( पर्दा खुलनेपर बहुत शोर सुनाई देता है। अचानक एक आवाज़ ज़ोरसे सुनाई देती है, "सब चुप हो जाऒ।" कुछ देर सब शांत हो जाता है, और फिर धीरे धीरे शोर बढने लगता है। फिरसे वही आवाज़ आती है, "अरे मूर्खों, चुप हो जाओ।" सब धीरेधीरे चुप हो जाते हैं। )
इतिहास : यह कौन बोला? किस मूर्ख ने मुझे ’मूर्ख’ कहा? विज्ञान, यह ढिटाई सिर्फ तुमही कर सकते हो।
विज्ञान : बुढऊ, काश की मैं यह कहता। लेकिन जो सभी जानते हैं उसे दोहरानेकी मूर्खता मैं भला क्यों करूं?
इतिहास : क्या मतलब?
विज्ञान : यही की तुम मूर्ख हो। केवल अतीत मे जीते हो।
इतिहास : तो? मैं अतीत हूं, इसीलिये महत्त्वपूर्ण हूं।
विज्ञान : (कुत्सित हंसकर) अच्छा! तो तुम इस भ्रममे हो? सठिया गये हो। अगर मैं न होता तो ना जाने दुनिया कहां होती? विश्व ने इतनी प्रगति की है तो सिर्फ मेरे आविष्कारों के कारण। मैने ही इस विशाल विश्व को करीब ला रक्खा है।
इतिहास : और वह कैसे?
विज्ञान : हवाई जहाज़, टेलिफोन, टेलिग्राम, टीव्ही, विडिऒ, और अब इंटरनेट। विज्ञान ने लोगोंको ना केवल ज्ञान दिया है, बल्कि उनका मनोरंजन भी किया है। अब कौन इन्कार कर सकता है कि विज्ञान ही सबसे महत्त्वपूर्ण है? ना कि इतिहास ...
भूगोल : विज्ञान, तुम बिल्कुल सच बोल रहे हो --
विज्ञान : धन्यवाद ... धन्यवाद ...
भूगोल : तुम सच बोल रहे हो कि इतिहास सबसे महत्त्वपूर्ण नहीं। लेकिन तुम गलत बोल रहे हो कि तुम, विज्ञान, सबसे महत्त्वपूर्ण हो।
विज्ञान : क्या मतलब? मुझसे ज़्यादा महत्त्वपूर्ण कौन हो सकता है?
भूगोल : (गर्वसे) मैं --- भूगोल।
इतिहास : यह क्या मज़ाक है?
भूगोल : इतिहास, मुझे कहींसे जलनेकी बू आ रही है। मेरी तो यह समझमे नही आता कि इतिहास और भूगोल को एक साथ क्यों रखा जाता है? इतिहास के अस्तित्वमे आनेसे कई पहलेसे मैं यहांपर हूं। मैं ही तो सबको विश्वके बारेमें जानकारी देता हूं। अलग-अलग प्रांत और वहांके हालातके बारेमे मैं ही तो सबको बताता हूं। अब इसमे ज़रा भी शक नहीं कि भूगोल ही सबसे महत्त्वपूर्ण है।
गणित : क्षमा चाहता हूं। बहुत देरसे मैं चुपचाप आप सबकी बकवास सुन रहा हूं। सच कहूं तो आपके इस मूर्ख वादविवादोंमे मुझे ज़रासी भी दिलचस्पी नहीं थी। लेकिन ज़्यादा देर चुप रहना भी कठिण था। आखिर इस संसारमे सिर्फ मैं ही सही मापदण्ड हूं सच और झूट का
विज्ञान : (गुस्सेमे) यह तुम कैसे कह सकते हो? क्या तुम नहीं जानते कि मैं विज्ञान हूं?
