घडीमे दस बज रहे थे । दफ़्तरकी लडकियोंने एकसाथ मुडकर दरवाज़ेकी तरफ़ देखा -- वह अपनी गर्दन झुकाये अंदर आ रहा था । सब एक दूसरेकी तरफ़ देखकर व्यंगसे मुस्कराने लगीं । वह पास आया और उनकी तरफ़ न देखते हुए वहाँसे गुज़रा । सब धीमी आवाज़मे खुसरफुसर करने लगीं ।
"अपने आपको पता नही क्या समझता है?"
"बडा snobbish है ।"
"कभी मुस्कराता भी नहीं ।"
"बडा छुपा रुस्तम है । सिर्फ़ अपने आपको भोला बताता है ।"
"क्या दुनियामे कभी किसीकी बीवी कभी मरी ही नहीं?"
यह आखरी बात शायद संजीवने सुन ली । उसने धीरेसे अपनी फ़ाइल बंद की और उस लडकीकी ओर देखा जिसने यह बात कही थी । अब सब चुपचाप हो गईं । संजीवकी आँखॊंमे एक गहरीसी उदासी छाई हुई थी । जबभी उसकी बीवीका ज़िक्र आता, वह पहलेसे ज़्यादा गंभीर हो जाता था, जैसे उसके नीजी दर्दको किसीने ज़बरदस्ती बाज़ारमे बिछा दिया हो । वह सब कुछ भूल जाना चाहता था, लेकिन ज़माना उसे अकेला छोडना नही चाहता । वह आतेजाते हमेशा इन लडकियोंके ताने सुनता था । उसने फिरसे अपना काम शुरू किया । फिर एक बार लडकियोंकी झुकी हुई गर्दनें ऊपर उठ गईं ।
"बेचारा..."
"अरी, उसे बच्चोंसे बहुत प्यार था ।"
"शायद इसीलिये ईश्वरने उससे उसकी बीवी और बच्चा दोनोंको छीन लिया ।"
"क्या तुमने कभी उसे यहाँ देखा है?"
"किसे?"
"अरे पगली, संजीवकी पत्नीको । मैने तो उसे कभी यहाँ नही देखा ।"
"डेढ सालमे ही अपनी बीवी-बच्चेको खा गया ।"
"श्श.. बॉस आ रहे हैं। चुप बैठो ।"
"Good morning -- one minute please. मिस्टर संजीव सेन, कॉल फ़ॉर यू ।"
संजीवने फोन उठाया -- "संजीव बोल रहा हूँ ।"
"मैं सुनिता ।"
"देखो, मैने तुमसे पहले भी कहा है, मैं तुमसे बात नही करना चाहता । आईंदा दोबारा मुझे फोन मत करना ।" बोलतेबोलते संजीवकी आवाज़ ऊँची हो गई और सब लोग अजीबसे चेहरे किये उसकी ओर देखने लगे । वह पसीनेसे लथपथ हो रहा था । लडखडाते कदमोंसे वह अपने टेबलके पास आ गया । उसकी यह हालत देखकर प्रकाश उसके पास आया । प्रकाशका हाथ कँधेपर पडतेही चौंककर संजीवने पीछे देखा और मुस्करानेकी नाकाम कोशिश की ।
"क्या हुआ, संजीव?"
"प्रकाश, सुनिताका फोन था ।"
"तुम्हारी यह हालत देखकर मैं समझ गया था । आखिर वह चाहती क्या है?"
"मैं नहीं जानता," संजीवने अपना पसीना पोंछते हुए जवाब दिया ।
"शायद मैं जानता हूँ । कल मेरे नाम भी उसका फोन आया था ।"
"क्या कह रही थी वह?"
"वह तुमसे अपनी ज़िंदगीके बारेमे बात करना चाहती है ---"
थोडी देरके लिये प्रकाश सोचता रहा । फिर उसने कहा, "संजीव, तुमने बडी गलती की । क्यों सबकॊ बोलते रहे कि तुम्हारी बीवी बच्च्चेको जन्म देकर मर गई?"
"तुमही बताओ, प्रकाश, और क्या करता मैं?"
"और कुछ भी कह देते । लेकिन उसके मर जानेकी यह बात? ओफ, अगर किसीको शक हो गया तो?"
"किसीको शक नहीं होगा ।"
"संजीव, मैं समझता हूँ कि फिर भी तुमने ठीक नही किया ।"
"प्रकाश, क्या ठीक है और क्या गलत इसका फैसला कौन करेगा? और वह जो मेरे जीवनसे खेल रही थी, क्या वह ठीक था?"
संजीवकी आँखोमें आँसूं भर आये । "क्या था मैं, और क्या बन गया हूँ आज?", संजीव उदास मनसे सोच रहा था । उसकी ज़िंदगी एक ऐसा सवाल बनकर उसके सामने खडी थी, जिसका उसके पास कोई जवाब नहीं था । जिन आँखॊंमे हमेशा एक ज़िंदा मुस्कराहट झलकती थी, उन्हीं आँखोंमे आज अक्सर एक अनकहा दर्द भरा रहता था । जिस पत्नीसे कभी उसने बहुत प्यार करना चाहा था, उसके मौतकी खबर सबको देते हुए उसके दिलपर भारी बोझसा रहता था । लेकिन वह मजबूर था । जो औरत उसके जीवनसे अचानक गायब हो गई उसके बारेमे वह और कहता भी क्या? और किस किससे? जबभी उसके बीवीकी बात छिडती तो वह दर्दभरी आवाज़मे कह देता, "मेरी बीवी मेरे बच्चेको जन्म देते वक्त मौतका शिकार हो गई । दोनों नही बचे ।"
यह बात सुनकर लोग दंग रह जाते थे । इस दुर्भाग्यपर संजीवसे सब हमदर्दी जताकर चल देते थे । कभी किसीको कोई शक नही होता । संजीव यह बात इतनी गंभीरतासे कहता कि कईं बार उसे अपने आपको इस बातपर विश्वास होने लगता । अपने इस अनूठे दु:खका हर पल जीनेकी वह क्षमता रखता था । अपने इस नये जीवनकी उसे आदत सी हो गई थी, जब सुनिताके फोनने उसे बेचैन कर दिया । आखिर यह औरत उससे चाहती क्या थी?
उस शामको संजीव घर जानेके बजाय क्लबमे पहुँचा । जातेही उसके सब दोस्तोंने उसे घेर लिया । आज संजीव बहुत समयके बाद क्लबमे आया था । सब उससे हमदर्दी जता रहे थे । संजीवके बीवी की मौतकी खबर कहींसे उनके कानोंपर पडी थी । सब उसे घेरे हुए थे । इतनेमे जॉनीकी आवाज़ सुनाई दी, "धत साले, झूठा कहींका ।" संजीवने मुडकर देखा, नशेमे धुत जॉनी उसीकी ओर आ रहा था ।
"अबे साले, तूने मुझसे झूठ बोला । मुझसे दगाबाज़ी किया । लायर ..."
संजीव कुछ समझ नही पाया । सब जॉनीका मज़ाक उडाने लगे । जॉनी ने सबको दूर हटाकर संजीवकी पीठपर हाथ मारा ।
"साले, तू बडा दगाबाज़ है ।"
"जॉनी, आखिर हुआ क्या? ज़रा बताओ भी ।"
"तू तो कह रहा था कि तेरी बीवी दो महीने पहले मर गई ..." जॉनी और कुछ कहनेवाला ही था कि संजीवने झटसे उसका मुँह बंद किया और खींचकर उसे एक कोनेमे ले गया । संजीव पीता नही था लेकिन उसने सुना ज़रूर था कि शराबके नशेमे लोग बहुत सारा सच उगल जाते हैं । वह हाथ जोडकर बोला, "जॉनी, उसका ज़िक्र यहां मत करो, प्लीज़ ।"
जॉनीने झटसे संजीवका हाथ हटा दिया और वह चिल्ला उठा, "क्यों ना करूं? साला, तू लायर है । दोस्तोंसे भी झूठ बोलता है और फिर उनको चुप रहनेको बोलता है ... हाथ जोडनेका नाटक करता है । साला, तू तो कह रहा था कि तेरी वाइफ़ और बच्चेको मरे हुए दो महीने हो रहे हैं ..."
संजीव अपना सर पकडे एक कोनेमे बैठ गया । पता नही जॉनी और क्या क्या बक देता? एक शराबीका मुँह भला कौन बंद कर सकता है? संजीवको चुपचाप बैठा देखकर उसका एक दोस्त उसके पास आया और अपना हाथ उसके कंधेपर रखकर बोला, "संजीव, तू जॉनीकी फ़िक्र मत कर -- उसको आज कुछ ज़्यादा चढ गई है । मैं जानता हूँ, तुम्हे तुम्हारे अपनोंकी याद सता रही है । लेकिन यह शराबी ..."
