि वह कॉलेजेवाली लडकी कहाँ और किस हालमे होगी । और यहाँ यह लडकी है जो मुझसे बात करना चाहती है... जानपहचान बढाना चाहती है ! संजीव मन ही मन खुश हुआ कि कोई उसे चाहने लगा था । इस अहसाससे संजीव खुश था किसीने उसे चुन लिया था । क्या इसीको प्यार कहते है ? क्या बाबाने माँ को इसी तरह देखकर चुन लिया था?
उसने झुकी हुई नज़रोंसे सुनिताको देखा । उस लडकीमे कोई भी बात ऐसी नही थी कि जो किसीका मन मोह ले । उसे अपनी बडी बहनका ख्याल आया । शायद इसे भी किसी कारण रिश्ता जोडनेमे दिक्कत होती होगी, जैसे अंजनाको हुआ करती थी । कितनोंने इसके बाहरी रूपको देखकर इससे शादी करनेसे इन्कार किया होगा । अगर मैं भी ऐसा करूं, तो उन लडकोंमे और मुझमे फर्क क्या रहा? मैं तो औरों जैसा नही हूँ, फिर ये कैसी बातें सोच रहा हूँ? अंजनाका जन्म एक ऐसा इत्तेफ़ाक था जिसपर उसका कोई बस नही था, फिर भी लोग उसे ठुकराते आये थे क्योंकि वह एक ऐसे आदमीकी बेटी थी जो दुनियाकी नज़रोंमे बुरा था । तो क्या सुनिताके साथ भी वैसाही होगा जैसा अंजनाके साथ हुआ था? इसेभी दुल्होंके बाज़ारमे एक बिकाऊ चीज़की तरह नुमाईशपर रक्खा जायेगा? इसेभी लोग देखने आयेंगे और ठुकराएंगे, सिर्फ इसलिये कि वह खूबसूरत नही थी? लेकिन अपने खूबसूरत या बदसूरत होनेपर किसका बस होता है? वह खुद तो ज़िम्मेदार नही थी इस बातके लिये? संजीवने सोचा, जब मै शादी करूँगा तो ऐसी छोटीछोटी बातोंपर बिलकुल ध्यान नहीं दूँगा ।
कुछ दिनॊं बाद सुनिताके घरवाले उसका रिश्ता लेकर संजीवके घर आये तो कुछ देरके लिये वह सोचमे पड गया । सारे जीवनभरका सवाल इतनी जल्दी सिर्फ हाँ या ना मे देना इतना आसान तो नही था । वह ना सुंदर थी ना ही ज़्यादा पढीलिखी । वे एक दूसरेको ठीकसे जानते भी नही थे । संजीवके सोचनेका ढंग बिलकुल अनूठा था । क्या यह लडकी उसे समझ पायेगी? क्या संजीव उसे प्यार कर पायेगा? दूसरे पल वह सोचता, आखिर प्यार किस चिडियाका नाम है? बस वह एक भावना ही तो है । पति-पत्नी एक साथ रहेंगे, एक दूसरेको समझने लगेंगे, जान जायेंगे, तो फिर प्यार अपने आप हो ही जायेगा । क्यों न मैं इस लडकीको "हाँ" कह दूँ, जिसने मुझे चुन लिया है । रिश्तेकी बात छेडने आये हैं तो उन्होंने पूछताछ तो की ही होगी । जब इसने मेरेलिये "हाँ" कह दी है तो "ना" कहनेवाला मैं कौन होता हूँ? संजीवने झटसे रिश्ता कबूल किया ।
जल्दही सुनिताके घरवाले सगाईकी तारीख तय करनेके लिये संजीवके घर आये । पता चला कि सुनिताके पिता संजीवके पिताजीके दोस्त थे । संजीवके सगाईकी बात जल्दही सब जगह फैल गयी । सगाईके दिन अंजनाकी एक सहेली वहाँ मौजूद थी । उसने धीरेसे अंजनाके कानोंमे कुछ कहा । अंजनाने संजीवको अपने पास बुलाकर उससे पूछा, " संजीव, ज़रा यहाँ तो आओ ।"
"क्या बात है, दीदी?" संजीवने पूछा ।
"सुना है, लडकी शराब पीती है, सिगरेट पीती है ।"
"मैं जानता हूँ, दीदी ।", संजीवने कहा । "और मैंने उससे यह भी कह दिया है कि सिर्फ़ समाजके डरसे उसे अपनी ये आदतें छोडनेकी ज़रूरत नही । जब उसे अहसास हो कि ये आदतें उसके लिये ठीक नहीं, तो वह अपने आप उन्हे त्याग दे । जैसे मैं नही चाहता कि मुझपर किसी तरहका दबाव न डाला जाये, ठीक उसी तरह पतीके नाते मैं भी उसपर कोई दबाव नही डालना चाहता ।"
"संजीव, शायद तुम समझते हो कि तुम्हारे आदर्श बहुत ऊँचे हैं । लेकिन वक्त आयेगा जब तुम पछताओगे ।" इतना कहकर अंजनाने मुँह फेर लिया ।
संजीव अपने आपसे मुस्कराने लगा । उसने मनही मन कहा, "शायद मुझे कोई समझ नहीं पाता । क्या हमेशा यही होता रहेगा?"