गणित : जानता हूं, जानता हूं। भलीभांति जानता हूं। लेकिन शायद तुम यह भूल गये हो कि विज्ञान को भी गणित की मदद लेनी पडती है। इसके बादही विज्ञान किसी निर्णयपर पहुंच सकता है। मेरे बगैर सब कुछ बेकार है। जानते हो, एक शून्यके लगाने या हटाने से साम्राज्य बन या टूट सकते हैं। इस बातका तो इतिहास साक्षी है।
इतिहास : भाई, इसी बातको तो मैं दोहरा रहा हूं। इतिहास सबका साक्षी है। इतिहास नहीं तो कुछ भी नहीं। पूरे विश्वका आरंभ ही इतिहास से होता है।
भूगोल : मित्र, तुम गलत हो। विश्वका इतिहास आरंभ होने के लिये पहले विश्वका होना ज़रूरी होता है। और मैं -- भूगोल ही -- विश्व की जानकारी देता हूं।
( फिरसे सब एक साथ चिल्लाने लगते हैं। फिरसे वही तीखी आवाज़ आती है, "चुप हो जाओ।" सब शांत हो जाते हैं। )
सब : यह कौन बोला?
( एक छोटीसी लडकी, भाषा, सामने आती है। )
भाषा : मैं बोली। कोई शक?
सब : तुम कौन हो?
भाषा : (मुस्कराकर) क्या, तुम सब मुझे भूल गये?
इतिहास : अरे, हम तुम्हे जानते ही नहीं ---
भूगोल : --- तो तुम्हें भूलने का सवाल ही नहीं उठता!
भाषा : मैंने तुम सभी को जन्म दिया।
विज्ञान : तुमने? और हमें जन्म दिया? ज़रा सुनो तो इसकी बकवास!!
( सब ठहाका लगाकर हंसने लगते हैं। )
भाषा : हंसो नहीं। यह पूर्णत: सच है कि मैने ही तुम्हें जन्म दिया है। सब लोग तुम्हें जानते हैं तो सिर्फ मेरे कारण।
गणित : यह कैसे हो सकता है? तुम तो इतनी छोटी लगती हो। ऐसे लगता है कि अभी तुम्हारे दूध के दांत भी नहीं गिरे।
विज्ञान : तुम हमें कैसे जन्म दे सकती हो?
इतिहास : इतने पुराने इतिहास को?
भूगोल : इतने लंबे-चौडे और विशाल भूगोल को?
भाषा : (हंसते हुए) यही तो मेरे बारेमें सबसे मज़ेकी और रहस्यपूर्ण बात है। मैं सैंकडो, हज़ारों साल पुरानी हूं -- और फिर भी जवान हूं -- नईनई सी -- ताज़ा और हरीभरी!
इतिहास : देखो, बहुत हुआ। अब यह घुमाफिराकर बोलना बस करो, और यह बताओ कि तुम हो कौन।
भाषा : मैं भाषा हूं -- मैंने ही तुम सबको जन्म दिया। मैंही सबका माध्यम हूं। यह पूरा विश्व तुम्हें और तुम्हारे विषयमे जानता है क्योंकि मैं, भाषा, तुम्हें जन्म देती हूं। भाषा के आविष्कारसे ही दुनियामे सारा व्यवहार सरल हो गया है।
गणित : वह कैसे?
भाषा : ध्यानसे सुनो। इतिहास, भूगोल, विज्ञान, गणित हो या कोई और विषय हो, भाषा ही तो सबको जन्म देती है। मैं समय के साथ बडी होती हूं -- जैसेजैसे मानवजाति विकसित होती है वैसेवैसे मेरा भी विकास होता रहता है। और इसीलिये मै जितनी पुरानी होती हूं, उतनी ही नई रहती हूं। कुछ आई बात समझमें?
गणित : दोस्तों, मैं सोचता हूं कि इसकी बातमे दम है, सच्चाई है। ज़रा सोचो, भाषा है, इसीलिये तो लोग हमें जानते हैं, पहचानते हैं।
भाषा : सच कहा, मित्र। अगर मैं ना होती तो तुम सबको कौन जानता और कौन पढता? तो मानते हो कि मैं सबसे महत्वपूर्ण हूं?
इतिहास : यह बात भले ही गणित मानता हो, मैं नही मानता।
भाषा : (आश्चर्यसे) नहीं मानते?
भूगोल : मैं इतिहासके साथ हूं। मैं भी नहीं मानता।
विज्ञान : मैं भी नहीं मानता।
( सब एक साथ चिल्लाने और लडने लगते हैं। तभी अंदरसे एक लडका आता है और उन सबको रोकनेकी कोशिश करता है। )
लडका : आप सब शांत रहिये। मेरी बात सुनिये।
इतिहास : अब तुम कौन हो?
भूगोल : और कहांसे आये हो?