वहाँ वह शराबी ज़ोरज़ोरसे बोले जा रहा था, "साला झूठ बोलता है दोस्तोंसे । कहता है कि बीवी मर गई । एकदम नॉनसेन्स बोलता है । परसो शामको मै उसको स्टुडिओमे देखा, साला हीरोईनका मेक-अप कर रहा था । " जॉनीकी यह बात सुनकर सब ठहाका मारकर हँसने लगे । "जॉनीको बहुत ज़्यादा चढ गई है -- उसे मरे हुए लोग भी दिखाई देते हैं । पगला कहींका !"
लेकिन संजीव उस शराबी पागलकी बातोंसे डरा हुआ एक कोनेमे बैठा हुआ था । उसके चेहरेका रंग ऐसे उड गया जैसे उसने अभी अभी किसी भूतको देखा हो । वह चुपचाप सामने घूर रहा था ... अपने अतीतकी ओर ।
* * * * *
वह सामने घूर रहा था, अपने भविष्यकी ओर । उसकी नन्ही आँखोमे टूटे हुए सपनोंका रंग बिखरा हुआ था । एक कोनेमे बैठी उसकी माँ रो रही थी । वह सोच रहा था, आखिर लोग शादी क्यों करते हैं? क्या शादीका मतलब यही है? जब भी वह अपनी माँके साथ किसी शादीमे जाता, वहाँकी भीड और हँगामा देखता तो उसकी भोलीभाली आँखोके सामने एक शैतान आ जाता, जो दिनरात अपनी बीवीपर चिल्लाता रहता । बिना वजह उस गरीबको पीटता । नन्हे संजीवने बस शादीका यही रूप देखा था । वह बडी देरतक सोचता रहता, लेकिन उसे कोई जवाब नही मिलता ।
"माँ, बाबा तुमसे प्यार नही करते?"
कोई जवाब नही ।
"माँ, बाबा तुम्हे कहाँ मिले?"
"हमारे गाँवमे -- उन्होंने मुझे देखा और पसंद किया ।"
"और मैं तुम्हें कहाँ मिला?"
"तुम मुझे मिले नही... मैने तुम्हे जन्म दिया । नौ महीने यहाँ अपने पेटमे रखने के बाद ।"
"माँ, मैं इतना बडा, तुम्हारे इतने छोटेसे पेटमे कैसे समाया? और जन्म देना क्या होता है?"
संजीवके सवाल कभी खत्म नही होते थे । वह पूछता रहता ।
"माँ, यह घर, यह सामान हमें कहाँसे मिला? क्या बाबा इसे साथ लाये? यहाँसे हम कहाँ जायेंगे? क्या ये सब चीज़ें हम अपने साथ ले जायेंगे?"
"संजीव, बस भी करो. मै तंग आ गई हूँ तुम्हारे इन सवालोंसे ।"
थोडी देर चुप रहनेके बाद उसके सवालोंका सिलसिला फिर शुरू होता । जब अपनी माँसे डाँट मिलती तो अपने अनगिनत सवाल वह अपनी बहनसे करने लगता ।
"दीदी, बाबा माँसे प्यार नही करते?"
"तुमसे किसने कहा? करते हैं ।"
"तो फिर वह मम्मीको डाँटते क्यों रहते हैं? मारते क्यों है उसे? और अगर वह माँ से प्यार नही करते, तो फिर उन्होंने माँ से शादी क्यों की? शादीके बाद मारनेका हक मिलता है का? मैं कभी शादी नहीं करूँगा । तू करेगी शादी?"
अंजना अब युवावस्था की ओर कदम बढा रही थी । वह शर्मसे चूरचूर हुई । उसने संजीवको एक हलकीसी चपत मारी और कहा, "सुन, तू अभी बहुत छोटा है । ये बातें अभी तेरी समझमे नही आयेगी ।" संजीवके बहुत ज़िद करनेपर वह आगे बोली,
"पगले, शादी एक ही ऐसा रिश्ता है जो सबसे बडा होता है । बाकी रिश्तोंपर हमारा कोई ज़ोर नही होता क्योंकि हम उन्हे चुनते नही । वे रिश्ते बस हमसे जुड जाते हैं । मम्मी और पापा की शादीके बाद ही तो तुम पैदा हुए । और मम्मी तुमसे प्यार करने लगी । शादी हम उसीसे करते हैं जिसे हम जानते हैं, चाहते हैं और प्यार करते हैं ।" संजीवकी समझमे कुछ नही आया -- अपनी दीदीकी बातें सुनते सुनते वह सो गया ।
दिन बीतते गये । संजीवकी माँ अक्सर दुखी रहती थी । और पता नही क्यों, संजीवके दिलमे भी एक अजीबसा डर छिप गया था । वह कभी खुलकर बात नही करता, कभी मुस्कराता नहीं । उस घरकी कैदमे आज़ाद दिलसे कुछ भी तो नही कर पाता वह ! उसे वहाँ घुटनसी महसूस होती थी, फिर भी वह जी रहा था । और क्यों नही? उसकी प्यारी माँ भी तो वहीं जी रही थी ... एक ऐसे इन्सान के साथ जो उससे कतई प्यार नही करता था । एक ऐसे इन्सानके साथ, जिससे उसका सिर्फ़ शादीका रिश्ता था । यह संबंध तोडे क्यों नही जा सकते? जिस समाजके डरसे यह शादीका रिश्ता, आपसमे प्यार न होते हुए भी, निभाया जा रहा था, वह समाज आखिर चीज़ क्या थी?
कईं बार संजीव गुस्सेमे आकर अपनी माँ से कहता, "चलो माँ, हम यहांसे कहीं दूर चले जाते हैं । तोड ही दो यह रिश्ता । हम कोई नया घर बसायेंगे ।" लेकिन शायद उसकी माँ उस भयानक समाजसे डरती थी... शायद उसे अपने छोटे बच्चोंकी फिक्र थी ... या फिर हो सकता है कि ना चाहते हुए भी वह यह रिश्ता बनाए हुई थी । इस तमाशेसे तंग आकर कई बार संजीव अपने आपसे कहता, "मैं ऐसी शादी कभी नहीं करूंगा । जिस शख्स से मेरी ज़रा भी न बनती हो, उससे मैं निभाऊंगा कैसे? क्या शादी समाजके ठेकेदारोंकी दी हुई ऐसी ज़ंजीर है जो कभी टूट ही नहीं सकती? आखिर क्या मतलब है ऐसी शादीका? जो रिश्ता इन्सान खुद चुनता है क्या वह इतना घिनौना हो सकता है?"