संजीव और सुनिताकी सगाई हो गई । संजीवकी बस एकही शर्त थी कि सगाई और शादी के बीच कमसे कम छ: महीनोंका अंतर हो, जिससे दोनोंको एक दूसरेको समझनेका वक्त मिले । अपने माता-पिता के अनुभव के बाद वह ज़रूरी समझता था कि पति-पत्नी एक दूसरोंकी अच्छी-बुरी आदतोंको जान ले, उन्हें स्वीकार करनेकी क्षमता रक्खें । वह नही चाहता था कि उसकी शादीका वही अंजाम हो जो उसके अपने माता-पिताकी शादीका हुआ था । जिसे समाज सुनिताकी कमज़ोरियाँ कहता था संजीव उन्हॆं जानता था, और वह यह चाहता था कि सुनिता भी उसकी सभी कमज़ोरियोंको समझ ले ताकि उसे शादीके बाद कोई शिकायत ना हो ।
संजीव सारी दुनियाको अपना समझता था । कभी इसके लिये, कभी उसके लिये, तो कभी और किसीके लिये कुछ न कुछ करनेमे उसे खुशी महसूस होती थी । और इन कामोंसे जब कभी उसे फुरसत मिलती तो वह सुनितासे मिलने जाता । कभी वह उससे मिलने आती । एक बार उसके शिकायत करनेपर संजीवने सुनिताको समझानेकी कोशिश की । "देखो सुनिता, मेरी ज़िंदगी कई हिस्सोंमे बँटी हुई है । जो वक्त मैं तुम्हें नहीं दे पाता, उसके बारेमे शिकायत करनेके बजाय मैं जो वक्त तुम्हारे साथ गुज़ारता हूं उसे एन्जॉय करो । शिकायत करनेसे कुछ हासिल नहीं होगा । उल्टा हो सकता है कि मैं तुमसे दूर होता रहूंगा । मुझे अभी किसी भी बंधनोंमे ज़कडेनेकी कोशिश मत करो, मुझे घुटनसी होती है । मुमकीन है कि कुछ वक्त साथ गुज़ारने के बाद मैं अपने आप सँवर जाऊँ ।"
वक्त गुज़रता गया । जैसे-जैसे शादीकी तारीख पास आने लगी, वैसे-वैसे संजीवको एक अज़ीबसा डर लगने लगा । जिस आज़ादीको मैंने बडे प्यारसे संजोया था, कहीं वह शादीके बंधनोंमे खो तो नहीं जायेगी? उम्रभरके इस बंधनका क्या मैं उसी तरह सामना कर पाऊंगा जिस तरह आजतक करता आया हूँ? क्या होगा मेरा? कहीं मेरे कारण सुनितापर भी बंदिशें आ जायेगी तो? लेकिन मैंने तो उसे सब साफ-साफ बता दिया है । अगर उसे मेरे अज़ीब खयालात पसंद नही तो उसे मुझसे कोई उम्मीद ही नहीं रखनी चाहिये । संजीव जितना सोचता उतनाही घबरा जाता ।
कभी कभी उसे लगता कि सुनिता उसके हर रूपको स्वीकार करनेको तैयार है । अगर ऐसा नहीं होता तो वह इस बंधनमे बंधना ही क्यों चाहती? उसने कईं बार सुनिताको कहा भी, "अगर मेरे साथ मेरे तरीकेसे रहना मुश्किल समझो तो शौकसे इसे तोड सकती हो । मेरा स्वभाव इतनी आसानीसे बदलना अगर असंभव नहीं तो मुश्किल ज़रूर होगा । सिर्फ़ समाजके डरसे शादीके बंधनको स्वीकार मत करो ।" इस बातपर सुनिता सिर्फ़ मुस्कराई थी । सच, क्या यह शादी करके मैं खुश रह पाऊँगा?
संजीवका मन दुविधामे पड गया था । लेकिन वक्त कहाँ रुकनेवाला? पतझड गई, बसंत आया । पेडोंपर फिर एक बार बहारें आईं ; सारा मौसम खुशीसे डोलने लगा । पँछी चहकचहक कर गीत सुनाने लगे । चारों तरफ़ खुशियाँ छाई हुईं थी । सब जगह शहनाईयाँ बज रही थीं । सिर्फ़ संजीव सोचमे डूबा हुआ था, जैसे अंतरात्माकी कोई आवाज़ उसे चेतावनी दे रही हो । लेकिन अब हो भी क्या सकता था? मेरे शहीद होनेका वक्त हो चुका है, वह अपने आपसे मुस्कराकर बोला ।
वक्त आया और चला गया । शादीके बाद सब रिश्तेदार और दोस्त अपने अपने घर चले गये । संजीवके जीवनमे एक नया दौर शुरू हो रहा था । पता नही क्या लिखा है मेरे भविष्यमें? अंध:कार ... या सुनहरा उजाला?
संजीव दबे हुए कदमोंसे कमरेमे आया । उसकी आहट लगतेही सुनिता शरमाई और सिकुडकर बैठी । उसने अपना घूँघट ओढ लिया और दाँतोतले अपने होंठ दबाकर वह संजीवकी प्रतीक्षा करने लगी । उस अँधकारको चीरते हुए धीमीसी रोशनीमे भी वह संजीवके सुडौल शरीरको देख सकती थी । ओफ़ ! आज वक्त रुका हुआ क्यों है ? सारी उम्रभर सुनिताने इस रातके सपने सजाये थे -- बडी बेसब्रीसे इस सुहानी घडीका इन्तज़ार किया था । इससे बडी खुशी उसने इससे पहले जानी नहीं थी । दो शरीरोंका मिलन ....
"सुनिता, एक बात पूछूँ?"
"हं ...."
"सेक्सके बारेमे तुम्हारे क्या विचार हैं?"
"ऊई माँ! ऐसा बेशर्म सवाल?", इस अचानक सवालसे शरमाकर सुनिता बोली ।
"इसमे बेशर्मी की क्या बात है, सुनिता?", संजीव बोला । "हमें चाहिये कि हम इस बारेमे एक दूसरेके विचार जान लें । मैं तो समझता हूं कि शादीसे पहले किसीको ’सेक्स’ के बारेमें सोचना नही चाहिये । इतने पवित्र मिलनको बेसब्रीसे गंदा रूप नहीं देना चाहिये । हाँ, हालाकि ये मेरे अपने विचार हैं और दूसरोंके बारेमे मैं कुछ नही कहना चाहता । तुम क्या समझती हो?"