सब : आखिर हो कौन तुम?
लडका : मैं एक विद्यार्थी हूं। मेरी मानो तो तुम सब सही हो ... और सब गलत भी हो।
भाषा : मूर्ख बालक, कोई एक ही समय सही और गलत कैसे हो सकता है? क्या तुम अपनी भाषा भूल गये हो?
लडका : (मुस्कराकर) नहीं, मैं अपनी भाषा नहीं भूला। मैं अपनी भाषाको और तुम सबको अच्छी तरह जानता हूं। सच बात तो यह है कि हम विद्यार्थियों के लिये सभी विषय महत्त्वपूर्ण होते हैं। और दूसरी सच बात यह भी है कि अब सिर्फ तुम ही नहीं हो ...
सब : क्या मतलब?
लडका : मतलब यह कि दुनिया अब बहुत आगे निकल चुकी है। मानव बहुत तरक्की कर चुका है और तरक्की कर भी रहा है। इन सब पुराने विषयोंके साथसाथ कई नये विषय भी आ गये हैं।
सब : जैसे?
लडका : जैसे कम्प्युटर, पर्यावरण, संगीत, नाट्य, चित्रकला और इतने सारे कि जिनके नाम भी मुझे इस वक्त याद नहीं आते। जैसे मैंने अभीअभी कहा, मानव बहुत तरक्की कर चुका है। और हमें चाहिये कि हम समय के साथ साथ कदम मिलाकर चलें। अगर हमनें ऐसा नहीं किया तो हमारा ज्ञान अधूरा रह जायेगा।
गणित : मैंने पहलेही कहा, तुम सच बोल रहे हो। मैं मानता हूं तुम्हारी बात।
लडका : हम विद्यार्थियोंको सभी विषय मन लगाकर पढने चाहिये। यहि सच्चा ज्ञान है। और एक मज़ेकी बात कहूं? कईं बार मन ऊब जाता है और पाठशाला छोडकर भाग जानेको दिल करता है। लेकिन अगले क्षण ही समझमें आता है कि आजके युग की यही ज़रूरत है। इसीलिये अब लडना बंद करो और अपनीअपनी जगह बैठ जाओ।
( धीरेधीरे सभी विषय अंदर चले जाते हैं और कुछ देर के लिये रंगमंचपर कोई नहीं होता। जब धीरेधीरे उजाला होने लगता है, तो एक लडका अपनी टेबलके सामने बैठा ऊंगता दिखाई देता है। उसके सामने बहुत सारी किताबें बिखरी पडी हुई हैं। इतने मे उसके पिताजी/माताजी/बडा भाई आते हैं और उसे जगाते हैं। )
व्यक्ति : जाग जाओ, जाग जाओ।
लडका : (आंखे मलते हुए जागता है) क्या मैं सो गया था?
व्यक्ति : हां, तुम सो गये थे और नींद मे कुछ बडबडा भी रहे थे। क्या तुमने कोई सपना देखा?
लडका : (हंसते हुए) हां, मैने एक बडा ही अज़ीब सपना देखा। हमारी हिंदी के अध्यापकजी ने हमें एक निबंध लिखनेके लिये कहा था। विषय है, "मेरा प्रिय विषय"।
व्यक्ति : तो तुमने क्या सपना देखा?
लडका : यही कि सारे विषय मेरे सपनेमें आकर आपसमें लडझगड रहे थे कि कौनसा विषय सबसे महत्त्वपूर्ण है।
व्यक्ति : तो तुमने क्या देखा? जो भी देखा हो, चलो, अब जागने का समय हुआ है। एक बात गांठ बांध लो, सिर्फ वही इन्सान तरक्की कर सकता है जो देखे हुए सपनॊंको जागृत रूप देनेकी चेष्टा करे।
लडका : तुम सच कह रहे हो। अब मैं जल्दीसे अपना निबंध लिख देता हूं और पाठशाला जानेकी तैयारी करने लगता हूं।
( लडका उठकर अपनी बिखरी हुई किताबें समेटने लगता है। धीरेधीरे पर्दा गिरने लगता है। )
लेखक
लक्ष्मीनारायण हटंगडी
EC51/B104, Sai Suman CHS,
Evershine City, Vasai (E)
PIN 401208
(E-mail: suneelhattangadi@gmail.com)
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