इन्हीं सवालोंके जवाब तलाश करते हुए संजीव बडा होता गया । जो आज़ादी उसे अपने घरकी चार दीवारोंमे न मिल सकी थी, उसे वह घरके बाहर पानेकी कोशिश करता रहता । उसके जैसे दो अलग-अलग रूप थे । अपने घरमे वह प्यारसे महरूम, मायूस रहता तो घरसे बाहर हमेशा मुस्कराता रहता । वह जहाँ भी जाता, खुशी छा जाती । घरके सभी रिश्तोंमे वह विश्वास खो चुका था । अपना खोया हुआ बचपन वह खुले आसमान की छाँव तले ढूँढता । वह रोज़ नये रिश्ते ढूँढता रहता । जो रिश्ता इन्सान खुद अपनी मर्ज़ीसे जोड सके ऐसे दोस्तीके रिश्तेको वह सबसे अहम मानता । उसकी नज़रोंमे बाकी सभी रिश्ते बेमतलब और बेमानी थे । वह अक्सर घरसे बाहर रहता । जो प्यार उसे अपने घरमे नसीब न हुआ, वही प्यार उसे घरके बाहर बिना किसी शर्तॊंके मिलता । संजीवको हमेशा ऐसे साथियोंकी तलाश रहती जो बिना कोई सवाल पूछे उसे पूरी तरह स्वीकार करते ।
कईं बार वह महसूस करता कि उसके तलाशकी कोई मंज़ील ही ना हो । कईं बार भीडमे होकर भी वह अपने आपको अकेला महसूस करता । जैसे सारी दुनिया उसके साथ हो, लेकिन उसका अपना कोई ना हो ।फिर नये रिश्ते जुडते रहते । हर बार उसे लगता कि हर नये रिश्तेसे दिलका खाली कोना भर जायेगा । नये रिश्ते पुराने हो जाते, दिलका खाली कोना और भी ज़्यादा गहरा होता जाता । रह जाता एक नया दर्द । जब भी यह दर्द उसे सताता, तो संजीव सागर किनारे जा बैठता । सागरकी उठती-मचलती लहरोंमे उसे जीवनका संगीत सुनाई देता । कई बार वह चाहता कि अपने आपको सागरके हवाले कर दे और जीवन-संगीतका असली मतलब ढूँढ ले । लेकिन जितना वह ज़िंदगीसे उकता गया था, उतना ही मौतसे डरता था । जब भी वह मौतके बारेमे सोचता तो उसे वह अजीबसा सपना याद आता जो उसे अक्सर रातोंको जगा देता था । वह देखता कि अपनीही लाश उठानेके लिये चौथे आदमीकी तलाशमे वह यहाँवहाँ घूम रहा है ।
क्या सचमुच वह इतना अकेला था कि उसे अपनी लाश उठानेके लिये भी कोई न मिलता हो? वह चाहता कि किसीके लिये वह कुछ करे जिससे वह अपने आपको भूल जाये । उसे महसूस हुआ कि सभी लोग उसकी तरह नहीं थे । उसने महसूस किया कि सिर्फ बच्चे ही दोस्तीमे सब कुछ भूल जानेकी क्षमता रखते हैं ... बिना किसी मतलबके खुलकर हँसते-मुस्कराते । हँसीका खज़ाना पूरी तरह कोई लूटा सकता हो तो वे सिर्फ बच्चे ही थे । क्यों न हम बडे लोग इन बच्चोंकी तरह हमेशा हँसते रहे? मासूम बच्चोंको दुनिया भुलाकर हँसते-खेलते देख वह अपने सारे गम भूल जाता । उनके खिलते हुए बचपनमे वह अपने खोये हुए बचपनकी तलाश करता । कईं बार लोग "चाचा नेहरू" कहकर उसका मज़ाक उडाया करते । लेकिन उसने कभी इस बातकी परवाह न की ।
इस बीच उसकी बहन अंजनाकी शादी तय हुई । बाज़ारमे रक्खे गये बिकाऊ चीज़ोंकी तरह नुमाईश करानेके बाद किसी अन्जान शहरके एक अन्जान आदमीके साथ अंजनाका ब्याह तय हो गया । उसके पिताके अज़ीब स्वभावके कारण कईं बार अंजनाकी शादी होते होते टूट जाती थी । "जिस आदमीको मैं जानती हूँ, जिसे मैं प्यार करती हूँ, उसीसे शादी करूँगी" इस बातको बारबार दोहरानेवाली अंजना एक बिलकुल अजनबी के साथ शादीके बंधनोंमे बंध गयी । संजीवके बसमे होता तो वह कभी अपनी प्यारी बहनको उस अन्जान आदमीके साथ जाने न देता ।
शादीके सिर्फ एक साल बाद अंजना अपने घर वापस लौट आई । उसके सपनोंका महल चूरचूर हो गया । किसी कारण उसे पता चला कि उन दोनोंका निबाह होना मुमकीन नही था । जो कदम उठानेकी हिम्मत उसकी माँ मे नही थी, वह हिम्मत अंजनाने दिखाई । शादीका रिश्ता ठुकराकर वह वापस तो आ गई, लेकिन समाजके ठेकेदारोंके ताने सुनसुनकर वह मनही मनमे सहमा गई थी । जिस उम्रमे अंजनाका घर बसना चाहिये था उस उम्रमे उसका उजडा हुआ आशियाना देखकर संजीवका दिलभी टूट गया । अबतक वह शादीके कईं घिनौने रूप देख चुका था ।
एक तरफ़ वह शादीके नामसे भी नफ़रत करता, तो दूसरी तरफ़ दिल ही दिल में चाहता था कि जिस प्यारका अनुभव वह अपने पिताके हाथों खुद नही कर पाया था, वही प्यार वह अपनी औलादको दे । और इसके लिये उसे शादी तो करनी ही पडती ना? उसे यकीन था कि उसे कोई ऐसा साथी ज़रूर मिलेगा जो बिना किसी शर्तके उसे अपना लेता ।फिर चाहे वह साथी अच्छाबुरा जैसा भी हो, उसे वह स्वीकारेगा । आखिर इसीको तो प्यार कहते होंगे ना?
संजीव समझ गया था कि हर इन्सान किसी न किसी तरह अधूरा होता है । वह अपनी पत्नीको, फिर चाहे वह जैसी भी हो, -- उसकी अच्छाईयों और बुराईयोंके साथ स्वीकार करेगा । वैसेभी पूर्ण इन्सानकी तलाश कभी पूरी ही नही होती । उसे चाहिये कि वह हर हालमे मुस्कराता रहे । मुस्कराकर अपने अंदरका दर्द छुपाकर दुसरोंको खुशी दे । खुद दु:ख सहकर भी दूसरोंको खुश रखनेमे संजीव अजीबसी खुशी महसूस करता । उसके चेहरेकी खुशी उसकी सबसे कीमती दौलत थी ।
"जोकर आया, जोकर आया ।", चिल्लाकर सभी बच्चे संजीवकी ओर दौडे । जोकर भी अपनी टेढी चाल चलते हुए उन बच्चोंकी ओर दौडा । दौडते-दौडते वह पैर फिसलकर गिरा तो सब बच्चे उसके इर्दगिर्द जमा हो गये । जोकर रोने लगा तो बच्चे ज़ोरज़ोरसे हँसने लगे । बच्चोंको हँसते देखकर जोकर भी हँसने लगा । बच्चोंने मिलकर उसे उठा लिया और वे सब आनंदबज़ारमे घूमने लगे । कोई उसकी टोपी खींचता, कोई उसकी पीठपर मारता, तो कोई उसे पत्थर मारता -- फिर भी जोकर हँसता रहता, सबसे हाथ मिलाता, सबको गले लगाता ।
यहींपर सुनिताने पहली बार संजीवको देखा । वह अपनी सहेली मायाके साथ वहां आई थी । संजीवको हँसतेखेलते देख उसने मायासे पूछा, "कौन है वह जोकर?"
"हूँ... लगता है जोकर तेरा दिल ले गया ! अरी, तू तो बंदरिया दिखती है । अब इस जोकरको लेकर एक सर्कस शुरू कर दे । अच्छा खेल जमेगा" ।
मायाकी यह सीधी बात सुनिताको शूलकी तरह चुभी । मायाने शायद मज़ाकमे यह बात की हो, लेकिन सुनिता अपने आपपर हँस भी नही सकती थी । अपने काले रंगका ज़िक्र सुनकर वह कुछ देरके लिये चुप रह गई । मायाने फिर उसे छेडते हुए कहा, "ए बंदरिया, मै उस जोकरको बहुत अच्छी तरह जानती हूँ । कहो तो, ’इण्ट्रो’ दूँ?" फिरसे सुनिताके चेहरेपर हँसी छा गई । भीड निकल चुकी तो माया सुनिताको संजीवके पास ले गई "इण्ट्रो" देनेके लिये । अबतक संजीवने मुँह धो लिया था । जोकरके रंगीन चेहरेके पीछे छिपा हुआ उसका असली चेहरा सुनिताको पहली नज़रमे भा गया । उसने संजीवसे बातें करनेकी कोशिश की, लेकिन वह चुप था ।अपनी मीठी ज़बानसे सब बच्चोंका दिल जीतनेवाला संजीव बडोंसे बातें करनेमे झिझकता था । और फिर एक लडकीसे?
जब वह कॉलेजमे पढ रहा था तब भी उसे एक लडकीसे प्यार हुआ था ।उसने बहुत चाहा कि धीरज बँधाकर वह अपना प्यार जताये । लेकिन लडकी अमीर थी और उसे डर था कि कहीं वह इस रिश्तेसे इन्कार न कर दे । उसने हिम्मत ही नही की और सब कुछ शुरू होनेसे पहलेही खत्म हो गया । अब तो उसे यह भी पता नही था कि वह कॉलेजेवाली लडकी कहाँ और किस हालमे होगी । और यहाँ यह लडकी है जो मुझसे बात करना चाहती है... जानपहचान बढाना चाहती है ! संजीव मन ही मन खुश हुआ कि कोई उसे चाहने लगा था । इस अहसाससे संजीव खुश था किसीने उसे चुन लिया था । क्या इसीको प्यार कहते है ? क्या बाबाने माँ को इसी तरह देखकर चुन लिया था?