आज अपनी सुहाग रातको पलंगपर बैठे ये बातें सुनकर सुनिताको अजीबसा लगा । इससे पहले जब वे दोनों इस विषयपर बोले थे तब वह झूठ बोली थी । लेकिन संजीव, आज यह कोई वक्त है इन बातोंमे समय बरबाद करनेका? वह चाहती थी कि संजीव चुपचाप वहाँ बिछे हुए फूलोंको मसल दे -- दोनों हमेशा-हमेशाके लिये एक दूसरेमे समा जाये । ओह संजीव, अब आ भी जाओ ...
संजीव धीमे कदमोंसे आकर पलंगपर बैठ गया । उस अंधेरे कमरेमे अब रोशनी छा गई थी । सुनिताकी गर्दन झुक गई । इस वक्त जब उसे इस अंधेरेसे प्यार होने लगा था, तब उन दोनोंके बीच यह रोशनीका पर्दा क्यों था? संजीवने सुनिताका घूँघट दूर किया, प्यारभरे हाथोंसे उसकी झुकी हुई गर्दनको उठाया और धीरेसे अपने होंठ उसके होठोंपर रख दिये । सुनिताके पूरे बदनमे बिजलीसी दौडने लगी । उसे सिर्फ़ इसी घडीका इन्तज़ार था, और उसके इन्तज़ारकी घडियाँ खत्म होनेको थी । संजीवने फिरसे उसकी ओर देखा और कहा, " सुनिता, आज मैं बहुत थक गया हूँ । चलो, सो जायें, अब पूरी उम्र साथ ही तो रहना है ।"
सुनिताने चौंककर संजीवकी ओर देखा । वह थकानसे चूर बिस्तरपर लेट गया था । सुनिताकी आँखोंमे अब संजीवके लिये घृणा भरी हुई थी । यह कैसा शैतान है जिसने उसके सपनोंकी दुनियाको उजाड दिया था? वह गुस्सेसे मुँह फेरकर सो गई ।
सूरजकी किरणोंने जब संजीवको जगाया तब उसने देखा कि सुनिता गहरी नींद सो रही थी । उसे जगाना संजीवने ठीक नही समझा । झुककर उसने सुनिताके चेहरेको चूमा । जब सुनिताकी आँख खुली तो उसने देखा कि संजीव कहीं जानेकी तैयारियाँ कर रहा था ।
"कहाँ जा रहे हो तुम?" सुनिताकी आवाज़में गुस्सा झलक रहा था ।
"सुनिता, इतना गुस्सा ठीक नहीं ।"
"यह मेरे सवालका जवाब नही । और जो तुम कर रहे हो वह क्या ठीक है?"
"अच्छा, तो इस लिये नाराज़ हो? सुनिये मोहतरमा, मै स्कूल जा रहा हूँ ।"
संजीवके इस ठण्डे मिजाज़से वह और चिढ गई । "तुम भूल रहे हो, कलही तुम्हारी और मेरी शादी हुई है । आज जाना ज़रूरी है? आज मेरे साथ नही रह सकते?"
संजीवने हँसकर उसका हाथ थामा और जवाब दिया, "सुनिता, हम दोनों को तो उम्रभर साथ रहना है । और रही आज जानेकी बात, तो हाँ, आज जाना ज़रूरी है ।"
"क्यों?"
"क्योंकि कल शामको स्कूलका सालाना जलसा है, जिसके लिये बच्चोंकी प्रॅक्टीस लेना मेरी ज़िम्मेदारी है । पहले ही काफी दिनोंसे मैं जा नहीं सका था । सब बच्चे मेरी राह देख रहे होंगे । मैं ज़बान दे चुका हूँ । क्या तुम चाहती हो कि मैं अपने फर्ज़से मुँह मोड लूँ?"
"तो क्या शादी-प्यार कोई फ़र्ज़ नहीं?"
"ज़रूर है, लेकिन मै प्यारके फ़र्ज़से ज़्यादा फ़र्ज़के प्यारको मानता हूँ ।"
इतना कहकर संजीव झटसे बाहर चला गया । घरसे बाहर निकलकर उसकी चाल अपने आप धीमी हो गई । वह सोचनेपर मज़बूर हुआ । क्या उसका जीवनसाथीका चुनाव सही था? क्या सुनिताका बर्ताव सही था? क्या सुनिताके प्रति उसका अपना बर्ताव सही था? प्यारमे सारी दुनियाको भूल जाना ज़रूरी होता है क्या? अगर सुनिता गुस्सेके बजाय प्यारसे उसे रोकनेकी कोशिश करती, तो शायद वह रुक जाता । लेकिन ---
शामको जब वह देरसे घर लौटा तो उसने देखा कि सुनिता एक कोनेमे मुँह लटकाकर बैठी थी । उसके पास जाकर संजीवने बात करनेकी कोशिश की तो सुनिताने गुस्सेसे अपना मुँह फेर लिया और दूसरी जगह जाकर बैठ गई । यकायक संजीवको अपने आपसे घृणा होने लगी । उसने सोचा था कि थका हुआ घर लौट आनेपर कोई उसे प्यारसे पानी पूछेगा, उससे बातें करेगा । बाथरूम जाकर संजीवने बहते नलके ठण्डे पानीके नीचे अपना सर रखा ।
रातको सुनिता दीवारकी ओर मुँह किये लेटी हुई थी । संजीवकी आहट लगी तो वह उठकर बिस्तरपर बैठ गई । संजीव उसके पास बैठ गया । "सुनिता, मै तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ ।"
"संजीव, मैं भी तुमसे बहुत कुछ कहना चाहती हूँ ।"
"सुनिता, पहले मेरी बात सुनो । मैं जानता हूँ, तुम मुझसे बहुत नाराज़ हो । अपनी सुहाग रात तुम्हें करवट बदलकर गुज़ारनी पडी । सच कहूँ तो थकानका एक बहाना था । मेरे जीवनमे कुछ ऐसी घटनाएँ घटी हैं, जिनके कारण मैं अपने आपमे, इन रिश्तोंमे विश्वास खो चुका हूँ । मुझे तुम्हारे सहारेकी ज़रूरत है । मैने पहलेभी तुम्हे मेरे जीवनके बारेमे बताया है, और आज फिर एक बार बताना चाहता हूँ ।" संजीवने अपनी सारी जीवनकहानी सुनिताके सामने दोहराई और उसे लगा जैसे उसके दिलका बोझ कुछ हलका हो गया ।
"संजीव, तुमने अपनी रामकहानी तो सुना दी । अब मेरी सुन लो । एक लडकीको अपने माँ-बापके घरमे सब कुछ मिल जाता है, सिवा सेक्सके । और एक लडकी शादी करती है तो सिर्फ़ अपने सुहाग रातकी तमन्ना लेकर । ..... "
सुनिता बोलती रही और संजीव सुनता रहा । सुनिताका एकएक शब्द उसके दिलमे शूलकी तरह चुभ रहा था । उसे लगा, उसकी आँखोंके सामने उसके प्यारका महल टूट रहा था । तो क्या एक औरत सिर्फ़ सेक्सके लिये शादी करती है? शादी क्या सिर्फ़ सेक्सका नाम है? शादीका अटूट बंधन कोई मायने नही रखता? अगर किसीको सिर्फ़ सेक्स ही चाहिये होता है, तो क्या मण्डीमे नही मिलता? एक मर्द और एक औरतको क्या एक ऐसे घरकी ज़रूरत नही होती जहाँ उसे प्यार मिले? अपनापन मिले? हमदर्दी मिले? एक ऐसा जीवनसाथी मिले जो एक दूसरेको उसकी कमज़ोरियोंके साथ अपना ले? क्या शादी सेक्सका सिर्फ़ लायसन्स है? सिर्फ़ एक सौदा? मुझे ऐसा सौदा तो नही करना था । उसे अपने जीवनमे एक दरारसी नज़र आने लगी ।
दूसरे दिनसे ही संजीवको सुनिताके व्यवहारमे कुछ बदलावसा नज़र आने लगा, जैसे कोई भारी बोझ दिमागपर लेकर वह जी रही हो । उसके चेहरेसे हँसी गायब हो गयी । पूरे घरमे मातमसा छाया रहता । ऐसे माहौलमे संजीवको घुटनसी महसूस होने लगी । उसे लगने लगा कि उसने कोई बहुत बडा गुनाह किया हो जिसके कारण सुनिता नाराज़ थी । धीरेधीरे उसे अपने आपसे नफ़रत होने लगी । देखते ही देखते उसके चेहरेसे भी हँसी गायब होने लगी । हर वक्त वह चिढचिढासा रहने लगा । आजतक उसे लगता था कि लोग उसके करीब आकर खुश रहते हैं । लेकिन उसके अपने घरमे यह आलम था कि उसकी अपनी जीवनसंगिनी उसके कारण हमेशा मायूस रहती । क्या संजीवके व्यक्तित्वमें ही कोई कमी थी? यह न्यूनगण्ड हमेशा उसे सताता रहता ।
फ़िरभी एक बात उसकी समझमे नही आयी । दिनभर उससे खफ़ाखफ़ा रहनेवाली सुनिता रात होतेही बदल जाती । दिनभर उससे दूरी रखनेवाली वह औरत रातके अंधेरेमे उससे लिपट जाती । जैसे बिस्तरपर होनेवाली और बिस्तरसे बाहर होनेवाली सुनिता दो अलग-अलग व्यक्तित्व थे । यह बात संजीवके समझमे नही आई और वह इस रहस्यपूर्ण औरतके साथ रात बितानेमे झिझकने लगा । यह नकाब किस लिये? यह ढोंग कैसा और आखिर क्यों? दिनमे उससे दूरदूर भागनेवाली उसकी पत्नी रात होतेही उससे लिपटी रहती? उसे गलीमे देखे हुए वे कुत्ते याद आये जो जब जी चाहे यौनाचार कर पाते । आखिर शादीका मतलब क्या सेक्सतक ही सीमित होता है? अगर मैं भी यह करनेमे सफ़ल रहूं तो मुझमे और मेरे पितामे अंतरही क्या रहा? फिर दोनों पशूही तो कहलायेंगे ना? कई दिनोंतक यह सिलसिला चलता रहा -- दिनमे सुनिता उससे दूर भागती और रातको संजीव सुनितासे दूर रहता । आखिर उसने एक दिन सुनितासे पूछ ही लिया, "सुनिता, जो रुची तुम रातोंमे दिखाती हो वह दिनमे क्यों नही?"
"कैसी बात कर रहे हो संजीव? हम आखिर दिनमे ’वह काम’ कैसे कर सकते हैं?"