उसने झुकी हुई नज़रोंसे सुनिताको देखा । उस लडकीमे कोई भी बात ऐसी नही थी कि जो किसीका मन मोह ले । उसे अपनी बडी बहनका ख्याल आया । शायद इसे भी किसी कारण रिश्ता जोडनेमे दिक्कत होती होगी, जैसे अंजनाको हुआ करती थी । कितनोंने इसके बाहरी रूपको देखकर इससे शादी करनेसे इन्कार किया होगा । अगर मैं भी ऐसा करूं, तो उन लडकोंमे और मुझमे फर्क क्या रहा? मैं तो औरों जैसा नही हूँ, फिर ये कैसी बातें सोच रहा हूँ? अंजनाका जन्म एक ऐसा इत्तेफ़ाक था जिसपर उसका कोई बस नही था, फिर भी लोग उसे ठुकराते आये थे क्योंकि वह एक ऐसे आदमीकी बेटी थी जो दुनियाकी नज़रोंमे बुरा था । तो क्या सुनिताके साथ भी वैसाही होगा जैसा अंजनाके साथ हुआ था? इसेभी दुल्होंके बाज़ारमे एक बिकाऊ चीज़की तरह नुमाईशपर रक्खा जायेगा? इसेभी लोग देखने आयेंगे और ठुकराएंगे, सिर्फ इसलिये कि वह खूबसूरत नही थी? लेकिन अपने खूबसूरत या बदसूरत होनेपर किसका बस होता है? वह खुद तो ज़िम्मेदार नही थी इस बातके लिये? संजीवने सोचा, जब मै शादी करूँगा तो ऐसी छोटीछोटी बातोंपर बिलकुल ध्यान नहीं दूँगा ।
कुछ दिनॊं बाद सुनिताके घरवाले उसका रिश्ता लेकर संजीवके घर आये तो कुछ देरके लिये वह सोचमे पड गया । सारे जीवनभरका सवाल इतनी जल्दी सिर्फ हाँ या ना मे देना इतना आसान तो नही था । वह ना सुंदर थी ना ही ज़्यादा पढीलिखी । वे एक दूसरेको ठीकसे जानते भी नही थे । संजीवके सोचनेका ढंग बिलकुल अनूठा था । क्या यह लडकी उसे समझ पायेगी? क्या संजीव उसे प्यार कर पायेगा? दूसरे पल वह सोचता, आखिर प्यार किस चिडियाका नाम है? बस वह एक भावना ही तो है । पति-पत्नी एक साथ रहेंगे, एक दूसरेको समझने लगेंगे, जान जायेंगे, तो फिर प्यार अपने आप हो ही जायेगा । क्यों न मैं इस लडकीको "हाँ" कह दूँ, जिसने मुझे चुन लिया है । रिश्तेकी बात छेडने आये हैं तो उन्होंने पूछताछ तो की ही होगी । जब इसने मेरेलिये "हाँ" कह दी है तो "ना" कहनेवाला मैं कौन होता हूँ? संजीवने झटसे रिश्ता कबूल किया ।
जल्दही सुनिताके घरवाले सगाईकी तारीख तय करनेके लिये संजीवके घर आये । पता चला कि सुनिताके पिता संजीवके पिताजीके दोस्त थे । संजीवके सगाईकी बात जल्दही सब जगह फैल गयी । सगाईके दिन अंजनाकी एक सहेली वहाँ मौजूद थी । उसने धीरेसे अंजनाके कानोंमे कुछ कहा । अंजनाने संजीवको अपने पास बुलाकर उससे पूछा, " संजीव, ज़रा यहाँ तो आओ ।"
"क्या बात है, दीदी?" संजीवने पूछा ।
"सुना है, लडकी शराब पीती है, सिगरेट पीती है ।"
"मैं जानता हूँ, दीदी ।", संजीवने कहा । "और मैंने उससे यह भी कह दिया है कि सिर्फ़ समाजके डरसे उसे अपनी ये आदतें छोडनेकी ज़रूरत नही । जब उसे अहसास हो कि ये आदतें उसके लिये ठीक नहीं, तो वह अपने आप उन्हे त्याग दे । जैसे मैं नही चाहता कि मुझपर किसी तरहका दबाव न डाला जाये, ठीक उसी तरह पतीके नाते मैं भी उसपर कोई दबाव नही डालना चाहता ।"
"संजीव, शायद तुम समझते हो कि तुम्हारे आदर्श बहुत ऊँचे हैं । लेकिन वक्त आयेगा जब तुम पछताओगे ।" इतना कहकर अंजनाने मुँह फेर लिया ।
संजीव अपने आपसे मुस्कराने लगा । उसने मनही मन कहा, "शायद मुझे कोई समझ नहीं पाता । क्या हमेशा यही होता रहेगा?"
संजीव और सुनिताकी सगाई हो गई । संजीवकी बस एकही शर्त थी कि सगाई और शादी के बीच कमसे कम छ: महीनोंका अंतर हो, जिससे दोनोंको एक दूसरेको समझनेका वक्त मिले । अपने माता-पिता के अनुभव के बाद वह ज़रूरी समझता था कि पति-पत्नी एक दूसरोंकी अच्छी-बुरी आदतोंको जान ले, उन्हें स्वीकार करनेकी क्षमता रक्खें । वह नही चाहता था कि उसकी शादीका वही अंजाम हो जो उसके अपने माता-पिताकी शादीका हुआ था । जिसे समाज सुनिताकी कमज़ोरियाँ कहता था संजीव उन्हॆं जानता था, और वह यह चाहता था कि सुनिता भी उसकी सभी कमज़ोरियोंको समझ ले ताकि उसे शादीके बाद कोई शिकायत ना हो ।
संजीव सारी दुनियाको अपना समझता था । कभी इसके लिये, कभी उसके लिये, तो कभी और किसीके लिये कुछ न कुछ करनेमे उसे खुशी महसूस होती थी । और इन कामोंसे जब कभी उसे फुरसत मिलती तो वह सुनितासे मिलने जाता । कभी वह उससे मिलने आती । एक बार उसके शिकायत करनेपर संजीवने सुनिताको समझानेकी कोशिश की । "देखो सुनिता, मेरी ज़िंदगी कई हिस्सोंमे बँटी हुई है । जो वक्त मैं तुम्हें नहीं दे पाता, उसके बारेमे शिकायत करनेके बजाय मैं जो वक्त तुम्हारे साथ गुज़ारता हूं उसे एन्जॉय करो । शिकायत करनेसे कुछ हासिल नहीं होगा । उल्टा हो सकता है कि मैं तुमसे दूर होता रहूंगा । मुझे अभी किसी भी बंधनोंमे ज़कडेनेकी कोशिश मत करो, मुझे घुटनसी होती है । मुमकीन है कि कुछ वक्त साथ गुज़ारने के बाद मैं अपने आप सँवर जाऊँ ।"
वक्त गुज़रता गया । जैसे-जैसे शादीकी तारीख पास आने लगी, वैसे-वैसे संजीवको एक अज़ीबसा डर लगने लगा । जिस आज़ादीको मैंने बडे प्यारसे संजोया था, कहीं वह शादीके बंधनोंमे खो तो नहीं जायेगी? उम्रभरके इस बंधनका क्या मैं उसी तरह सामना कर पाऊंगा जिस तरह आजतक करता आया हूँ? क्या होगा मेरा? कहीं मेरे कारण सुनितापर भी बंदिशें आ जायेगी तो? लेकिन मैंने तो उसे सब साफ-साफ बता दिया है । अगर उसे मेरे अज़ीब खयालात पसंद नही तो उसे मुझसे कोई उम्मीद ही नहीं रखनी चाहिये । संजीव जितना सोचता उतनाही घबरा जाता ।
कभी कभी उसे लगता कि सुनिता उसके हर रूपको स्वीकार करनेको तैयार है । अगर ऐसा नहीं होता तो वह इस बंधनमे बंधना ही क्यों चाहती? उसने कईं बार सुनिताको कहा भी, "अगर मेरे साथ मेरे तरीकेसे रहना मुश्किल समझो तो शौकसे इसे तोड सकती हो । मेरा स्वभाव इतनी आसानीसे बदलना अगर असंभव नहीं तो मुश्किल ज़रूर होगा । सिर्फ़ समाजके डरसे शादीके बंधनको स्वीकार मत करो ।" इस बातपर सुनिता सिर्फ़ मुस्कराई थी । सच, क्या यह शादी करके मैं खुश रह पाऊँगा?
संजीवका मन दुविधामे पड गया था । लेकिन वक्त कहाँ रुकनेवाला? पतझड गई, बसंत आया । पेडोंपर फिर एक बार बहारें आईं ; सारा मौसम खुशीसे डोलने लगा । पँछी चहकचहक कर गीत सुनाने लगे । चारों तरफ़ खुशियाँ छाई हुईं थी । सब जगह शहनाईयाँ बज रही थीं । सिर्फ़ संजीव सोचमे डूबा हुआ था, जैसे अंतरात्माकी कोई आवाज़ उसे चेतावनी दे रही हो । लेकिन अब हो भी क्या सकता था? मेरे शहीद होनेका वक्त हो चुका है, वह अपने आपसे मुस्कराकर बोला ।
वक्त आया और चला गया । शादीके बाद सब रिश्तेदार और दोस्त अपने अपने घर चले गये । संजीवके जीवनमे एक नया दौर शुरू हो रहा था । पता नही क्या लिखा है मेरे भविष्यमें? अंध:कार ... या सुनहरा उजाला?
संजीव दबे हुए कदमोंसे कमरेमे आया । उसकी आहट लगतेही सुनिता शरमाई और सिकुडकर बैठी । उसने अपना घूँघट ओढ लिया और दाँतोतले अपने होंठ दबाकर वह संजीवकी प्रतीक्षा करने लगी । उस अँधकारको चीरते हुए धीमीसी रोशनीमे भी वह संजीवके सुडौल शरीरको देख सकती थी । ओफ़ ! आज वक्त रुका हुआ क्यों है ? सारी उम्रभर सुनिताने इस रातके सपने सजाये थे -- बडी बेसब्रीसे इस सुहानी घडीका इन्तज़ार किया था । इससे बडी खुशी उसने इससे पहले जानी नहीं थी । दो शरीरोंका मिलन ....
"सुनिता, एक बात पूछूँ?"
"हं ...."
"सेक्सके बारेमे तुम्हारे क्या विचार हैं?"
"ऊई माँ! ऐसा बेशर्म सवाल?", इस अचानक सवालसे शरमाकर सुनिता बोली ।
"इसमे बेशर्मी की क्या बात है, सुनिता?", संजीव बोला । "हमें चाहिये कि हम इस बारेमे एक दूसरेके विचार जान लें । मैं तो समझता हूं कि शादीसे पहले किसीको ’सेक्स’ के बारेमें सोचना नही चाहिये । इतने पवित्र मिलनको बेसब्रीसे गंदा रूप नहीं देना चाहिये । हाँ, हालाकि ये मेरे अपने विचार हैं और दूसरोंके बारेमे मैं कुछ नही कहना चाहता । तुम क्या समझती हो?"
आज अपनी सुहाग रातको पलंगपर बैठे ये बातें सुनकर सुनिताको अजीबसा लगा । इससे पहले जब वे दोनों इस विषयपर बोले थे तब वह झूठ बोली थी । लेकिन संजीव, आज यह कोई वक्त है इन बातोंमे समय बरबाद करनेका? वह चाहती थी कि संजीव चुपचाप वहाँ बिछे हुए फूलोंको मसल दे -- दोनों हमेशा-हमेशाके लिये एक दूसरेमे समा जाये । ओह संजीव, अब आ भी जाओ ...
संजीव धीमे कदमोंसे आकर पलंगपर बैठ गया । उस अंधेरे कमरेमे अब रोशनी छा गई थी । सुनिताकी गर्दन झुक गई । इस वक्त जब उसे इस अंधेरेसे प्यार होने लगा था, तब उन दोनोंके बीच यह रोशनीका पर्दा क्यों था? संजीवने सुनिताका घूँघट दूर किया, प्यारभरे हाथोंसे उसकी झुकी हुई गर्दनको उठाया और धीरेसे अपने होंठ उसके होठोंपर रख दिये । सुनिताके पूरे बदनमे बिजलीसी दौडने लगी । उसे सिर्फ़ इसी घडीका इन्तज़ार था, और उसके इन्तज़ारकी घडियाँ खत्म होनेको थी । संजीवने फिरसे उसकी ओर देखा और कहा, " सुनिता, आज मैं बहुत थक गया हूँ । चलो, सो जायें, अब पूरी उम्र साथ ही तो रहना है ।"
सुनिताने चौंककर संजीवकी ओर देखा । वह थकानसे चूर बिस्तरपर लेट गया था । सुनिताकी आँखोंमे अब संजीवके लिये घृणा भरी हुई थी । यह कैसा शैतान है जिसने उसके सपनोंकी दुनियाको उजाड दिया था? वह गुस्सेसे मुँह फेरकर सो गई ।
सूरजकी किरणोंने जब संजीवको जगाया तब उसने देखा कि सुनिता गहरी नींद सो रही थी । उसे जगाना संजीवने ठीक नही समझा । झुककर उसने सुनिताके चेहरेको चूमा । जब सुनिताकी आँख खुली तो उसने देखा कि संजीव कहीं जानेकी तैयारियाँ कर रहा था ।
"कहाँ जा रहे हो तुम?" सुनिताकी आवाज़में गुस्सा झलक रहा था ।
"सुनिता, इतना गुस्सा ठीक नहीं ।"
"यह मेरे सवालका जवाब नही । और जो तुम कर रहे हो वह क्या ठीक है?"
"अच्छा, तो इस लिये नाराज़ हो? सुनिये मोहतरमा, मै स्कूल जा रहा हूँ ।"
संजीवके इस ठण्डे मिजाज़से वह और चिढ गई । "तुम भूल रहे हो, कलही तुम्हारी और मेरी शादी हुई है । आज जाना ज़रूरी है? आज मेरे साथ नही रह सकते?"
संजीवने हँसकर उसका हाथ थामा और जवाब दिया, "सुनिता, हम दोनों को तो उम्रभर साथ रहना है । और रही आज जानेकी बात, तो हाँ, आज जाना ज़रूरी है ।"
"क्यों?"
"क्योंकि कल शामको स्कूलका सालाना जलसा है, जिसके लिये बच्चोंकी प्रॅक्टीस लेना मेरी ज़िम्मेदारी है । पहले ही काफी दिनोंसे मैं जा नहीं सका था । सब बच्चे मेरी राह देख रहे होंगे । मैं ज़बान दे चुका हूँ । क्या तुम चाहती हो कि मैं अपने फर्ज़से मुँह मोड लूँ?"
"तो क्या शादी-प्यार कोई फ़र्ज़ नहीं?"
"ज़रूर है, लेकिन मै प्यारके फ़र्ज़से ज़्यादा फ़र्ज़के प्यारको मानता हूँ ।"
इतना कहकर संजीव झटसे बाहर चला गया । घरसे बाहर निकलकर उसकी चाल अपने आप धीमी हो गई । वह सोचनेपर मज़बूर हुआ । क्या उसका जीवनसाथीका चुनाव सही था? क्या सुनिताका बर्ताव सही था? क्या सुनिताके प्रति उसका अपना बर्ताव सही था? प्यारमे सारी दुनियाको भूल जाना ज़रूरी होता है क्या? अगर सुनिता गुस्सेके बजाय प्यारसे उसे रोकनेकी कोशिश करती, तो शायद वह रुक जाता । लेकिन ---
शामको जब वह देरसे घर लौटा तो उसने देखा कि सुनिता एक कोनेमे मुँह लटकाकर बैठी थी । उसके पास जाकर संजीवने बात करनेकी कोशिश की तो सुनिताने गुस्सेसे अपना मुँह फेर लिया और दूसरी जगह जाकर बैठ गई । यकायक संजीवको अपने आपसे घृणा होने लगी । उसने सोचा था कि थका हुआ घर लौट आनेपर कोई उसे प्यारसे पानी पूछेगा, उससे बातें करेगा । बाथरूम जाकर संजीवने बहते नलके ठण्डे पानीके नीचे अपना सर रखा ।
रातको सुनिता दीवारकी ओर मुँह किये लेटी हुई थी । संजीवकी आहट लगी तो वह उठकर बिस्तरपर बैठ गई । संजीव उसके पास बैठ गया । "सुनिता, मै तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ ।"
"संजीव, मैं भी तुमसे बहुत कुछ कहना चाहती हूँ ।"
"सुनिता, पहले मेरी बात सुनो । मैं जानता हूँ, तुम मुझसे बहुत नाराज़ हो । अपनी सुहाग रात तुम्हें करवट बदलकर गुज़ारनी पडी । सच कहूँ तो थकानका एक बहाना था । मेरे जीवनमे कुछ ऐसी घटनाएँ घटी हैं, जिनके कारण मैं अपने आपमे, इन रिश्तोंमे विश्वास खो चुका हूँ । मुझे तुम्हारे सहारेकी ज़रूरत है । मैने पहलेभी तुम्हे मेरे जीवनके बारेमे बताया है, और आज फिर एक बार बताना चाहता हूँ ।" संजीवने अपनी सारी जीवनकहानी सुनिताके सामने दोहराई और उसे लगा जैसे उसके दिलका बोझ कुछ हलका हो गया ।
"संजीव, तुमने अपनी रामकहानी तो सुना दी । अब मेरी सुन लो । एक लडकीको अपने माँ-बापके घरमे सब कुछ मिल जाता है, सिवा सेक्सके । और एक लडकी शादी करती है तो सिर्फ़ अपने सुहाग रातकी तमन्ना लेकर । ..... "
सुनिता बोलती रही और संजीव सुनता रहा । सुनिताका एकएक शब्द उसके दिलमे शूलकी तरह चुभ रहा था । उसे लगा, उसकी आँखोंके सामने उसके प्यारका महल टूट रहा था । तो क्या एक औरत सिर्फ़ सेक्सके लिये शादी करती है? शादी क्या सिर्फ़ सेक्सका नाम है? शादीका अटूट बंधन कोई मायने नही रखता? अगर किसीको सिर्फ़ सेक्स ही चाहिये होता है, तो क्या मण्डीमे नही मिलता? एक मर्द और एक औरतको क्या एक ऐसे घरकी ज़रूरत नही होती जहाँ उसे प्यार मिले? अपनापन मिले? हमदर्दी मिले? एक ऐसा जीवनसाथी मिले जो एक दूसरेको उसकी कमज़ोरियोंके साथ अपना ले? क्या शादी सेक्सका सिर्फ़ लायसन्स है? सिर्फ़ एक सौदा? मुझे ऐसा सौदा तो नही करना था । उसे अपने जीवनमे एक दरारसी नज़र आने लगी ।
दूसरे दिनसे ही संजीवको सुनिताके व्यवहारमे कुछ बदलावसा नज़र आने लगा, जैसे कोई भारी बोझ दिमागपर लेकर वह जी रही हो । उसके चेहरेसे हँसी गायब हो गयी । पूरे घरमे मातमसा छाया रहता । ऐसे माहौलमे संजीवको घुटनसी महसूस होने लगी । उसे लगने लगा कि उसने कोई बहुत बडा गुनाह किया हो जिसके कारण सुनिता नाराज़ थी । धीरेधीरे उसे अपने आपसे नफ़रत होने लगी । देखते ही देखते उसके चेहरेसे भी हँसी गायब होने लगी । हर वक्त वह चिढचिढासा रहने लगा । आजतक उसे लगता था कि लोग उसके करीब आकर खुश रहते हैं । लेकिन उसके अपने घरमे यह आलम था कि उसकी अपनी जीवनसंगिनी उसके कारण हमेशा मायूस रहती । क्या संजीवके व्यक्तित्वमें ही कोई कमी थी? यह न्यूनगण्ड हमेशा उसे सताता रहता ।
फ़िरभी एक बात उसकी समझमे नही आयी । दिनभर उससे खफ़ाखफ़ा रहनेवाली सुनिता रात होतेही बदल जाती । दिनभर उससे दूरी रखनेवाली वह औरत रातके अंधेरेमे उससे लिपट जाती । जैसे बिस्तरपर होनेवाली और बिस्तरसे बाहर होनेवाली सुनिता दो अलग-अलग व्यक्तित्व थे । यह बात संजीवके समझमे नही आई और वह इस रहस्यपूर्ण औरतके साथ रात बितानेमे झिझकने लगा । यह नकाब किस लिये? यह ढोंग कैसा और आखिर क्यों? दिनमे उससे दूरदूर भागनेवाली उसकी पत्नी रात होतेही उससे लिपटी रहती? उसे गलीमे देखे हुए वे कुत्ते याद आये जो जब जी चाहे यौनाचार कर पाते । आखिर शादीका मतलब क्या सेक्सतक ही सीमित होता है? अगर मैं भी यह करनेमे सफ़ल रहूं तो मुझमे और मेरे पितामे अंतरही क्या रहा? फिर दोनों पशूही तो कहलायेंगे ना? कई दिनोंतक यह सिलसिला चलता रहा -- दिनमे सुनिता उससे दूर भागती और रातको संजीव सुनितासे दूर रहता । आखिर उसने एक दिन सुनितासे पूछ ही लिया, "सुनिता, जो रुची तुम रातोंमे दिखाती हो वह दिनमे क्यों नही?"