सुनिताका जवाब सुनकर संजीव हैरानसा रह गया । क्या इस लडकीका सारा जीवन "उस काम" के दायरेमेही सीमित था? क्या उसके लिये शादीका मतलब सेक्सके सिवा और कुछ नही था? यह कैसी औरतसे मैने अपने आपको बाँध लिया है? हम दोनोंकी सोच अलग है, रास्ते अलग हैं, मंज़िलें अलग हैं । अगर बात सिर्फ़ जिस्मानी रिश्तोंकी है तो आखिर दो दिल मिले भी तो कहाँ और कैसे? सोच-सोचकर संजीवका सर चकराने लगा । एक दिन उसने सुनितासे कहा, "सुनिता, हो सकता है, तुमने गलत आदमीसे रिश्ता जोडा है । तुम्हे एक ऐसे रिश्तेकी तलाश थी जो कहीं भी पूरी हो सकती थी । तुम्हें एक जिस्म चाहिये था, जिसका कोई नाम ना हो, कोई चेहरा ना हो, अलग अस्तित्व ना हो । तुम्हे तलाश थी एक ऐसे बदनकी जो रातके धुँधले उजालेमे तुम्हारे बदनको गर्मी दे सके । तुम्हारे सेक्सकी भूख मिटा सके । और मुझे तलाश थी एक ऐसे साथीकी जो ना सिर्फ़ मेरे बदनकी, बल्कि मेरे दिलकी, दिमागकी ज़रूरत पूरी कर सके । मैं समझता हूँ कि हम एक दूसरेसे गलत जगह मिले हैं । हमें बाज़ारमे होना चाहिये था, लेकिन हम एक घरमे बंद हैं ।"
"तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई, संजीव, मुझे वेश्या कहनेकी? तुमने मुझे वेश्या कहा?" सुनिता झल्लाकर चिल्ला उठी ।
"सुनिता, जो मैने कभी कहा ही नही, तुम हमेशा वही सुनती आयी हो । शायद गलती मेरी ही थी ।"
"क्या मतलब?"
"क्या यह सच नहीं कि तुम सिग्रेट और शराब भी पीती हो?"
"तो इसमे कौनसी बडी बात है, मिस्टर संजीव? मै जिस माहौलमे काम करती आई हूँ, वहाँ तो यह आम बात है । ऊँचे घरकी कईं औरतें सिग्रेट और शराब पीती हैं ।"
"ऊँचे घरकी औरतें पीती होंगी, हमारे घरकी नहीं ।"
"और तुम्हें पता भी था इस बातका ।"
"और इसीलिये मैं चुप था । किसी भी तरहका दबाव नही डालना चाहता था तुमपर । अगर चाहता तो तुमपर ज़बरदस्ती कर सकता था कि ये सब बातें मुझे कतई पसंद नही, और ये आदतें छोड दो । लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया । सोचा, तुम्हे खुद एहसास होगा किसी दिन और छोड दोगी ये सब बातें ।"
"तो क्यों नही किया? क्यों मेरी ज़िंदगी बरबाद की?"
"किसने किसकी ज़िंदगी बरबाद की, किसे पता, सुनिता? मैं हमेशा अपने फ़ैसले अपने आप लेता आया हूँ, और चाहता था कि तुमभी वही करो । मुझे अभिमान था तुमपर कि तुम ढोंगी नही हो । जो भी करती हो, खुले आम करती हो । कितना गलत था मैं ।"
कहनेको तो उस दिन बात वहींपर खत्म हुई, लेकिन उन दोनोंकी बीच एक ऐसी दीवार उभर रही थी जिसको पार करना दोनोंके लिये मुश्किल था । उस रातके बाद, संजीव ज़्यादासे ज़्यादा वक्त घरके बाहर गुज़ारने लगा । एक दिन जब उसकी माँने पूछा तो उसने जवाब दिया, " घरमें रहकर भी क्या करूं माँ? जो चीज़ घरमे नही मिलती उसे बाहर ढूँढनेसे दिल तो बहलता है कुछ देरके लिये ।"
देखते-देखते दिन महीनोंमे गुज़र गये । अपने हँसीका खज़ाना अब संजीव घरसे बाहर दूसरोंके लिये लुटाता फिरता । संजीव और सुनिताके बीचकी दूरी बढती ही गई । जब किसी कारणवश उन दोनोंको एक साथ बाहर निकलना पडता तो वे खुशीका एक झूठा नकाब पहनकर निकलते, जिससे किसीको कुछ पता नहीं चलता ।
फिर एक दिन सुनिताने संजीवसे पूछा, "आखिर ये सब कबतक चलता रहेगा?"
"क्या?"
"यही तुम्हारा दिनभर घरसे गायब रहना? घर ज़ल्दी क्यों नही आते? हर समय बच्चो-बूढोंको लेकर घूमते रहते हो, कभी मुझे लेकर घूमने क्यों नही जाते?"
"घर जल्दी आऊँ भी तो किस लिये? तुम्हारा यह हरदम चढा हुआ चेहरा देखने? अगर कभी तुम्हे खुश देखता हूँ तो सिर्फ़ जब साथ सोनेकी बात आती है तब ।"
"तो इसमे बुरा ही क्या है? वह हक है मेरा । मैं चाहती हूँ, तुम हमेशा मेरे साथ रहो ।"
"साथ रहूँ बिस्तरमें? तुम्हारा बस चले तो सब कामधाम छोडकर चौबीस घण्टे मुझे अपने साथ सुला दोगी ।"
"अगर तुम्हे अपने पास रखनेका यही रास्ता है तो मैं वही करूंगी ।"
"सुनिता, मैंने तुमसे कईं बार कहा है कि जो समय मैं तुम्हारे साथ गुज़ारता हूं, उसमे खुश रहनेकी कोशिश करो, ना कि उस वक्तके बारेमे शिकायत करती रहो जो मैं तुम्हारे साथ नहीं गुजार पाता । एक दूसरेको अपनी मुठ्ठीमें बंद रक्खो, इसका मतलब प्यार तो नहीं । क्या यह मुमकीन नही कि कुछ वक्त तुम अपने आप गुज़ारो, कुछ मैं अपने आप गुज़ारूं और कुछ हम एक दूसरेके साथ गुज़ारें? जिनसे हम सच्चा प्यार करते हैं उन्हें हमें खुले आसमानमे छोड देना चाहिये । अगर वह लौटकर आये तो वह अपना कहलाता है । वर्ना वह कभी अपना था ही नहीं ।"
संजीवकी बहस सुनकर सुनिता झल्ला उठी । "यह तुम्हारा फलसफ़ा मेरी समझके बाहर है और ना ही मैं उसे समझना चाहती हूँ । मैं बस चाहती हूँ कि तुम सिर्फ़ मेरे हो और सिर्फ़ मेरे बनकर रहो । मैं तुम्हे किसी औरके साथ बाँटना नही चाहती । बिल्कुल नही ।"
"देखो सुनिता, प्यार बाँटनेसे कम नहीं होता । प्यार एक झरना है इन्सानके दिलमे, जो बस बहना चाहता है, बिना किसी बंधनके । उसके कईं नाम होते हैं ।अच्छे-बुरे नाम देकर समाज प्यारको बंधनोंमे जखडना चाहता है । मैं समझता हूँ, जिस प्यारकी तुम्हे भूख है, वह सेक्स सिर्फ़ एक छोटासा रूप है प्यारका । और मै प्यारके सिर्फ़ इस रूपमे विश्वास नही रखता । जब आदमी थका-मांदा शामको घर लौटता है तो उसकी पत्नीकी आँखोंमे जो लुक्का-छुप्पी खेलता है, मुझे उस प्यारकी तलाश है । मै ..."