"कैसी बात कर रहे हो संजीव? हम आखिर दिनमे ’वह काम’ कैसे कर सकते हैं?"
सुनिताका जवाब सुनकर संजीव हैरानसा रह गया । क्या इस लडकीका सारा जीवन "उस काम" के दायरेमेही सीमित था? क्या उसके लिये शादीका मतलब सेक्सके सिवा और कुछ नही था? यह कैसी औरतसे मैने अपने आपको बाँध लिया है? हम दोनोंकी सोच अलग है, रास्ते अलग हैं, मंज़िलें अलग हैं । अगर बात सिर्फ़ जिस्मानी रिश्तोंकी है तो आखिर दो दिल मिले भी तो कहाँ और कैसे? सोच-सोचकर संजीवका सर चकराने लगा । एक दिन उसने सुनितासे कहा, "सुनिता, हो सकता है, तुमने गलत आदमीसे रिश्ता जोडा है । तुम्हे एक ऐसे रिश्तेकी तलाश थी जो कहीं भी पूरी हो सकती थी । तुम्हें एक जिस्म चाहिये था, जिसका कोई नाम ना हो, कोई चेहरा ना हो, अलग अस्तित्व ना हो । तुम्हे तलाश थी एक ऐसे बदनकी जो रातके धुँधले उजालेमे तुम्हारे बदनको गर्मी दे सके । तुम्हारे सेक्सकी भूख मिटा सके । और मुझे तलाश थी एक ऐसे साथीकी जो ना सिर्फ़ मेरे बदनकी, बल्कि मेरे दिलकी, दिमागकी ज़रूरत पूरी कर सके । मैं समझता हूँ कि हम एक दूसरेसे गलत जगह मिले हैं । हमें बाज़ारमे होना चाहिये था, लेकिन हम एक घरमे बंद हैं ।"
"तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई, संजीव, मुझे वेश्या कहनेकी? तुमने मुझे वेश्या कहा?" सुनिता झल्लाकर चिल्ला उठी ।
"सुनिता, जो मैने कभी कहा ही नही, तुम हमेशा वही सुनती आयी हो । शायद गलती मेरी ही थी ।"
"क्या मतलब?"
"क्या यह सच नहीं कि तुम सिग्रेट और शराब भी पीती हो?"
"तो इसमे कौनसी बडी बात है, मिस्टर संजीव? मै जिस माहौलमे काम करती आई हूँ, वहाँ तो यह आम बात है । ऊँचे घरकी कईं औरतें सिग्रेट और शराब पीती हैं ।"
"ऊँचे घरकी औरतें पीती होंगी, हमारे घरकी नहीं ।"
"और तुम्हें पता भी था इस बातका ।"
"और इसीलिये मैं चुप था । किसी भी तरहका दबाव नही डालना चाहता था तुमपर । अगर चाहता तो तुमपर ज़बरदस्ती कर सकता था कि ये सब बातें मुझे कतई पसंद नही, और ये आदतें छोड दो । लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया । सोचा, तुम्हे खुद एहसास होगा किसी दिन और छोड दोगी ये सब बातें ।"
"तो क्यों नही किया? क्यों मेरी ज़िंदगी बरबाद की?"
"किसने किसकी ज़िंदगी बरबाद की, किसे पता, सुनिता? मैं हमेशा अपने फ़ैसले अपने आप लेता आया हूँ, और चाहता था कि तुमभी वही करो । मुझे अभिमान था तुमपर कि तुम ढोंगी नही हो । जो भी करती हो, खुले आम करती हो । कितना गलत था मैं ।"
कहनेको तो उस दिन बात वहींपर खत्म हुई, लेकिन उन दोनोंकी बीच एक ऐसी दीवार उभर रही थी जिसको पार करना दोनोंके लिये मुश्किल था । उस रातके बाद, संजीव ज़्यादासे ज़्यादा वक्त घरके बाहर गुज़ारने लगा । एक दिन जब उसकी माँने पूछा तो उसने जवाब दिया, " घरमें रहकर भी क्या करूं माँ? जो चीज़ घरमे नही मिलती उसे बाहर ढूँढनेसे दिल तो बहलता है कुछ देरके लिये ।"
देखते-देखते दिन महीनोंमे गुज़र गये । अपने हँसीका खज़ाना अब संजीव घरसे बाहर दूसरोंके लिये लुटाता फिरता । संजीव और सुनिताके बीचकी दूरी बढती ही गई । जब किसी कारणवश उन दोनोंको एक साथ बाहर निकलना पडता तो वे खुशीका एक झूठा नकाब पहनकर निकलते, जिससे किसीको कुछ पता नहीं चलता ।
फिर एक दिन सुनिताने संजीवसे पूछा, "आखिर ये सब कबतक चलता रहेगा?"
"क्या?"
"यही तुम्हारा दिनभर घरसे गायब रहना? घर ज़ल्दी क्यों नही आते? हर समय बच्चो-बूढोंको लेकर घूमते रहते हो, कभी मुझे लेकर घूमने क्यों नही जाते?"
"घर जल्दी आऊँ भी तो किस लिये? तुम्हारा यह हरदम चढा हुआ चेहरा देखने? अगर कभी तुम्हे खुश देखता हूँ तो सिर्फ़ जब साथ सोनेकी बात आती है तब ।"
"तो इसमे बुरा ही क्या है? वह हक है मेरा । मैं चाहती हूँ, तुम हमेशा मेरे साथ रहो ।"
"साथ रहूँ बिस्तरमें? तुम्हारा बस चले तो सब कामधाम छोडकर चौबीस घण्टे मुझे अपने साथ सुला दोगी ।"
"अगर तुम्हे अपने पास रखनेका यही रास्ता है तो मैं वही करूंगी ।"
"सुनिता, मैंने तुमसे कईं बार कहा है कि जो समय मैं तुम्हारे साथ गुज़ारता हूं, उसमे खुश रहनेकी कोशिश करो, ना कि उस वक्तके बारेमे शिकायत करती रहो जो मैं तुम्हारे साथ नहीं गुजार पाता । एक दूसरेको अपनी मुठ्ठीमें बंद रक्खो, इसका मतलब प्यार तो नहीं । क्या यह मुमकीन नही कि कुछ वक्त तुम अपने आप गुज़ारो, कुछ मैं अपने आप गुज़ारूं और कुछ हम एक दूसरेके साथ गुज़ारें? जिनसे हम सच्चा प्यार करते हैं उन्हें हमें खुले आसमानमे छोड देना चाहिये । अगर वह लौटकर आये तो वह अपना कहलाता है । वर्ना वह कभी अपना था ही नहीं ।"
संजीवकी बहस सुनकर सुनिता झल्ला उठी । "यह तुम्हारा फलसफ़ा मेरी समझके बाहर है और ना ही मैं उसे समझना चाहती हूँ । मैं बस चाहती हूँ कि तुम सिर्फ़ मेरे हो और सिर्फ़ मेरे बनकर रहो । मैं तुम्हे किसी औरके साथ बाँटना नही चाहती । बिल्कुल नही ।"
"देखो सुनिता, प्यार बाँटनेसे कम नहीं होता । प्यार एक झरना है इन्सानके दिलमे, जो बस बहना चाहता है, बिना किसी बंधनके । उसके कईं नाम होते हैं ।अच्छे-बुरे नाम देकर समाज प्यारको बंधनोंमे जखडना चाहता है । मैं समझता हूँ, जिस प्यारकी तुम्हे भूख है, वह सेक्स सिर्फ़ एक छोटासा रूप है प्यारका । और मै प्यारके सिर्फ़ इस रूपमे विश्वास नही रखता । जब आदमी थका-मांदा शामको घर लौटता है तो उसकी पत्नीकी आँखोंमे जो लुक्का-छुप्पी खेलता है, मुझे उस प्यारकी तलाश है । मै ..."