संजीवको बीचमे टोकते हुए सुनिता चिल्ला उठी, "ये तुम्हारी किताबोंवाली बातें मुझे मत सुनाओ । मै सिर्फ़ व्यवहारकी बातें समझती हूँ । तुम्हारे लेव्हलतक उठना मेरे बसकी बात नहीं ।"
संजीवने हँसनेकी कोशिश करते हुए कहा, "सुनिता, किसीके लेव्हलतक मत उठो, कमसे कम कोशिश तो किया करो ।"
ना चाहते हुए भी सुनिताने अपने आपको बदलनेकी कोशिश की । लेकिन उसका असली चेहरा बारबार उभर आता । किसी शामको वे दोनों एक पार्टीमे गये हुए थे । हमेशाकी तरह संजीव सबसे मिलजुलकर पार्टीकी जान बनता रहा, हँसताहँसाता रहा । संजीव और उसके दोस्तोंके लाख कोशिश करनेपर भी सुनिता सबसे अलग अपने आपमे खोई बैठी रही । घर लौटते हुए भी वह काफ़ी देर चुपचाप बैठी थी । फिर मौका पाकर वह अपने दिलकी भडास निकालने लगी, संजीवको छोटेमोटे ताने देने लगी । उसे बस यही शिकायत थी कि संजीवने उसके साथ बहुत कम वक्त बिताया । जब संजीव सह नही पाया तो वह भी बोल उठा, "अगर हम पार्टीमे जाते हैं तो लोगोंसे मिलने, ना कि एक दूसरेके गलेमे लिपटके बैठने । मै अगर हर किसीसे बात करता हूँ तो इस लिये नही कि जानबूझकर तुम्हे अकेला छोडूँ । स्वभाव है मेरा । अपने दोस्तोंके साथ वक्त बितानेसे मैं तो कभी तुम्हें रोकता नहीं । अगर तुम ज़रासा भी बदलनेकी कोशिश नही करना चाहती तो मुझसे यह उम्मीद क्यों रखती हो कि रातोंरात मैं बदलूँ? शादीसे पहले अपने घरमे तुम किसी और ढंगसे जीती थी, तो यहाँ अचानक यह बदलाव क्यों? क्या अपने घरमे तुमने यह कोशिश नही की कि अपनी माँ को ज़्यादा काम ना करना पडे? तो मेरे घरमे मेरी माँ से यह बर्ताव क्यों? क्यों सवेरे-सवेरे उठकर सब काम उसेही करने पडते हैं? क्या मेरी माँ तुम्हारी माँ नही? क्या मेरा घर तुम्हारा घर नही?"
"नही, यह घर मेरा नही । जहाँ रातको मुझे छोटेसे किचनमें सोना पडे, वह घर मेरा कभी नही हो सकता । मुझे एक बडा घर चाहिये जहाँ मैं रानी बनकर रहूँ, ना कि एक नौकरानी, जिसे किचनमे सोना पडे, समझे? यह घर मेरा नही । और ना ही तुम्हारे घरवाले मेरे घरवाले हैं । "
सुनिताकी यह बात सुनकर संजीव दंग रह गया । "ओह, तो तुम्हे एक महलकी तलाश थी -- एक घरकी नही, जिसमे सीधेसाधे लोग रहते हैं ! ठीक उसी तरह, जिस तरह तुम्हे सिर्फ़ एक बेजान जिस्म की ज़रूरत है जो जब तुम चाहो तुम्हारे बदनसे लिपटा रहे । तो क्यों यह शादीका ढोंग रचा रही हो? क्यों अपने आपको इस बेतुके बंधनसे ज़कड रखा है? तोड दो इस बेमतलब बंधनको ... छोड दो इस घरोंदेको । ढूंढ लो अपने राजमहलको । निकल जाओ मेरी ज़िंदगीसे ।"
संजीवकी माँने संजीवकी यह आखरी बात सुनी, तो वह झटसे दरवाज़ा खोलकर अंदर आई और संजीवके मुँहपर एक चाँटा जमा दिया ।
सुनिता चिल्लाई, "अब तुम्हें यह भी तमीज़ नही कि दरवाज़ा खटखटाकर अंदर आओ? पती-पत्नी की बातोंको छुपछुपकर सुननेमे तुम्हें शर्म नहीं आती?"
संजीव गुस्सेमे आकर सुनितापर हाथ उठानेवाला ही था तो फिरसे उसकी माँ बोली, "संजीव, खबरदार जो तुमने बहूको छुआ भी । मुझसे बुरा कोई नही होगा । आखिर उसने जो कहा उसमे गलत ही क्या है? हर लडकी शादीसे पहले बहुतसे सपने देखती है । एक सपना सुनिताने भी देखा, तो उसमे उसकी क्या गलती है?"