संजीवको बीचमे टोकते हुए सुनिता चिल्ला उठी, "ये तुम्हारी किताबोंवाली बातें मुझे मत सुनाओ । मै सिर्फ़ व्यवहारकी बातें समझती हूँ । तुम्हारे लेव्हलतक उठना मेरे बसकी बात नहीं ।"
संजीवने हँसनेकी कोशिश करते हुए कहा, "सुनिता, किसीके लेव्हलतक मत उठो, कमसे कम कोशिश तो किया करो ।"
ना चाहते हुए भी सुनिताने अपने आपको बदलनेकी कोशिश की । लेकिन उसका असली चेहरा बारबार उभर आता । किसी शामको वे दोनों एक पार्टीमे गये हुए थे । हमेशाकी तरह संजीव सबसे मिलजुलकर पार्टीकी जान बनता रहा, हँसताहँसाता रहा । संजीव और उसके दोस्तोंके लाख कोशिश करनेपर भी सुनिता सबसे अलग अपने आपमे खोई बैठी रही । घर लौटते हुए भी वह काफ़ी देर चुपचाप बैठी थी । फिर मौका पाकर वह अपने दिलकी भडास निकालने लगी, संजीवको छोटेमोटे ताने देने लगी । उसे बस यही शिकायत थी कि संजीवने उसके साथ बहुत कम वक्त बिताया । जब संजीव सह नही पाया तो वह भी बोल उठा, "अगर हम पार्टीमे जाते हैं तो लोगोंसे मिलने, ना कि एक दूसरेके गलेमे लिपटके बैठने । मै अगर हर किसीसे बात करता हूँ तो इस लिये नही कि जानबूझकर तुम्हे अकेला छोडूँ । स्वभाव है मेरा । अपने दोस्तोंके साथ वक्त बितानेसे मैं तो कभी तुम्हें रोकता नहीं । अगर तुम ज़रासा भी बदलनेकी कोशिश नही करना चाहती तो मुझसे यह उम्मीद क्यों रखती हो कि रातोंरात मैं बदलूँ? शादीसे पहले अपने घरमे तुम किसी और ढंगसे जीती थी, तो यहाँ अचानक यह बदलाव क्यों? क्या अपने घरमे तुमने यह कोशिश नही की कि अपनी माँ को ज़्यादा काम ना करना पडे? तो मेरे घरमे मेरी माँ से यह बर्ताव क्यों? क्यों सवेरे-सवेरे उठकर सब काम उसेही करने पडते हैं? क्या मेरी माँ तुम्हारी माँ नही? क्या मेरा घर तुम्हारा घर नही?"
"नही, यह घर मेरा नही । जहाँ रातको मुझे छोटेसे किचनमें सोना पडे, वह घर मेरा कभी नही हो सकता । मुझे एक बडा घर चाहिये जहाँ मैं रानी बनकर रहूँ, ना कि एक नौकरानी, जिसे किचनमे सोना पडे, समझे? यह घर मेरा नही । और ना ही तुम्हारे घरवाले मेरे घरवाले हैं । "
सुनिताकी यह बात सुनकर संजीव दंग रह गया । "ओह, तो तुम्हे एक महलकी तलाश थी -- एक घरकी नही, जिसमे सीधेसाधे लोग रहते हैं ! ठीक उसी तरह, जिस तरह तुम्हे सिर्फ़ एक बेजान जिस्म की ज़रूरत है जो जब तुम चाहो तुम्हारे बदनसे लिपटा रहे । तो क्यों यह शादीका ढोंग रचा रही हो? क्यों अपने आपको इस बेतुके बंधनसे ज़कड रखा है? तोड दो इस बेमतलब बंधनको ... छोड दो इस घरोंदेको । ढूंढ लो अपने राजमहलको । निकल जाओ मेरी ज़िंदगीसे ।"
संजीवकी माँने संजीवकी यह आखरी बात सुनी, तो वह झटसे दरवाज़ा खोलकर अंदर आई और संजीवके मुँहपर एक चाँटा जमा दिया ।
सुनिता चिल्लाई, "अब तुम्हें यह भी तमीज़ नही कि दरवाज़ा खटखटाकर अंदर आओ? पती-पत्नी की बातोंको छुपछुपकर सुननेमे तुम्हें शर्म नहीं आती?"
संजीव गुस्सेमे आकर सुनितापर हाथ उठानेवाला ही था तो फिरसे उसकी माँ बोली, "संजीव, खबरदार जो तुमने बहूको छुआ भी । मुझसे बुरा कोई नही होगा । आखिर उसने जो कहा उसमे गलत ही क्या है? हर लडकी शादीसे पहले बहुतसे सपने देखती है । एक सपना सुनिताने भी देखा, तो उसमे उसकी क्या गलती है?"
सुनिता फिरसे चिल्ला उठी, "मेरे सामने यह नाटक करनेकी ज़रा भी ज़रूरत नही । अपने लडकेको किस तरहकी परवरिश दी है, देख चुकी हूँ मै । पल्लूसे बाँधकर रक्खो अपने लाडलेको ।"
सुनिताकी यह बात सुनकर संजीवकी माँ सिसकियाँ देते हुई कमरेसे बाहर चली गईं । चाहते हुए भी संजीव कुछ नही कर सका । अपने खिलाफ़ कोई भी आरोप सहनेकी वह क्षमता रखता था, लेकिन अपने माँकी बेइज़्ज़ती देखकर वह पूरी तरह टूट गया । देखतेदेखते उसके सारे अरमानोंकी बारात अर्थीमे बदल रही थी । जिस जीवनसाथीके ख्वाब उसने देखे थे वह यह नही थी । अपने पिताके हाथों अपने माँकी हालत तो वह देख चुका था, और अब अपनी पत्नीके हाथों अपनी माँका अपमान सहनेकी हिम्मत उसमे नही थी । वह कमरेसे बाहर निकलकर सडकपर आ गया । जिस प्यारकी उसे तलाश थी वह उसके नसीबमे नही था ।
जिस प्यारसे वह अपने बचपनमे महरूम रहा, वही प्यार वह अपनी औलादको देनेकी चाह रखता था । ऐसी औलाद, जो एक ऐसे रिश्तेकी निशानी हो जिसे उसने खुद चुना था । लेकिन यह कैसा रिश्ता उसके नसीबमे आया था? आखिर क्यों? वह जानता था कि किसी हदतक इन हालातके लिये वह भी ज़िम्मेदार था । लेकिन क्या पूरी तरह वही ज़िम्मेदार था? सोचसोचकर संजीवका सर चकराने लगा । उसकी आँखोंके सामने अँधेरासा छाने लगा । देखते ही देखते उसकी आँखें आँसूओंसे भर गयी ।
आँखोंसे बहती हुई धारामे उसके अतीतकी प्रतिमा धुँधलीसी हो गयी । उस हालतमे पता नही वह कितनी देर बैठा रहा । जब उसे होश आया तो प्रकाश उसके सामने खडा था ।
"चलो संजीव, तुम्हारी माँ राह देख रही होगी ।"
"चलो, प्रकाश । मेरी राह और कौन देखेगा?"
दोनों जब क्लबसे बाहर आये तो रातकी धुँधली चादर ओढे सारा शहर नींदमें डूबनेकी तैयारी कर रहा था । हलकेसे अपना हाथ संजीवके कँधेपर रखते हुए प्रकाशने कहा, " संजीव, एक बात कहूँ तो बुरा तो नहीं मानोगे? सुनिता कल फिर एक बार ऑफिस आनेवाली है ---"
"तो? प्रकाश, मेरे लिये तो वह कबकी मर चुकी है --- जिस बच्चेकी मुझे चाह थी, उसे पैदा करनेसे पहले ।"
"ऐसा मत कहॊ, संजीव । मुमकिन है कि अबतक तुम दोनोंने एक दूसरेको गलत समझा हो । अब छ: महीनोंकी दूरीके बाद हो सकता है कि तुम एक दूसरेको अच्छी तरह समझने लगो । तुम एक बार उससे मिल तो लो । हो सकता है कि जिस मंज़ीलकी तुम दोनोंको तलाश थी वह अपने सामने पाओ । आखिर इस समस्याका कुछ तो हल हो ।"
कुछ देर सोचनेके बाद संजीव बोला, " हाँ प्रकाश, मैं भी इस सबसे तंग आ चुका हूँ । चाहता हूँ कि इस समस्याका कुछ हल निकले -- इस पार या उस पार । मैं मिलूँगा सुनितासे ।"
दूसरे दिन ऑफिसके बाद संजीव और सुनिता चौपाटीकी रेतमे बैठकर बातें कर रहे थे । संजीवके साथ प्रकाश और सुनिताके साथ उसकी सहेली रंजिता थी । आईसक्रीम खतम होतेही आसमान की तरफ़ देखकर सुनिताने सवाल किया, "संजीव, आखिर क्या सोचा है तुमने मेरी ज़िंदगीके बारेमे?"
"सुनिता, मैं चाहता हूँ कि तुम यही सवाल मुझसे आँख मिलाकर पूछॊ । सच बात तो यह है कि तुमने सवाल ही गलत किया है ।"
"क्या मतलब है तुम्हारा, संजीव?"
"सुनिता, अगर मैने तुम्हे जानेके लिये कहा था तो उसकी वजह थी ।"
"तुम्हारा मतलब है कि मैं बिना वजह चली गई थी?"
"वजह थी, समझ सकता हूँ मै । मैने तुमसे जानेके लिये सिर्फ़ एक बार कहा था, जब तुमने मेरी माँका अपमान किया था । जब वह तुम्हारी तरफ़दारी करते हुए मुझसे लड पडी थी । और तुम बार बार घर छोडकर जाती रही । कोई खास वजह?"
संजीवकी इस बातको सुनकर अचानक रंजिताकी झुकी हुई गर्दन उपर उठ गई । "सुनिता, तुमने यह बात तो कभी मुझे बताई नहीं । जवाब दो ..."
"रंजिता, सुनिता जवाब नही दे पायेगी, क्योंकि उसके पास इस बातका कोई जवाब नही है । सच बात तो यह है कि उसने शादीको हमेशा एक गुड्डागुड्डीका खेल समझा है । एक ऐसा खेल जो एक मर्द और औरत एक दूसरेके शरीरसे खेलते हैं । जिसमे और किसी भी बातकी गुँजाईश नही होती ।"
सुनिता चिल्ला उठी, "मैने कभी ऐसा तो नही कहा था ।"
"कहा था, सुनिता, ऐसाही कहा था । सिर्फ़ अपनी ज़बानसे नही, बल्कि अपने व्यवहारसे भी । यही वजह थी कि तुम यह खेल बारबार मेरी ज़िंदगीसे खेलती रही । और जब मैं तुम्हारे खेलमे हर बार तुम्हारा साथ नही दे सका, तो तुम बारबार घर छोडकर जाती रही । जबजब तुम्हे मेरे नामकी ज़रूरत महसूस हुई तबतब तुम मेरी ज़िंदगीमे वापस आती रही । जिस तरह बिल्ली चूहेके साथ ज़िंदगी और मौतका खेल खेलती रहती है ठीक उसी तरह तुम मेरी ज़िंदगीसे खेलती रही ... मेरी भावनाओंसे खेलती रही । शादीका मतलब तुम्हारे लिये सिर्फ़ एक खेल था ।"
"संजीव, झूठी तोहमत लगा रहे हो तुम मुझपर ।"
"सुनिता, सच बहुत कडवा होता है । तुम्हारी नज़रोंमे शादी सिर्फ़ एक लायसन्स है जो समाज बक्शता है ’सेक्स’का खेल खेलनेके लिये । तुमने हमेशा चाहा कि दो शरीर एक साथ लिपटे रहें, चाहे उनके दिल मिलें न मिलें । जहाँ दो शरीरोंके साथ साथ दो दिलोंका मिलन ना हो सके, ऐसे बंधनको शादीका नाम देनेके लिये मैं हरगिज़ तैयार नहीं हूँ । न ही ऐसे बंधनको मैं कभी मानता हूँ । हमारी मंज़िलें जुदा थी और हमारा अलग होना लाज़मी था ।"
"इसका मतलब है कि तुम मुझे वापस नही लोगे?"
"ज़िंदगीमे पहली बार तुमने मुझे ठीक समझा है, सुनिता । बधाई हो ।"
"संजीव, मै तुमसे साफ़साफ़ कह रही हूँ, तुम अगर मुझे स्वीकार नही करोगे तो मैं यहीं कूदकर ..."
"... तुम अपनी जान कभी नही दे सकती, सुनिता । तुम्हे अपने शरीरसे हदसे ज़्यादा प्यार है । मुझ जैसे आदमीके लिये तुम अपनी कीमती जान कभी नही गँवाना चाहोगी । अगर ऐसा होता तो छ: महीने मुझसे दूर रहकर तुम कभी ज़िंदा रह नही सकती थी । जब मुझे तुम्हारे सच्चे प्यारकी ज़रूरत थी, तब तुम मुझसे दूर रही । मैं समझ नही पा रहा हूँ कि आज तुम्हारी क्या मज़बूरी है जिसके लिये तुम मेरी ज़िंदगीमे वापस आना चाहती हो । आज के समाजमे जीनेके लिये किसीको किसीके नामकी ज़रूरत नही होती । ना मर्दको, और ना ही एक औरतको । सुनिता, मेरी शुभकामनाएं तुम्हारे साथ थीं और हमेशा रहेंगी । तुम अपनी नई दुनिया बसा लॊ, और मै अपनी नई दुनिया बसानेके लिये किसी ऐसे साथी की तलाशमे रहूँगा जो मुझे मेरी कमज़ोरियोंके साथ स्वीकार करे । "
संजीवकी यह बात सुनकर सुनिता हैरान रह गई । "आखिर तुम चाहते क्या हो, संजीव?"
"सुनिता, मै चाहता हूँ कि इस समाजके ठेकेदारोंको कुछ बता सकूँ । जब पति-पत्नीकी आपसमे बनती ना हो, तब ज़रूरी नही कि समाजके डरसे वे एक छतके नीचे अजनबी बनकर रहें । इससे अच्छा तो यह है कि वे एक दूसरेसे अलग हो जायें । जिस तरह मै शादीके लायसन्सको, याने Marriage Certificate को नही मानता, ठीक उसी तरह मै उस कागज़के टुकडेको भी नही मानता जिसे समाजके ठेकेदार तलाक या divorce कहते हैं ।"
"तो तुम दूसरी शादी करना चाहते हो?"
"सुनिता, हमेशाकी तरह अबभी तुमने मुझे गलत समझा । क्या ज़रूरी है कि हर तलाशकी मंज़िल शादी हो? याद है, कभी मैने तुमसे कहा था, प्यार एक झरना है जो कईं रूप लेकर बहना चाहता है । इसी प्यारका एक नया रिश्ता जोड लूँगा मै । बताना चाहता हूँ समाजके ठेकेदारोंको कि वही रिश्ता सबसे बडा होता है जो इन्सान अपनी मर्ज़ीसे जोड सके । चाहे वह रिश्ता पति-पत्नीका हो, दोस्त-दोस्तका हो; बाप-बेटेका हो । कभी कोई ऐसा साथी मिले जो मुझे पूरी तरह समझकर अपना सके, तो शादी ज़रूर कर लूँगा । अगर समाज इजाज़त दे तो किसी अनाथ बच्चेको गोद लेकर उसकी परवरिश करूँगा । उसे अपना नाम दूँगा, अपना प्यार दूँगा, जिससे प्यारका यह झरना हमेशा बहता ही रहेगा ।"
बोलते बोलते संजीव सबको पीछे छोडकर डूबते हुए उस ढलते हुए सूरजकी तरफ़ बढता गया जो कभी उसकी ज़िंदगीमे एक नया उजाला ले आये । सुनिता और बाकी सब उसकी तरह देखते रहे । उन्हें पता चल गया कि यह दूरी अब कभी कम नही होनेवाली ।
लक्ष्मीनारायण हटंगडी
EC51/B104, Sai Suman CHS,
Evershine City, Vasai (E)
PIN 401208
(suneelhattangadi@gmail.com)
"किसी अनाथ बच्चेको गोद लेकर उसकी परवरिश करूँगा" hi gosht faar chaan watali sanjiv chi...
ReplyDeletePremacha khara arth Itaraana prem denyat aahe.
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