सुनिता फिरसे चिल्ला उठी, "मेरे सामने यह नाटक करनेकी ज़रा भी ज़रूरत नही । अपने लडकेको किस तरहकी परवरिश दी है, देख चुकी हूँ मै । पल्लूसे बाँधकर रक्खो अपने लाडलेको ।"
सुनिताकी यह बात सुनकर संजीवकी माँ सिसकियाँ देते हुई कमरेसे बाहर चली गईं । चाहते हुए भी संजीव कुछ नही कर सका । अपने खिलाफ़ कोई भी आरोप सहनेकी वह क्षमता रखता था, लेकिन अपने माँकी बेइज़्ज़ती देखकर वह पूरी तरह टूट गया । देखतेदेखते उसके सारे अरमानोंकी बारात अर्थीमे बदल रही थी । जिस जीवनसाथीके ख्वाब उसने देखे थे वह यह नही थी । अपने पिताके हाथों अपने माँकी हालत तो वह देख चुका था, और अब अपनी पत्नीके हाथों अपनी माँका अपमान सहनेकी हिम्मत उसमे नही थी । वह कमरेसे बाहर निकलकर सडकपर आ गया । जिस प्यारकी उसे तलाश थी वह उसके नसीबमे नही था ।
जिस प्यारसे वह अपने बचपनमे महरूम रहा, वही प्यार वह अपनी औलादको देनेकी चाह रखता था । ऐसी औलाद, जो एक ऐसे रिश्तेकी निशानी हो जिसे उसने खुद चुना था । लेकिन यह कैसा रिश्ता उसके नसीबमे आया था? आखिर क्यों? वह जानता था कि किसी हदतक इन हालातके लिये वह भी ज़िम्मेदार था । लेकिन क्या पूरी तरह वही ज़िम्मेदार था? सोचसोचकर संजीवका सर चकराने लगा । उसकी आँखोंके सामने अँधेरासा छाने लगा । देखते ही देखते उसकी आँखें आँसूओंसे भर गयी ।
आँखोंसे बहती हुई धारामे उसके अतीतकी प्रतिमा धुँधलीसी हो गयी । उस हालतमे पता नही वह कितनी देर बैठा रहा । जब उसे होश आया तो प्रकाश उसके सामने खडा था ।
"चलो संजीव, तुम्हारी माँ राह देख रही होगी ।"
"चलो, प्रकाश । मेरी राह और कौन देखेगा?"
दोनों जब क्लबसे बाहर आये तो रातकी धुँधली चादर ओढे सारा शहर नींदमें डूबनेकी तैयारी कर रहा था । हलकेसे अपना हाथ संजीवके कँधेपर रखते हुए प्रकाशने कहा, " संजीव, एक बात कहूँ तो बुरा तो नहीं मानोगे? सुनिता कल फिर एक बार ऑफिस आनेवाली है ---"
"तो? प्रकाश, मेरे लिये तो वह कबकी मर चुकी है --- जिस बच्चेकी मुझे चाह थी, उसे पैदा करनेसे पहले ।"
"ऐसा मत कहॊ, संजीव । मुमकिन है कि अबतक तुम दोनोंने एक दूसरेको गलत समझा हो । अब छ: महीनोंकी दूरीके बाद हो सकता है कि तुम एक दूसरेको अच्छी तरह समझने लगो । तुम एक बार उससे मिल तो लो । हो सकता है कि जिस मंज़ीलकी तुम दोनोंको तलाश थी वह अपने सामने पाओ । आखिर इस समस्याका कुछ तो हल हो ।"
कुछ देर सोचनेके बाद संजीव बोला, " हाँ प्रकाश, मैं भी इस सबसे तंग आ चुका हूँ । चाहता हूँ कि इस समस्याका कुछ हल निकले -- इस पार या उस पार । मैं मिलूँगा सुनितासे ।"
दूसरे दिन ऑफिसके बाद संजीव और सुनिता चौपाटीकी रेतमे बैठकर बातें कर रहे थे । संजीवके साथ प्रकाश और सुनिताके साथ उसकी सहेली रंजिता थी । आईसक्रीम खतम होतेही आसमान की तरफ़ देखकर सुनिताने सवाल किया, "संजीव, आखिर क्या सोचा है तुमने मेरी ज़िंदगीके बारेमे?"
"सुनिता, मैं चाहता हूँ कि तुम यही सवाल मुझसे आँख मिलाकर पूछॊ । सच बात तो यह है कि तुमने सवाल ही गलत किया है ।"
"क्या मतलब है तुम्हारा, संजीव?"
"सुनिता, अगर मैने तुम्हे जानेके लिये कहा था तो उसकी वजह थी ।"
"तुम्हारा मतलब है कि मैं बिना वजह चली गई थी?"
"वजह थी, समझ सकता हूँ मै । मैने तुमसे जानेके लिये सिर्फ़ एक बार कहा था, जब तुमने मेरी माँका अपमान किया था । जब वह तुम्हारी तरफ़दारी करते हुए मुझसे लड पडी थी । और तुम बार बार घर छोडकर जाती रही । कोई खास वजह?"
संजीवकी इस बातको सुनकर अचानक रंजिताकी झुकी हुई गर्दन उपर उठ गई । "सुनिता, तुमने यह बात तो कभी मुझे बताई नहीं । जवाब दो ..."
"रंजिता, सुनिता जवाब नही दे पायेगी, क्योंकि उसके पास इस बातका कोई जवाब नही है । सच बात तो यह है कि उसने शादीको हमेशा एक गुड्डागुड्डीका खेल समझा है । एक ऐसा खेल जो एक मर्द और औरत एक दूसरेके शरीरसे खेलते हैं । जिसमे और किसी भी बातकी गुँजाईश नही होती ।"
सुनिता चिल्ला उठी, "मैने कभी ऐसा तो नही कहा था ।"
"कहा था, सुनिता, ऐसाही कहा था । सिर्फ़ अपनी ज़बानसे नही, बल्कि अपने व्यवहारसे भी । यही वजह थी कि तुम यह खेल बारबार मेरी ज़िंदगीसे खेलती रही । और जब मैं तुम्हारे खेलमे हर बार तुम्हारा साथ नही दे सका, तो तुम बारबार घर छोडकर जाती रही । जबजब तुम्हे मेरे नामकी ज़रूरत महसूस हुई तबतब तुम मेरी ज़िंदगीमे वापस आती रही । जिस तरह बिल्ली चूहेके साथ ज़िंदगी और मौतका खेल खेलती रहती है ठीक उसी तरह तुम मेरी ज़िंदगीसे खेलती रही ... मेरी भावनाओंसे खेलती रही । शादीका मतलब तुम्हारे लिये सिर्फ़ एक खेल था ।"
"संजीव, झूठी तोहमत लगा रहे हो तुम मुझपर ।"
"सुनिता, सच बहुत कडवा होता है । तुम्हारी नज़रोंमे शादी सिर्फ़ एक लायसन्स है जो समाज बक्शता है ’सेक्स’का खेल खेलनेके लिये । तुमने हमेशा चाहा कि दो शरीर एक साथ लिपटे रहें, चाहे उनके दिल मिलें न मिलें । जहाँ दो शरीरोंके साथ साथ दो दिलोंका मिलन ना हो सके, ऐसे बंधनको शादीका नाम देनेके लिये मैं हरगिज़ तैयार नहीं हूँ । न ही ऐसे बंधनको मैं कभी मानता हूँ । हमारी मंज़िलें जुदा थी और हमारा अलग होना लाज़मी था ।"
"इसका मतलब है कि तुम मुझे वापस नही लोगे?"
"ज़िंदगीमे पहली बार तुमने मुझे ठीक समझा है, सुनिता । बधाई हो ।"
"संजीव, मै तुमसे साफ़साफ़ कह रही हूँ, तुम अगर मुझे स्वीकार नही करोगे तो मैं यहीं कूदकर ..."
"... तुम अपनी जान कभी नही दे सकती, सुनिता । तुम्हे अपने शरीरसे हदसे ज़्यादा प्यार है । मुझ जैसे आदमीके लिये तुम अपनी कीमती जान कभी नही गँवाना चाहोगी । अगर ऐसा होता तो छ: महीने मुझसे दूर रहकर तुम कभी ज़िंदा रह नही सकती थी । जब मुझे तुम्हारे सच्चे प्यारकी ज़रूरत थी, तब तुम मुझसे दूर रही । मैं समझ नही पा रहा हूँ कि आज तुम्हारी क्या मज़बूरी है जिसके लिये तुम मेरी ज़िंदगीमे वापस आना चाहती हो । आज के समाजमे जीनेके लिये किसीको किसीके नामकी ज़रूरत नही होती । ना मर्दको, और ना ही एक औरतको । सुनिता, मेरी शुभकामनाएं तुम्हारे साथ थीं और हमेशा रहेंगी । तुम अपनी नई दुनिया बसा लॊ, और मै अपनी नई दुनिया बसानेके लिये किसी ऐसे साथी की तलाशमे रहूँगा जो मुझे मेरी कमज़ोरियोंके साथ स्वीकार करे । "
संजीवकी यह बात सुनकर सुनिता हैरान रह गई । "आखिर तुम चाहते क्या हो, संजीव?"
"सुनिता, मै चाहता हूँ कि इस समाजके ठेकेदारोंको कुछ बता सकूँ । जब पति-पत्नीकी आपसमे बनती ना हो, तब ज़रूरी नही कि समाजके डरसे वे एक छतके नीचे अजनबी बनकर रहें । इससे अच्छा तो यह है कि वे एक दूसरेसे अलग हो जायें । जिस तरह मै शादीके लायसन्सको, याने Marriage Certificate को नही मानता, ठीक उसी तरह मै उस कागज़के टुकडेको भी नही मानता जिसे समाजके ठेकेदार तलाक या divorce कहते हैं ।"
"तो तुम दूसरी शादी करना चाहते हो?"
"सुनिता, हमेशाकी तरह अबभी तुमने मुझे गलत समझा । क्या ज़रूरी है कि हर तलाशकी मंज़िल शादी हो? याद है, कभी मैने तुमसे कहा था, प्यार एक झरना है जो कईं रूप लेकर बहना चाहता है । इसी प्यारका एक नया रिश्ता जोड लूँगा मै । बताना चाहता हूँ समाजके ठेकेदारोंको कि वही रिश्ता सबसे बडा होता है जो इन्सान अपनी मर्ज़ीसे जोड सके । चाहे वह रिश्ता पति-पत्नीका हो, दोस्त-दोस्तका हो; बाप-बेटेका हो । कभी कोई ऐसा साथी मिले जो मुझे पूरी तरह समझकर अपना सके, तो शादी ज़रूर कर लूँगा । अगर समाज इजाज़त दे तो किसी अनाथ बच्चेको गोद लेकर उसकी परवरिश करूँगा । उसे अपना नाम दूँगा, अपना प्यार दूँगा, जिससे प्यारका यह झरना हमेशा बहता ही रहेगा ।"
बोलते बोलते संजीव सबको पीछे छोडकर डूबते हुए उस ढलते हुए सूरजकी तरफ़ बढता गया जो कभी उसकी ज़िंदगीमे एक नया उजाला ले आये । सुनिता और बाकी सब उसकी तरह देखते रहे । उन्हें पता चल गया कि यह दूरी अब कभी कम नही होनेवाली ।
लक्ष्मीनारायण हटंगडी
EC51/B104, Sai Suman CHS,
Evershine City, Vasai (E)
PIN 401208
(suneelhattangadi@gmail.com)
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